बिहार: एक गांव जहां मौत के डर से लोग नहीं बनवाते हैं शौचालय!

पटना: मोदी सरकार स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश के ग्रामीण इलाक़ों को खुले में शौच मुक्त करने का अभियान चला रही है. इसी का नतीजा है कि देश में कई गांव खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त भी हो चुके हैं. लेकिन देश में एक गाँव ऐसा भी है जहां आज तक किसी भी घर में शौचालय नहीं बन पाया, यहाँ के लोग आज भी खुले में ही शौच करने जाते हैं. यहाँ के घाटों में फ़्रिज, कूलर, एलसीडी टीवी, इन्वर्टर, आरओ और गीज़र जैसी तमाम सुविधाएँ हैं, नहीं है तो सिर्फ़ एक अदद 'शौचालय' और शौचालय न होने की वजह है 'मौत का डर'...
एक भी शौचालय न होने के पीछे है 'अंधविश्वास'
बिहार की राजधानी पटना से क़रीब 130 किलोमीटर दूर नवादा जिले का ग़ाज़ीपुर गांव अंधविश्वास का तहखाना बन चुका है. स्वच्छता अभियान के तहत जहाँ गावों को खुले में शौचमुक्त बनाया जा रहा है वहीं इस गाँव के 2000 लोग आज भी खुले में ही शौच करने जाते हैं. ऐसा नहीं है कि यहाँ के लोग शौचालय बनवाने के लिए सक्षम नहीं हैं बल्कि इसके पीछे की वजह बेहद ही डरावनी और हैरान करने वाली है...इस सम्पन्न गाँव में एक भी शौचालय न होने के पीछे है 'अंधविश्वास'...ऐसा अंधविश्वास जो यहाँ के पढ़े-लिखे लोगों की सोच और समझ पर हावी हो चुका है.
दरअसल यहाँ के लोगों का मानना है कि जो कोई घर में शौचालय बनवाने की सोचता है उसके घर में किसी किसी की मौत हो जाती है. डर का आलम ये है कि शौचालय बनवाना तो दूर लोग शौचालय का नाम सुनते ही डर जा रहे हैं ...गाँव की महिलाएँ तमाम परेशानियों के बावजूद खुले में शौच करने को मजबूर हैं लेकिन मौत का डर ऐसा है कि कोई भी शौचालय बनवाने को तैयार नहीं है, ये चाहती हैं कि सरकार ख़ुद पहल करके सभी घरों में शौचालय बनवाए.
पूरे गांव में कोई भी नहीं जुटा सका शौचालय बनवाने की हिम्मत
दरअसल क़रीब 23 साल पहले गाँव के ही पप्पू सिंह नाम के एक शख़्स ने घर में शौचालय बनवाने के लिए घर में गड्ढा खुदवाया था लेकिन इसी दौरान किन्हीं कारणों से उनकी मौत हो गई जिससे यहाँ के लोगों में डर बैठ गया. इसके ठीक 10 साल बाद इसी गांव के श्यामदेव सिंह के बड़े बेटे की मौत हुई, संयोग से उस वक़्त श्यामदेव के घर में भी शौचालय बनवाने के लिए गड्ढे की खुदाई जारी थी. बस फिर क्या था, लोगों में ये वहम घर कर गया कि जो कोई भी घर में शौचालय बनवाने की सोचेगा उसके घर में किसी न किसी की मौत होनी तय है, डर इतना गहरा है कि इतने साल बीत जाने के बाद भी आज तक पूरे गाँव में कोई भी शौचालय बनवाने की हिम्मत नहीं जुटा सका.
ऐसा भी नहीं है कि इस गाँव में कभी शौचालय नहीं बना, गाँव के प्राइमरी स्कूल में स्वच्छता मिशन के तहत 2007 में दो शौचालयों का निर्माण किया गया था लेकिन लोगों में डर का आलम ये है कि पिछले 10 सालों से इन शौचालयों का इस्तेमाल नहीं हो रहा. स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी शौचालय की बजाय बाहर ही जाते हैं, घर के बड़ों ने बच्चों को हिदायत दे रखी है कि स्कूल के शौचालय में नहीं जाना है.
स्कूल के प्रिन्सिपल नरेश के मुताबिक़ स्कूल के शिक्षक और कर्मचारी शौचालय का इस्तेमाल करते हैं लेकिन शौचालय की हालत देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इसका इस्तेमाल नहीं होता. स्कूल पर मौजूद ग्रामीणों ने प्रिन्सिपल पर सरकारी डाँट से बचने के लिए झूठ बोलने का आरोप लगाया. सिर्फ़ इतना ही नहीं लोगों ने हमें ये भी बताया कि शौचालय न होने की वजह से इस गाँव की शादियाँ भी टूटती हैं और रिश्तेदार उनके घर आने में कतराते हैं.
सब कुछ है सिवाय शौचालय के
इस गांव में अध्यापक पद से रिटायर हो चुके शिवदानी प्रसाद शर्मा का भी घर है. घर के अंदर गीज़र, फ़्रिज, कूलर, इन्वर्टर, एलसीडी टीवी सब कुछ है सिवाय शौचालय के. शिवदानी प्रसाद ख़ुद मानते हैं कि ये अंधविश्वास है लेकिन फिर भी ख़ुद की आँखों के सामने हुई उन घटनाओं को वो झुठला नहीं पा रहे हैं और यही वजह है कि वो डर आज तक उनके अंदर से निकल नहीं पाया. पहले आप-पहले आप के चक्कर में आज तक कोई भी शौचालय नहीं बनवा पाया, शिवदानी प्रसाद चाहते हैं कि सरकार की पहल पर एक साथ कई घरों में शौचालय का निर्माण किया जाए.
इस पूरे मामले में हमनें नवादा के ज़िलाधिकारी से बात करनी चाही लेकिन उन्होंने कोई भी प्रतिक्रिया देने से साफ़ इंकार कर दिया. इसलिए हमने इलाके के एसडीओ शम्भु शरण पाण्डेय से बात की, उन्होंने बताया कि गाजीपुर में शौचालय निर्माण को लेकर लोगों के मन मे अंधविश्वास क़ायम हो चुका है इसलिए हम लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं.
फ़िलहाल शौचालय से पूरी तरह से अछूता है यह गांव
कहते हैं 'जहाँ सोच-वहाँ शौचालय' लेकिन बिहार के नवादा जिले का ये ग़ाज़ीपुर गाँव फ़िलहाल शौचालय से पूरी तरह से अछूता है. इस गाँव में इंजीनियर, शिक्षक, रेलवे और पुलिस में नौकरी करने वाले लोग रहते हैं यानी कि इस गाँव में शिक्षित लोगों की कमी नहीं है लेकिन इन लोगों की सोच और समझ पर इस वक़्त अंधविश्वास की एक गहरी परत चढ़ी हुई है. गाँववालों की आख़िरी उम्मीद बिहार सरकार से है कि वो अंधविश्वास की इस परत को हटाएगी.
Source: IOCL



























