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Farmers Protest: क्या है MSP पर विवाद? यहां समझिए पूरा गणित

MSP सरकार की तरफ से किसानों की अनाज वाली कुछ फसलों के दाम की गारंटी होती है. सरकार अभी कुल 23 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है.

नई दिल्ली: पिछले 12 दिनों से कड़ाके की सर्दी में दिल्ली के दरवाजे पर किसान दस्तक दे रहे हैं. किसानों की एक प्रमुख मांग है कि फसल पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी देने वाला कानून बनाया जाए. हालांकि सरकार कानून बनाने पर राजी तो नहीं है, लेकिन किसानों को ये आश्वासन जरूर दे रही है कि MSP खत्म नहीं होगा. किसानों की फसल सरकार MSP पर खरीदती रहेगी लेकिन किसान मान नहीं रहे. वहीं किसानों के इस डर को समझने के लिए आपको पहले MSP के बारे में समझना होगा.

MSP (Minimum Support Price) सरकार की तरफ से किसानों की अनाज वाली कुछ फसलों के दाम की गारंटी होती है. सरकार अभी कुल 23 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करती है. MSP की गणना हर साल सीजन की फसल आने से पहले तय की जाती है. बाजार में उस फसल के रेट भले ही कितने ही कम क्यों न हो, सरकार उसे तय MSP पर ही खरीदेगी. हालांकि सरकार MSP पर खरीद के लिए बाध्य नहीं है. MSP पर फसल खरीदने का कोई कानून नहीं है. भले ही सरकार किसानों से उनकी फसल MSP पर खरीदती हो, लेकिन सरकार इसके लिए बाध्य नहीं है. क्योंकि ऐसा कोई कानून नहीं है, जो सरकार को किसानों से उनकी फसल MSP पर खरीदने को बाध्य करता हो. किसान ऐसा ही कानून बनाने की मांग कर रहे हैं.

कहां से हुई MSP की शुरुआत?

अगर थोड़ा पीछे जाएं तो 1965 में भारत भयंकर अनाज के संकट से जूझ रहा था. तब भारत लाल गेहूं का आयात करने के लिए मजबूर था. जिसे PL 480 कहा जाता था. उस वक्त भारत का कोई अनाज बैंक नहीं होता था. भारत के पास पर्याप्त फॉरेन एक्सजेंच भी नहीं था, जिससे हम वैश्विक बाजार से कोई अनाज खरीद पाते. यहीं से MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की शुरुआत हुई.

इसके बाद हरित क्रांति आई और आने वाले कुछ सालों में भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर हो गया. 1960 के दशक में हरित क्रांति में पंजाब की बड़ी भूमिका थी. पंजाब ने गेंहू और चावल उगाना शुरू किया लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है. आज फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया यानी FCI के पास बड़ी मात्रा में अनाज का भंडार है. आज सरकार का अनाज का भंडार 97 मिलियन मिट्रिक टन है, जबकि 1965 में सिर्फ 7 मिलियन मिट्रिक टन अनाज खरीदने के पैसे नहीं थे. सरकार के इस बफर स्टॉक में मौजूद अनाज की कीमत 1.80 लाख करोड़ रुपये की है. ये एक तरह से डेड कैपिटल है, क्योंकि इतने अनाज की जरूरत नहीं है.

अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं

किसानों से MSP पर खरीदे गए अनाज से सरकार सिर्फ PDS में राशन बांटती है. इसके अलावा अगर बाजार में किसी अनाज की कमी होती है, तो सरकार अपने भंडार से अनाज जारी करती है. लेकिन जानकारों का मानना है कि भंडारों में रखा सरकार का ज्यादातर अनाज बर्बाद हो रहा है. इसके बावजूद सरकार हर साल किसानों से अनाज खरीदती ही है जो अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है.

कृषि अर्थशास्त्री प्रोफेसर अशोक गुलाटी का कहना है, 'आज देश में इतना अनाज है कि देश में रखने की जगह नहीं है. किसान कहता है कि मेरे से ले लो, चाहे जहां फेंको. आज देश को दलहन और तिलहन की जरूरत है. इनका काफी इंपोर्ट होता है. उनके लिए प्रोक्योर करके एमएसपी क्यों नहीं करते, सिर्फ गेहूं और चावल से आगे बढ़ना है हमें?'

