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'नटवरलाल' महेश शाह को किसके इशारे पर दी जा रही है वीआईपी ट्रीटमेंट

नई दिल्ली: देश में इस साल आईडीएस स्कीम के तहत काले धन का सबसे बड़ा डिस्क्लोजर करने और फिर उससे पलट जाने वाले महेश शाह के मामले में अब खुद आयकर विभाग की भूमिका संदेह के घेरे में है. महेश शाह से कल रात दस बजे से आज सुबह दस बजे तक लगातार बारह घंटे की पूछताछ के बाद भी आयकर विभाग ये बताने को तैयार नहीं कि आखिर महेश शाह के पीछे वो कौन से प्रभावी लोग हैं, जिन्होंने अपने काले धन को उससे उजागर करवाने की योजना बनाई थी और इसके तहत उससे करवाया था तेरह हजार आठ सौ साठ करोड़ रुपये का डिस्क्लोजर, वो भी आईडीएस स्कीम बंद होने के ठीक आधे घंटे पहले, तीस सितंबर की रात साढ़े ग्यारह बजे.

गुजरात में आयकर विभाग के सबसे बड़े अधिकारी और डीजी इन्वेस्टीगेशन के तहत गुजरात में तैनात पी सी मोदी आज सुबह दस बजे के करीब जब मीडिया से मुखातिब हुए, तो उनका जवाब चलताउ था. मोदी की तरफ से बताया गया कि महेश शाह से आंशिक पूछताछ हुई है और उसे जाने दिया गया है. मोदी के मुताबिक कल ग्यारह बजे उसे फिर बुलाया गया है. सवाल ये उठता है कि आईडीएस स्कीम के तहत बाहर आने वाले काले धन का करीब बीस फीसदी हिस्सा जिस शख्स महेश शाह के जरिये सामने आने वाला था, उसके मामले में आयकर विभाग इतनी ढिलाई क्यों बरत रहा है.

किसी आम आदमी से आयकर चुकाने के मामले में हजार-दो हजार रुपये की भी गलती हो जाए, तो आयकर विभाग उसे परेशान कर छोड़ता है. ऐसे में जो शख्स तेरह हजार आठ सौ करोड़ रुपये से भी अधिक की रकम काले धन के तौर पर होने को लेकर सामने से जाकर घोषणा करता है, उसके बारे में गहराई से जानने को क्यों इच्छुक नहीं है आयकर विभाग. वो भी तब जबकि महेश शाह ये कह रहा है कि तेरह हजार आठ सौ साठ करोड़ रुपये जितनी बड़ी रकम उसकी न होकर कुछ प्रभावशाली नेताओं, अधिकारियों और कारोबारियों की है.

पीएम मोदी ने काले धन को दूर करने के लिए नोटबंदी जैसी योजना सामने रखी, जिससे आम आदमी परेशान भी हो रहा है, फिर भी सहयोग कर रहा है ताकि काले धन के दूषण से छुटकारा मिले. लेकिन तेरह हजार आठ सौ साठ करोड़ रुपये जितनी बड़ी रकम के तौर पर जिस काले धन के बारे में महेश शाह खुद उछल-उछल कर कह रहा है, उसके बारे में गंभीरता से जांच के लिए क्यों तैयार नहीं है आयकर विभाग, ये सवाल लाजिमी है.

वैसे भी महेश शाह को आयकर विभाग ने नहीं खोजा, वो मीडिया के सामने हाजिर हुआ, जहां से उसे आयकर विभाग के अधिकारी लेकर गये. बारह घंटे की पूछताछ, वो भी डीजी कक्षा के अधिकारी के मार्गदर्शन में होने के बाद, अगर ये पता न चले कि आखिर वो प्रभावशाली लोग कौन हैं, जिनका फ्रंट बनकर महेश शाह ने डिस्क्लोजर किया, तो ये मामला संदेह जगाता है.

आयकर के अधिकारियों के रुख से साफ है कि वो महेश शाह पर किसी किस्म का दबाव नहीं बना रहे, बल्कि उसे वीआईपी ट्रीटमेंट दे रहे हैं. आखिर किसके इशारे पर हो रहा है, ये सब कुछ, ये हर कोई जानना चाहता है. खुद आईटी विभाग के गुजरात के सर्वोच्च अधिकारी ने साफ किया कि पूछताछ के दौरान महेश शाह के भोजन और स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखा जा रहा है.

सवाल ये उठता है कि आज की तारीख में महेश शाह अपराधी है भी या नहीं. जो शख्स पूरे आईडीएस स्कीम को ही माखौल बना रहा है, क्या वो आयकर विभाग की निगाह में अपराधी नहीं है, सवाल ये भी है. अगर वो अपराधी है, तो उसे अपने पास रखकर कड़ाई से पूछताछ की जगह उसे छोड़ा क्यों गया, इसका जवाब भी कोई अधिकारी नहीं दे रहा.

