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कोमा में एडमिट भारतीय सेना के जवान से पत्नी चाहती है संतान, याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट बोला- 'यह उनका...'

Delhi High Court: कोर्ट का फैसला जवान की पत्नी की याचिका पर आया है. पत्नी ने याचिका में मांग की थी कि IVF के लिए उसके पति के जेनेटिक मटीरियल को निकालने और उसे सुरक्षित रखने के निर्देश दिए जाएं. 

Delhi HC Verdict: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अच्छा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने IVF प्रक्रिया जारी करने की अनुमति एक सेना के जवान को दी है. यह जवान लगातार कोमा जैसी हालत में है. ऐसे में भविष्य में उनके ठीक होने की उम्मीद नहीं है. जस्टिस पुरुशेंद्र कुमार कौरव ने कहा है कि जवान की पहले दी गई सहमति, जो उसने IVF प्रक्रिया शुरू करते समय दी थी, इस बार पर्याप्त मानी जाएगी. 

इसके अलावा असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी विनियमन अधिनियम के तहत पत्नी को उसकी ओर से दी गई वैध सहमति माना जाएगा. कोर्ट का फैसला जवान की पत्नी की याचिका पर आया है. पत्नी ने याचिका में मांग की थी कि IVF के लिए उसके पति के जेनेटिक मटीरियल को निकालने और उसे सुरक्षित रखने के निर्देश दिए जाएं. 

याचिकाकर्ता ने कोर्ट में क्या बताया? 

याचिकाकर्ता ने बताया कि जून 2023 में दंपति ने संतान प्राप्ति के लिए IVF प्रक्रिया अपनाने का फैसला किया था. जुलाई 2025 में गश्त के दौरान उसके पति काफी ऊंचाई से गिर गए थे. इससे उसके सिर में गंभीर चोट आई थी. यह एक तरह की ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरी थी. इसके बाद जवान का सेना के अस्पताल में इलाज चल रहा था. यहां दंपति की IVF प्रक्रिया रोक दी गई. इसके बाद महिला ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. संविधान के तहत अपने मातृत्व के अधिकार, गरिमा और प्रजनन संबंधी स्वायत्ता के अधिकार का दावा किया. 13 अप्रैल को दिए अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता और उसके पति ने अपनी मर्जी से IVF प्रक्रिया का चुनाव किया. रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत या संकेत मौजूद नहीं है. इससे यह लगे की पति ने इसके लिए सहमति नहीं दी थी. 

कोर्ट बोली- यह एक मौलिक अधिकार है

कोर्ट ने राय दी कि भले याचिकाकर्ता के पति की ओर से सहमति का कोई संकेत न हो. फिर भी अधिकारियों के लिए यह उचित, तर्कसंगत, न्यायसंगत होगा कि वे IVF प्रक्रिया को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए कदम उठाएं. कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो याचिकाकर्ता के पति द्वारा पहले दी गई सहमति व्यर्थ हो जाएगी.

IVF प्रक्रिया अपनाने का उनका मूल उद्देश्य बेमानी हो जाएगा. स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि प्रक्रिया वास्तव में न्याय की सहायक होती है. किसी प्रक्रियात्मक प्रावधान के केवल शाब्दिक और कठोर नियमों का पालन करने के चक्कर में, उस कानून के मूल उद्देश्य को ही नष्ट कर देना किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए. 

कोर्ट ने कहा कि याद रखना जरूरी है कि प्रजनन संबंधी स्वायतत्ता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है. कोर्ट ने कहा कि ART एक्ट की व्याख्या इस तरह से की जानी चाहिए, जिससे उक्त अधिकार को बढ़ावा मिले. न कि उससे कोई कमी आए. अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता की संतान होगी या नहीं, यह इंसानी हाथों में नहीं है. यह किस्मत ही तय करती है. किसी व्यक्ति को माता पिता का सौभाग्य मिलेगा या नहीं. अदालत ने इस दौरान भागवत पुराण का हवाला देते हुए कहा कि एक जीवित प्राणी को दैव की देखरेख में शरीर प्राप्त होता है.

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