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Explained: क्या ममता बनर्जी की TMC विभाजन की ओर बढ़ रही, बंगाल में कोई भी पार्टी टूटने के बाद क्यों नहीं बचती?

TMC Downfall: सत्ता में रहते हुए TMC भले ही एकजुट दिखती थी, लेकिन विपक्ष में आते ही उसकी दरारें खुलकर सामने आ गई हैं. बंगाल के इतिहास में टूट के बाद किसी पार्टी का बच पाना लगभग नामुमकिन रहा है.

कुछ हफ्ते पहले तक पश्चिम बंगाल की राजनीति की तस्वीर कुछ और थी. ममता बनर्जी पूरे दमखम के साथ 2026 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी थीं. बीजेपी से सीधी टक्कर का नैरेटिव सेट किया जा रहा था. लेकिन फिर 4 मई को चुनावी नतीजों ने बिसात पलट दी और दीदी को सत्ता से बाहर कर दिया. इसके बावजूद अब जो हो रहा है, उसने सबको चौंका दिया है. यह लड़ाई अब बीजेपी बनाम तृणमूल कांग्रेस (TMC) नहीं, बल्कि TMC बनाम TMC हो गई है. पार्टी के भीतर बगावत के सुर इतने तेज हो गए हैं कि सवाल उठने लगा है कि क्या ममता बनर्जी की TMC भी उसी रास्ते पर जा रही है, जिस पर कभी बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट पार्टी गई थीं और क्या बंगाल में कोई पार्टी टूटने के बाद बचती नहीं है?

बंगाल में ममता की पार्टी टूटने का मामला क्या है?

पूरा मामला 25 मई 2026 से गरमाया, जब TMC के चार विधायकों ने अपनी विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. ये विधायक थे- स्वप्ना मांडल, तापस चटर्जी, जगन्नाथ छट्टोपाध्याय और रूपाली बिस्वास. लेकिन यह महज इस्तीफे नहीं थे, यह एक बड़ी बगावत का आगाज था. इन विधायकों ने सिर्फ इस्तीफा ही नहीं दिया, बल्कि यह दावा भी कर दिया कि उनके साथ TMC के करीब 50 विधायक हैं, जो अंदर ही अंदर इस बगावत का समर्थन कर रहे हैं. कुछ विधायक इस्तीफा देकर बीजेपी में भी शामिल हो गए. इन घटनाओं ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ममता बनर्जी की TMC दो फाड़ होने की तरफ बढ़ रही है?

टेलीग्राफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि हाल ही में हुई ममता बनर्जी की एक रैली में पार्टी की कमजोर होती पकड़ साफ दिखी. रैली में पुलिस की कई पाबंदियां थीं, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह थी कि पार्टी के बड़े चेहरे और स्टार प्रचारक गायब रहे. बड़ी संख्या में कार्यकर्ता भी रैली में नहीं पहुंचे. यह इस बात का संकेत था कि अब जमीनी स्तर पर भी पार्टी के प्रति मोहभंग बढ़ रहा है.

TMC के विधायक नाराज क्यों हैं?

बागी विधायकों के बयानों और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अंदरूनी नाराजगी की मुख्य वजहें ये हैं:

  • परिवारवाद का आरोप: कई विधायकों का कहना है कि पार्टी के सारे फैसले अब सिर्फ एक परिवार के इशारे पर हो रहे हैं. जमीनी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं की सुनवाई नहीं हो रही.
  • टिकट वितरण में भेदभाव: चुनाव में जिस तरह से टिकट बांटे गए, उससे भी कई नेता नाराज थे, जिन्होंने हार के बाद अपनी बात खुलकर रखी.
  • बीजेपी की रणनीति: सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी भी TMC के नाराज विधायकों के संपर्क में है और उन्हें तोड़ने की कोशिश कर रही है.