आयकर कानून के प्रावधानों के तहत विभाग के अधिकारी के सामने गलतबयानी करना अपराध है. ऐसे में तेरह हजार आठ सौ साठ करोड़ रुपये जितनी बड़ी रकम की घोषणा और फिर उससे भाग खड़ा होना और फिर ये कहना कि रकम किसी और की है, सहज ही अपराध की श्रेणी में आता है. तो फिर आयकर विभाग इस मामले में नरमी क्यों बरत रहा है.

आयकर विभाग चाहे, तो इस मामले में पुलिस केस भी हो सकता है. किसी सरकारी अधिकारी को गलत जानकारी देना भी अपराध की श्रेणी में आता है. आयकर अधिकारी के सामने गलतबयानी तो और बड़ा अपराध है, क्योंकि आयकर कानून के तहत आयकर अधिकारी के आगे दिये गये बयान का उतना ही महत्व है, जितना कि किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आगे कही गई बात का. फिर महेश शाह के मामले में केस करने में क्यों हिचक रहा है आयकर विभाग और वो भी किसके इशारे पर, ये रहस्य गहरा रहा है.

सवाल उठता है कि कौन है महेश शाह, जिसने तेरह हजार आठ सौ साठ करोड़ रुपये जितनी जंगी रकम का आईडीएस स्कीम के तहत डिस्क्लोजर कर हंगामा मचा दिया. अगर उसकी आर्थिक सेहत को देखा जाए, तो वो एक मामूली सी प्यादे की औकात रखता है. रिकॉर्ड के तौर पर महेश शाह अहमदाबाद का निवासी है. शाह की उम्र है 67 साल. शहर के जोधपुर इलाके में बने मंगलज्योत अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 206 में पिछले दस वर्ष से रह रहा है महेश शाह. महेश शाह के परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा है, जिसका नाम है मोनितेश. पत्नी कैंसर पीड़ित है, जबकि बेटी की शादी हो चुकी है.

महेश के पड़ोसी बताते हैं कि स्वभाव से एकदम कंजूस है वो. तेरह हजार करोड़ रुपये से अधिक की रकम की बात करने वाला महेश एयरपोर्ट जाने के लिए ऑटो पकड़ता है न कि कार. किसी ऑटो वाले को एक रुपये भी ज्यादा देना उसे मंजूर नहीं होता. जिस सोसायटी में रहता है, वहां के किसी आदमी को एक कप चाय तक नहीं पिलाई होगी महेश ने. आसपास की सब्जी और पान की दुकानों का बकाया है उस पर.

महेश रियल एस्टेट की जिस कंपनी को चलाता है, वो कंपनी भी है डब्बा. मिनिस्ट्री ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स की वेबसाइट पर महेश शाह की कंपनी के बारे में जो जानकारी दर्ज है, उसके मुताबिक कंपनी का नाम है अनमोल लैंड ऑर्गेनाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड. ये कंपनी लिस्टेड नहीं है और इसका ऑथोराइज्ड़ कैपिटल है एक लाख रुपये. 2008 से ही महेश शाह, उसका बेटा मोनितेश शाह और दुष्यंत शांतिलाल पटेल, ये तीन लोग कंपनी के डायरेक्टर हैं. महेश के पिता चंपकलाल शाह का भी रियल एस्टेट का धंधा अहमदाबाद, राजकोट और मुंबई में था. लेकिन बाप की तरह बेटा धंधे में अच्छा नहीं कर पाया. महेश को जानने वालों के मुताबिक उसका भवन निर्माण का धंधा है ही नहीं, बल्कि वो जमीन की दलाली के धंधे में है.

महेश की अपनी आर्थिक सेहत का अंदाजा इस बात से लग जाता है कि उसकी कंपनी का रजिस्टर्ड ऑफिस, जो अहमदाबाद शहर के सोला रोड इलाके को गोकुल अपार्टमेंट के एम-18-208 में होना बताया गया है कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय को, वहां ऑफिस की जगह कच्छी किंग नामक दाबेली नमकीन की दुकान है, वो भी किसी और की. पूछताछ करने पर पता चला है कि 2012 में उसने अपनी कंपनी का दफ्तर फास्टफूड वाले कारोबारी को बेच दिया था.

सवाल ये उठता है कि जिस आदमी की कंपनी का अपना दफ्तर तक बिक चुका हो, वो तेरह हजार आठ सौ साठ करोड़ रुपये का काला धन किन लोगों के लिए सफेद करने में जुटा था, वो भी आईडीएस स्कीम के तहत. इस रहस्य से पर्दा उठना जरुरी है, लेकिन आयकर विभाग के अधिकारियों के मौजूदा रुख से इसकी संभावना कम ही लगती है. आखिर किसके दबाव में हैं आयकर विभाग के अधिकारी या फिर क्या है उनकी इच्छा, इसे लेकर खुद सवालों के घेरे में है आयकर विभाग ही.

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