अब सवाल ये है कि MSP पर सबसे ज्यादा जोर पंजाब और हरियाणा के किसान का ही क्यों है? क्योंकि MSP का सबसे ज्यादा फायदा पंजाब और हरियाणा के किसानों को मिल रहा है. पंजाब के किसानों का 95% से ज्यादा अनाज तो MSP पर बिक जाता है लेकिन बाकी देश के सिर्फ 6% किसान ही अपना अनाज MSP पर बेच पाते हैं.

प्रोफेसर अशोक गुलाटी का कहना है, 'पंजाब के किसान को MSP से सबसे ज्यादा फायदा होता है. गेहूं और चावल मंडी में लाता है, उसका 95 से 97 प्रतिशत सरकार खरीदती है. 1965 से यह प्रक्रिया शुरू हुई थी और आज तक सिर्फ 6% किसानों को फायदा हुआ है. सरकार PDS के लिए खरीद करती है, वो सबसे ज्यादा पंजाब से खरीदती है.'

इतना पड़ेगा बोझ

वहीं सरकार के लिए समस्या ये है कि अगर उसने सभी फसलें MSP पर खरीदनी शुरू कर दीं तो सरकार के खजाने पर बहुत ज्यादा बोझ पड़ जाएगा. ये बोझ 15 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का होगा और अगर इसके बाद बाकी किसानों ने भी अपनी फसलें MSP पर खरदीने की मांग कर दी, तो तब सरकार क्या करेगी? वहीं सारी 23 फसलें MSP पर खरीदीं जाती है तो 15 लाख करोड़ का बोझ आएगा. ऐसे में अपनी कमाई जितना तो सरकार को MSP पर खर्च करना होगा.

कृषि अर्थशास्त्री विजय सरदाना का कहना है, '23 फसलों का टोटल प्रोडक्शन निकलाते हैं और टोटल एमएसपी खरीदते हैं तो ये टोटल 15 लाख करोड़ होता है. जिस तरह से किसानों ने घेराबंदी कर दी, कल को अगर प्राइवेट सेक्टर भी कह दे कि हम नहीं खरीदेंगे तो सरकार क्या करेगी? व्यापारी वर्ग क्या करेगा? वो कहेगा हम बाजार से नहीं खरीदेंगे, सरकार से खरीदेंगे तो सरकार को 15 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे. ऐसे में किसान खड़ा होगा और कहेगा कि मैं सबकुछ छोड़कर वही उगाऊंगा जो सरकार खरीदेगी. ऐसा होने पर 30 लाख करोड़ रुपये का कृषि खरीद का बजट होगा और आपका टोटल रेवेन्यू 16 लाख करोड़ है तो क्या देश पर ताला लगवाना है?'

खेती में लाना होगा बदलाव

जानकारों का मानना है कि पंजाब के किसानों को अपनी खेती करने के तरीके बदलने होंगे. पंजाब के किसानों को गेहूं, धान के अलावा बाकी फसलें भी उगानी होंगी. बिचौलियों से किसानों को बचाना होगा. विजय सरदाना का कहना है, 'किसान फसल पर न जाए, वो जमीन पर जाए. आज जिस जमीन पर किसान गेहूं उगाता है और उसे 1900 रुपये की एमएसपी मिलती है तो उसी सीजन में उसी जमीन पर वो सरसों उगाएगा. ऐसे में उसे 3800 रुपये मिलते हैं. जिसका मार्केट रेट 60 रुपये है. किसानों को बिचौलिए गुमराह कर रहे हैं. एफसीआई से आढ़तिए का कमीशन बंधा हुआ है. कमीशन के चक्कर में एक तरफ किसान को बर्बाद कर रहा है. जिस देश में 70 प्रतिशत तिलहन का आयात हो रहा है, वहां गेहूं और चावल उगा रहे हैं.'

यह भी पढ़ें: किसान आंदोलन के आगे झुकी सरकार, लिखित प्रस्ताव में दे सकती है MSP की गारंटी- सूत्र किसान आंदोलन: तीन अमेरिकी सांसदों ने भारतीय राजदूत को लिखा पत्र, किसानों के प्रति भारत सरकार के रवैये पर जताई चिंता

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