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Explained: 'हमारे पूर्वज एक' और 'तुम भी हिंदू'... आखिर कब तक सुनेगा मुसलमान, 'घरवापसी' से दिक्कत क्या?

Indian Muslims Diverse Genetic Origin: प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक, 79% भारतीय मुसलमानों का कहना है कि वे ऐसे माहौल में रहना चाहते हैं जहां वे अपनी धार्मिक पहचान को खुलकर जी सकें.

बाबा रामदेव ने 12 जुलाई 2026 को दिल्ली में एक कार्यक्रम में बयान दिया, 'हमारे पूर्वज एक ही हैं. हम सबका DNA भी एक है.' सुनने में भले ही एकता और भाईचारे का संदेश लगे, लेकिन जब यह बात मुसलमानों को कही जाती है, तो इसका विरोध किसी एक वजह से नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान, राजनीति और आस्था के कई जटिल सवालों से जुड़ा है. दूसरी ओर एक तंज और है- 'घरवापसी'. यह सवाल अपने आप में जितना सीधा लगता है, इसकी तहें उतनी ही गहरी हैं. आइए एक्सप्लेनर में जानते हैं कैसे...

बाबा रामदेव ने मुसलमानों और पूर्वजों पर क्या कहा?

बाबा रामदेव ने कहा कि 'भारत में रहने वाले सभी लोगों के पूर्वज एक ही हैं. हिंदू हों या मुसलमान, सबका DNA एक जैसा है.' उन्होंने आगे कहा कि मुसलमानों को यह मान कर लेना चाहिए कि उनके पूर्वज भी हिंदू ही थे और बाद में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया.

रामदेव ने मुसलमानों को टारगेट करते हुए कहा, 'हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से किसी को डरने की जरूरत नहीं है. हम सभी के पूर्वज सनातनी हिंदू आर्य-वैदिक थे, यह बात हमारे सामने ही लिखी हुई है. उनके इस बयान की कई मुस्लिम संगठनों और धार्मिक नेताओं ने तीखी आलोचना की.'

इस बयान पर लखनऊ ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने कहा, 'मुसलमान न तो डरते हैं और न ही घबराते हैं, क्योंकि वे अल्लाह की इबादत करते हैं. हमने हमेशा धर्म के आधार पर भेदभाव का विरोध किया है.'

आखिर मुसलमानों को इस बयान से दिक्कत क्यों है?

मुसलमानों की इस विरोध की 5 बड़ी वजहें हैं, जिन्हें डेटा और रिसर्च के साथ समझना जरूरी है:

1. धार्मिक पहचान का सवाल

इस्लाम में पैगंबर मोहम्मद को आखिरी नबी माना जाता है और उन्हें अल्लाह का आखरी संदेशवाहक कहा जाता है. मुसलमान अपनी धार्मिक पहचान को पैगंबर मोहम्मद और इस्लामी परंपरा से जोड़ते हैं. मुसलमानों से जब उनसे कहा जाता है कि 'तुम्हारे पूर्वज हिंदू थे' तो यह उनकी मौजूदा धार्मिक पहचान को गौड़ बनाने की कोशिश जैसा लगता है. एक तरह से यह कहना कि 'तुम असल में हिंदू हो, बस भूल गए हो' उनकी आस्था पर सीधा हमला है.

प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक, 79% भारतीय मुसलमानों का कहना है कि वे ऐसे माहौल में रहना चाहते हैं जहां वे अपनी धार्मिक पहचान को खुलकर जी सकें.

2. घर वापसी का सता रहा डर

बाबा रामदेव का यह बयान अकेला नहीं है. यह एक बड़ी विचारधारा का हिस्सा है जिसे 'घर वापसी' कहा जाता है. प्यू रिसर्च सेंटर की 2021 की रिपोर्ट 'रिलीजन इन इंडिया: टोलरेंस एंड सेग्रिगेशन' के मुताबिक, भारत में 99% मुसलमान अपनी धार्मिक पहचान को बहुत जरूरी मानते हैं. जब बार-बार यह कहा जाता है कि तुम्हारे पूर्वज हिंदू थे तो मुसलमानों को लगता है कि यह उनके धार्मिक परिवर्तन के लिए जमीन तैयार करने की कोशिश है.

बीते कुछ सालों में कई राज्यों में बने धर्मांतरण विरोधी कानूनों के साथ मिलाकर देखें तो यह आशंका और गहरी हो जाती है. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) के 'रिलीजन सर्वे इंडिया' के मुताबिक, 45% मुसलमानों को लगता है कि उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर खतरा मंडरा रहा है.

3. इतिहास का अलग-अलग नजरिया

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बाबा रामदेव का बयान भारत के इतिहास को सिर्फ एक नजरिए से देखने की कोशिश है, जबकि हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है. भारत में इस्लाम कई रास्तों से आया. अरब व्यापारी केरल के तट पर सातवीं सदी में ही आ चुके थे, सूफी संतों ने अपने संदेश से लाखों दिल जीते, और हां, कुछ मामलों में शासकों के प्रभाव से भी धर्मांतरण हुआ.

