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IN DEPTH: महंगाई के मोर्चे पर कहां खड़ी है मोदी सरकार?

नई दिल्ली: मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने वाले हैं. महंगाई के मोर्चे पर कहां खड़ी है मोदी सरकार ? खाने-पीने से लेकर जरूरत का सामान सस्ता हुआ ? साल 2014 में हिमाचल प्रदेश की रैली में महंगाई का मुद्दा छेड़कर मोदी ने आम जनता की नब्ज पकड़ ली. देश से महंगाई के मोर्चे पर अच्छे दिन लाने का भरोसा दिया था. कांग्रेसी महंगाई से ऊबी जनता ने मोदी की बात सुनी और सरकार बना दी अब मोदी सरकार के तीन साल बाद फिर वही सवाल उठ खड़ा हुआ है. क्या महंगाई के मोर्चे पर देश के अच्छे दिन आए ? मोदी सरकार ने महंगाई कम करने के लिए क्या किया ? क्या मोदी राज में महंगाई दर घटी है ? क्या खाने-पीने से लेकर जरूरत का सामान सस्ता हुआ ? मोदी सरकार के खाद्य आपूर्ति मंत्री रामविलास पासवान मानते हैं कि महंगाई कम हुई है लेकिन आंकड़े इसके उलट कहानी बयां करते हैं. सबसे पहले बात खाने पीने के सामान की करते हैं 26 मई 2014 को एक किलो आटा देश के विभिन्न शहरों में 17 से 43 रुपये के बीच मिल जाता था जबकि मई 2017 में आटे की कीमत 19 से 50 रुपये प्रतिकिलो के बीच है. - चावल के दाम 20 से 40 रुपये की जगह 18 से 47 रुपये प्रति किलो हैं - अऱहर की दाल पहले 61 से 86 रुपये प्रति किलो पर मिल रही थी जबकि अब ये कीमत 60 से 145 रुपये के बीच है. बीच में ये 200 रु. प्रतिकिलो तक जा पहुंची थी. - 31 से 50 रुपये के बीच मिलने वाली चीनी अब 34 से 56 रुपये प्रतिकिलो मिल रही है - जबकि दूध की कीमत 25 से 46 रुपये से बढ़कर 28 से 62 रुपये प्रति लीटर है. यानि खाने पीने की प्रमुख वस्तुओं की महंगाई कम होने के बजाय बढ़ गई है. यही वजह है कि विरोधी हमलावर हैं. हांलाकि इस आलोचना के बीच महंगाई का सरकारी आंकड़ा सरकार के लिए राहत भरा है. - मई 2014 में खुदरा महंगाई दर जहां 8.2 प्रतिशत के आसपास थी वो अप्रैल 2017 का आंकड़ा 2.99 प्रतिशत है. - इसी तरह खाने पीने की चीजों की खुदरा महंगाई दर 8.89 फीसदी से घटकर 0.61 है सरकारी आकंड़ों में तो महंगाई कम नजर आती है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है, जिसकी वजह से आम आदमी को वो राहत नहीं मिल पाती जिसकी उसे उम्मीद होती है. लेकिन ऐसा क्यों होता है, असल और आंकड़ों का ये फर्क क्यों है? इसकी वजह 2014 के चुनाव से पहले मोदी ने खुद बताई थी. मोदी के मुताबिक रियल टाइम डाटा नहीं होने की वजह से सरकार महंगाई कम नहीं कर पाती. जो कमी पीएम उम्मीदवार के तौर पर मोदी ने बताई थी क्या वो कमी पीएम बनने के बाद वो खुद दूर कर पाए हैं? क्या सरकार बनने के 3 साल बाद मोदी सरकार रियल टाइम डाटा कलेक्ट कर पाने में सक्षम हुई है? जिस रियल टाइम डाटा के मुद्दे पर मोदी कांग्रेस सरकार को घेरा करते थे, उस रियल टाइम डाटा को जुटा पाने में अब तक उनकी खुद की सरकार भी सक्षम नहीं हो पाई है. महंगाई के सही-सही आकंड़े जानने के लिए सरकार तीन साल बाद भी गैरसरकारी संस्था की मदद लेने की सोच रही है. ईंधन की बात करें तो - एक लीटर पेट्रोल की कीमत दिल्ली में 71.41 रुपये से घटकर 65 रुपये 9 पैसे के करीब आ गयी है - लेकिन डीजल 56 रुपये 71 पैसे के बजाए 57 रुपये 35 पैसे की दर पर मिल रहा है. - दिल्ली में सब्सिडी वाला रसोई गैस का सिलिंडर मई 2014 के 414 रुपये के मुकाबले अब 442.77 रुपये में मिल रहा है पर यहां विरोधियों की दलील है कि दुनिया के बाजार में तेल-डीजल बनाने का कच्चा माल पहले की अपेक्षा जितना सस्ता हुआ है मोदी सरकार उस अनुपात में पेट्रोल डीजल सस्ता नहीं कर पायी है. अगर सब्जियों की बात करें तो मई 2014 में टमाटर 18 रु. प्रति किलोग्राम था अब 20 से 30 रूपए किलो है. मई, 2014 में आलू 23 रुपए किलोग्राम था अब आलू 8-10 रूपए किलो है प्याज लगभग 24-30 रूपए किलो था अब 10 से 15 रूपए किलो है कुल मिलाकर महंगाई के मोर्चे पर मोदी सरकार का मिला-जुला प्रदर्शन है. कुछ चीजों के दाम घटे हैं तो कुछ के दाम बढ़े भी हैं. लेकिन महंगाई के मोर्चे पर अब भी पीएम मोदी से देश को प्रभावी और स्थायी समाधान की उम्मीद हैं, जमाखोरी, मुनाफाखोरी महंगाई की बड़ी वजह हैं जिनसे निपटने के लिए अभी कोई बड़ा नियम नहीं आया है. किसान की पैदावार को संभाल न पाने की वजह से हुई बर्बादी भी दाम बढ़ाती है उस दिशा में भी मोदी सरकार ने कोई खास काम नहीं किया है. 1 देश, एक बाजार 1 टैक्स वाले जीएसटी को ला कर महंगाई पर नकेल लगाने का दावा है.
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