तो क्या TMC वाकई टूट जाएगी?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि विभाजन की अफवाहें सिर्फ हवा-हवाई नहीं हैं. पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा अब सामूहिक नेतृत्व की मांग कर रहा है और एक व्यक्ति या परिवार के केंद्र में होने का विरोध हो रहा है. हालांकि, ममता बनर्जी ने हर बार सार्वजनिक तौर पर इन खबरों को नकारा है और कहा है कि विपक्ष ऐसी अफवाहें फैला रहा है. लेकिन जिस तरह से एक के बाद एक नेता और विधायक सोशल मीडिया पर नाराजगी जता रहे हैं और पार्टी छोड़ रहे हैं, उससे साफ है कि स्थिति गंभीर है.

बंगाल में कोई पार्टी टूटने के बाद क्यों नहीं बचती?

यह सवाल इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू है. बंगाल की राजनीति का इतिहास गवाह है कि जो पार्टी एक बार टूटती है, वो दोबारा सत्ता या मजबूत विपक्ष की हैसियत हासिल नहीं कर पाती. 3 उदाहरण से समझें:

उदाहरण 1: कांग्रेस का पतन

1970 के दशक तक कांग्रेस का बंगाल में वर्चस्व था. लेकिन इंदिरा गांधी और सिद्धार्थ शंकर राय के बीच की खींचतान और बाद में कांग्रेसी नेताओं का बार-बार टूटकर तृणमूल या वाम दलों में जाना, पार्टी को हाशिए पर ले गया. आज कांग्रेस के पास राज्य की 294 में से गिनती की सीटें हैं.

उदाहरण 2: वाम मोर्चा का सफाया

2011 में 34 साल बाद सत्ता से बाहर हुए वाम मोर्चे से बड़ी संख्या में नेता और कार्यकर्ता टूटकर TMC और बाद में बीजेपी में चले गए. इस टूट ने वाम दलों को इतना कमजोर किया कि आज वो चंद सीटों पर सिमट कर रह गए हैं.

उदाहरण 3: TMC खुद कांग्रेस से टूटकर बनी थी

ममता बनर्जी ने खुद 1998 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी और अपनी आक्रामक छवि के दम पर सत्ता तक पहुंची थीं. अब अगर TMC में ही बड़ी टूट होती है, तो इतिहास खुद को दोहराएगा.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल का मतदाता हमेशा एक मजबूत और एकजुट विपक्ष चाहता है. अगर कोई पार्टी विपक्ष में रहते हुए भी आपस में लड़ती दिखती है, तो जनता का भरोसा उठ जाता है. इसीलिए टूट के बाद कोई भी पार्टी दोबारा खड़ी नहीं हो पाती.

ममता बनर्जी के सामने अब आगे का रास्ता क्या है?

सत्ता से बाहर होने के बाद ममता बनर्जी के सामने 3 सबसे बड़ी चुनौतियां हैं:

  • पार्टी को एकजुट रखना: नाराज विधायकों और नेताओं को मनाना या फिर उन पर सख्त कार्रवाई करना. लेकिन सख्ती से टूट का खतरा और बढ़ सकता है.
  • बीजेपी के विस्तार को रोकना: सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार लगातार TMC के नेताओं को तोड़कर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करेगी.
  • जमीनी कार्यकर्ताओं का भरोसा जीतना: रैलियों में घटती भीड़ और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को दूर करना.

सूत्रों के मुताबिक, पार्टी जल्द ही बड़े स्तर पर संगठन में फेरबदल कर सकती है. लेकिन अगर ममता बनर्जी पार्टी को यह भरोसा नहीं दिला पाईं कि फैसले सामूहिक होंगे और सिर्फ एक परिवार के नहीं, तो TMC का भविष्य अंधकार में जा सकता है.

4 मई 2026 के नतीजों ने सिर्फ सरकार ही नहीं बदली, बल्कि ममता बनर्जी की TMC को उसके अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई में धकेल दिया है. सत्ता में रहते हुए पार्टी भले ही एकजुट दिखती थी, लेकिन विपक्ष में आते ही उसकी दरारें खुलकर सामने आ गई हैं. बंगाल के इतिहास में टूट के बाद किसी पार्टी का बच पाना लगभग नामुमकिन रहा है. अब देखना यह है कि क्या ममता बनर्जी इस इतिहास को बदल पाती हैं या TMC भी बंगाल की राजनीति का एक और अध्याय बनकर रह जाएगी.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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