मुसलमानों का इतिहास को लेकर अपना नजरिया है. मुसलमानों के लिए उनके पूर्वज वो हैं जिन्होंने पैगंबर मोहम्मद के संदेश को अपनी मर्जी से कबूल किया, न कि कोई ऐसा समूह जो 'असल में हिंदू' था. इस तरह का बयान उनके पूर्वजों की धार्मिक यात्रा और आस्था का अपमान करने जैसा लगता है.

4. DNA और जेनेटिक्स का गलत इस्तेमाल

बाबा रामदेव ने अपने बयान में DNA का हवाला दिया, लेकिन साइंस की मानें तो DNA कभी धर्म नहीं बताता. जेनेटिक्स धर्म और आस्था के बीच फर्क नहीं कर सकता. हां, भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों का जेनेटिक मेकअप काफी हद तक एक जैसा है, लेकिन यह बात सभी भारतीयों पर लागू होती है यानी हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई सब पर.

नेचर जर्नल में 2009 में छपी 'डायवर्स जेनेटिक्स ओरिजिन ऑफि इंडियन मुस्लिम: एविडेंस फ्रॉम ऑटोसोमल एसटीआर लोसी' स्टडी ने भारतीय मुसलमानों के DNA में गहराई से झांक कर देखा. नतीजतन, भारतीय मुसलमानों की जेनेटिक बनावट बहुत विविधतापूर्ण है. इसमें ईरान, मध्य एशिया और अरब क्षेत्र से आए जीनों का भी साफ मिश्रण है.

इंडियन जर्नल ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स की स्टडी के मुताबिक, भारतीय मुसलमानों का DNA स्थानीय आबादी से काफी मिलता-जुलता है, लेकिन इसमें मिडिल ईस्ट और मिडिल एशिया का भी कुछ अंश है. जब DNA साइंस को तोड़-मरोड़कर यह कहा जाता है कि 'देखो, तुम तो हिंदू ही हो' तो यह साइंस का गलत इस्तेमाल है.

5. राजनीतिक माहौल और डर

यह पूरा विवाद एक ऐसे समय में हुआ है जब देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण चरम पर है. CSDS के ही एक अन्य सर्वे के मुताबिक, 60% से ज्यादा मुसलमानों को लगता है कि पिछले कुछ सालों में उनकी स्थिति पहले से खराब हुई है.

'सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ हेट (CSO हेट)' 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में देश में नफरत फैलाने वाली कुल 1,161 घटनाएं दर्ज की गईं. इनमें से 98% घटनाएं सीधे तौर पर मुसलमानों को निशाना बनाकर की गई थीं. इन नफरती भाषणों का मुख्य एजेंडा अक्सर यही होता था कि मुसलमानों को बाहरी या विदेशी संतान बताकर उनकी भारतीयता पर सवाल उठाया जाए.

सेंटर फॉर द एनालिसिस ऑफ रिलीजियस डिफरेंसेज इन एशिया (CARDA) की रिसर्च बताती है कि भारत में मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषणों में साल 2014 के बाद तेज उछाल आया है. ऐसे माहौल में जब बाबा रामदेव जैसी शख्सियत कहती है कि 'तुम्हारे पूर्वज हिंदू थे' तो मुसलमान इसे सिर्फ एक धार्मिक बयान नहीं, बल्कि उनकी पूरी पहचान, संस्कृति और आस्था पर हमले की तरह देखते हैं.

साइंस और इतिहास का असल सच क्या है?

AIIMS की 'जेनेटिक स्टडी इंडियन मुस्लिम' रिसर्च के मुताबिक, भारतीय मुसलमानों का जेनेटिक पूल मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप का ही है. इसका मतलब है कि सदियों पहले उनके पूर्वजों ने वाकई इस्लाम धर्म अपनाया था.

JNU में इतिहास के प्रोफेसर डॉ. नदीम रिजवी कहते हैं, 'इसका यह मतलब कतई नहीं निकलता कि वे असल में हिंदू हैं और आज भी हिंदू ही रहना चाहिए. आपके पूर्वज क्या थे, यह बात आज आपकी धार्मिक पहचान को अमान्य नहीं करती. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे यह कहना कि आपके पूर्वज गुफाओं में रहते थे, इसलिए आपको आज भी गुफा में ही रहना चाहिए. सभ्यता और समाज बदलते हैं, लोग अपनी मर्जी से नए विचार और आस्थाएं अपनाते हैं.'

निचोड़: पूरे विवाद का सबसे बड़ा सबक क्या?

बाबा रामदेव के इस बयान पर मुसलमानों को जो दिक्कत है, उसकी जड़ में एक ही बात है कि अपनी मौजूदा धार्मिक पहचान के लिए सम्मान की कमी का एहसास. यह बयान भले ही एकता का संदेश देने की कोशिश करता हो, लेकिन इसका तरीका एक पक्ष की पहचान को दूसरे में मिलाकर खत्म करने वाला है.

एकता और भाईचारे की शुरुआत किसी के अतीत की जड़ें खोजने से नहीं, बल्कि उसकी वर्तमान आस्था, पहचान और संवैधानिक अधिकारों का पूरा सम्मान देने से होनी चाहिए. यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सबक है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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