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Xप्लेन: क्या बनी हुई इमारत के नीचे बेसमेंट बनाना कानूनी है? जानिए

नगर निगम या संबंधित स्थानीय प्राधिकरण द्वारा पास किए गए मूल स्वीकृत नक्शे में यदि बेसमेंट का प्रावधान पहले से मौजूद नहीं है, तो इमारत बनने के बाद उसमें बेसमेंट की खुदाई करना पूरी तरह से गैर-कानूनी है.

देश की राजधानी दिल्ली में एक बार फिर अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी के कारण एक भयानक हादसा सामने आया है. दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के साउथ कैंपस के पास स्थित सत्य निकेतन इलाके में 'हॉस्टल डेज़' नामक 5-मंज़िला पेइंग गेस्ट (PG) इमारत अचानक ताश के पत्तों की तरह ढह गई. हादसे के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस, एनडीआरएफ (NDRF) और अग्निशमन विभाग की टीमों ने मौके पर पहुंचकर व्यापक राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिया.

शुरुआती जांच, चश्मदीदों के बयानों और स्थानीय रिपोर्टों से जो तथ्य सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं. यह इमारत लगभग 40 से 50 साल पुरानी थी. इतनी पुरानी और कमजोर संरचना के बावजूद, इसके निचले हिस्से में किराए पर देने के लिए कमर्शियल स्पेस और बेसमेंट बनाने का काम ज़ोर-शोर से चलाया जा रहा था. ऊपरी पांच मंजिलों के भारी बोझ के बीच, बिना किसी वैज्ञानिक तकनीक या सुरक्षा उपाय के नीचे की गई बेसमेंट की खुदाई ने नींव के मुख्य पिलरों को पूरी तरह से खोखला कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप यह जानलेवा हादसा हुआ.

क्या बनी हुई इमारत के नीचे बेसमेंट बनाना कानूनी है?

दिल्ली में इमारतों के निर्माण और बदलाव को लेकर बेहद सख्त नियम तय किए गए हैं. नगर निगम या संबंधित स्थानीय प्राधिकरण द्वारा पास किए गए मूल स्वीकृत नक्शे में यदि बेसमेंट का प्रावधान पहले से मौजूद नहीं है, तो इमारत बनने के बाद उसमें बेसमेंट की खुदाई करना पूरी तरह से गैर-कानूनी है.

यदि कोई मकान मालिक अपनी मौजूदा इमारत में किसी भी प्रकार का ढांचागत बदलाव करना चाहता है, तो उसे निम्नलिखित कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना अनिवार्य होता है:

संशोधित प्लान की स्वीकृति: मकान मालिक को दिल्ली नगर निगम (MCD) के पास एक संशोधित बिल्डिंग प्लान जमा करना होता है.

स्ट्रक्चरल सेफ्टी सर्टिफिकेट: यह प्रमाणित करना आवश्यक होता है कि नई खुदाई से मौजूदा इमारत या आसपास के ढांचे को कोई खतरा नहीं पहुंचेगा.

एनओसी (NOC) प्राप्त करना: अग्निशमन विभाग और संबंधित नागरिक निकायों से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना होता है.

कानूनी रूप से, केवल ज़मीन का मालिक होने मात्र से किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा अनुसार ज़मीन के नीचे खुदाई करने का अधिकार नहीं मिल जाता.

दिल्ली यूनिफाइड बिल्डिंग बाय-लॉज़ (UBBL), 2016 और बेसमेंट के नियम

दिल्ली में बेसमेंट निर्माण से जुड़े सभी प्रावधान मुख्य रूप से यूनिफाइड बिल्डिंग बाय-लॉज़ (UBBL), 2016 और दिल्ली मास्टर प्लान-2021 द्वारा संचालित होते हैं. इन नियमों की धारा 7.4 में बेसमेंट निर्माण को लेकर निम्नलिखित कड़े मानक तय किए गए हैं:

सक्षम प्राधिकारी की लिखित अनुमति (Clause 7.4): बिना नगर निगम अधिकारी की लिखित स्वीकृति और ज़ोनल डेवलपमेंट प्लान के नियमों का पालन किए बेसमेंट की खुदाई शुरू नहीं की जा सकती.

ऊंचाई और चौड़ाई के तय मानक (Clause 7.4.1): बेसमेंट के भीतर फर्श से लेकर बीम के निचले हिस्से तक की न्यूनतम स्पष्ट ऊंचाई 2.4 मीटर होनी चाहिए. इसकी चौड़ाई भी कम से कम 2.4 मीटर होना अनिवार्य है. हालांकि, यह अनुमति भी प्लॉट के आकार, सेटबैक नियमों और मिट्टी की भार सहने की क्षमता पर निर्भर करती है.

वॉटरप्रूफ़िंग और सीलन से बचाव: बेसमेंट ज़मीन के नीचे स्थित होता है, इसलिए इसमें पानी के रिसाव की संभावना सबसे अधिक होती है. बाय-लॉज़ के अनुसार, बेसमेंट की दीवारों और फ़र्श पर उच्च स्तरीय वॉटरप्रूफ़िंग, डैम्प-प्रूफ़िंग और पानी की निकासी का समुचित इंतज़ाम होना चाहिए.

पड़ोसी की संपत्ति की सुरक्षा और कानूनी जवाबदेही: बेसमेंट निर्माण के दौरान यदि पड़ोसी की संपत्ति, दीवार या नींव को कोई नुकसान पहुंचता है, तो उसकी पूरी कानूनी और वित्तीय ज़िम्मेदारी निर्माण कराने वाले मालिक की होगी. इसके लिए प्रक्रिया के दौरान ही मालिक से एक 'इंडेम्निटी बॉन्ड' (हर्जाना भरने का शपथ-पत्र) जमा करवाया जाता है.

पुराने घर के नीचे खुदाई: स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग के नज़रिए से खतरनाक क्यों?

सिविल और स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स के अनुसार, बनी हुई पुरानी इमारत के नीचे खुदाई करना बेहद संवेदनशील और तकनीकी काम है. जब किसी पुरानी इमारत की नींव 40-50 साल पहले रखी गई हो, तो उसकी मिट्टी की पकड़ और पिलरों का ढांचा उसी समय के लोड-बेयरिंग डिज़ाइन के हिसाब से बना होता है.

1. नींव की मिट्टी का खिसकना : जब किसी 5-मंज़िला इमारत के नीचे 8 से 10 फीट गहरी खुदाई की जाती है, तो नींव को सहारा देने वाली आसपास की मिट्टी अचानक हट जाती है. इससे नींव के नीचे का दबाव असंतुलित हो जाता है और इमारत अचानक धंसने लगती है.

2. 'अंडरपिनिंग' तकनीक का अभाव: यदि पुरानी इमारत के नीचे बेसमेंट बनाना बेहद ज़रूरी भी हो, तो इसके लिए अवरोही क्रम में अंडरपिनिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें पिलरों को अस्थायी जैक और नए कंक्रीट सपोर्ट से थामकर बहुत छोटे-छोटे हिस्सों में धीरे-धीरे काम किया जाता है. स्थानीय ठेकेदारों द्वारा बिना किसी एक्सपर्ट इंजीनियर की देखरेख के सीधा फावड़ा और जेसीबी चलाना सीधे तौर पर मौत को बुलावा देना है.

3. पिलर और बीम में दरारें: नींव कमजोर होते ही इमारत के मुख्य लोड-बेयरिंग कॉलम (पिलर) और बीम पर अचानक अतिरिक्त खिंचाव पड़ता है. इसके चलते पूरी इमारत का ढांचा संभल नहीं पाता और सेकंडों के भीतर धराशायी हो जाता है.

प्रशासनिक चूक और कार्रवाई का दायरा

सत्य निकेतन की यह घटना कोई अकेली घटना नहीं है. दिल्ली के कई घने बसे इलाकों (जैसे लक्ष्मी नगर, मुखर्जी नगर, करोल बाग और सत्य निकेतन) में छात्रों के लिए PG और कमर्शियल स्पेस की मांग इतनी अधिक है कि मकान मालिक अधिक किराए के लालच में सुरक्षा मानकों और नागरिक कानूनों को ताक पर रख देते हैं.

इस हादसे के बाद दिल्ली पुलिस ने इमारत के मालिक और ठेकेदार के खिलाफ लापरवाही से मौत का मामला दर्ज कर लिया है. लेकिन सवाल यह उठता है कि घनी आबादी वाले इलाके में कई दिनों से चल रही इस गैर-कानूनी खुदाई पर स्थानीय नगर निगम (MCD) और सतर्कता विभाग की नज़र समय रहते क्यों नहीं पड़ी?

सत्य निकेतन की इमारत दुर्घटना इस बात का कड़वा उदाहरण है कि कैसे चंद रुपयों के लालच और प्रशासनिक अनदेखी के कारण मासूम लोगों की जान जोखिम में पड़ जाती है. किसी भी पुरानी या नई इमारत के साथ ऐसा खिलवाड़ न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि पूरी तरह से जानलेवा है. 

संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.

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