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ईरान जंग में फुस्स रहे MQ-9 ड्रोन, फिर क्यों भारत ने की अमेरिका से डील?

भारत ने अमेरिका से एक बार फिर 02 एमक्यू-9 सी गार्डियन ड्रोन को लीज पर लेने का करार किया है. इस सौदे की कुल कीमत 1943 करोड़ है.

ईरान जंग अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है कि भारत ने अमेरिका से एक बार फिर 02 एमक्यू-9 सी गार्डियन ड्रोन को लीज पर लेने का करार किया है. वर्ष 2020 से भारतीय नौसेना लीज पर लेकर इन रिमोटली पायलेटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम, जिन्हें RPAS कहा जाता है, इनके जरिए हिंद महासागर की रखवाली कर रही है. अब जिन एमक्यू-9 ड्रोन को भारतीय नौसेना इस्तेमाल कर रही थी, उनकी लीज खत्म हो रही थी. ऐसे में रक्षा मंत्रालय ने इंडियन नेवी के लिए एक बार फिर से नई लीज पर अमेरिका की जनरल एटॉमिक्स एयरोनॉटिकल सिस्टम्स के साथ करार कर लिया.

अगले 30 महीने तक भारतीय नौसेना लीज (पट्टे) पर लिए इन एमक्यू-9बी ड्रोन्स को ऑपरेट करेगी. इस सौदे की कुल कीमत 1943 करोड़ है. रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, उन्नत प्रणालियों, अत्याधुनिक सेंसर और पेलोड से सुसज्जित एमक्यू-9बी Sea Guardian, भारतीय नौसेना की समुद्री क्षमताओं को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाएगा. ये आरपीएएस, समुद्री क्षेत्र के विशाल क्षेत्र में निरंतर खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही कवरेज प्रदान करेगा, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में होने वाले घटनाक्रमों पर दृष्टि रखने और प्रतिक्रिया देने की भारत की क्षमता सुदृढ़ होगी. 

क्या है खासियत
MQ-9 कोई साधारण क्वॉडकॉप्टर  नहीं हैं बल्कि किसी फाइटर जेट की ही तरह बड़े ड्रोन होते हैं. इसीलिए इन्हें रिमोटली पायलेटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम का नाम दिया जाता है. इन एयरक्राफ्ट में पायलट, कॉकपिट में बैठकर आसमान में उड़ान नहीं भरता है बल्कि जमीन पर रहकर इन एयरक्राफ्ट को रिमोट से फ्लाई करता है या ऑपरेट करता है. इन एमक्यू-9 ड्रोन की लंबाई 36 फीट होती है और इनका विंगस्पैन यानि चौड़ाई करीब-करीब 80 फीट की होती है. एमक्यू-9 रीपर ड्रोन दुनिया के बेहतरीन रिमोटली पायलेटेड एयरक्राफ्ट सिस्टम में से एक माना जाता है जिसका इस्तेमाल अमेरिकी सेना सहित कई नाटो देश करते हैं. एमक्यू-9 रीपर ड्रोन के आर्म्ड वर्जन यानि कॉम्बैट वर्जन को प्रीडेटर के नाम से जाना जाता है. ये एमक्यू-9 ड्रोन मल्टी रोल-मल्टी मिशन आरपीएएस सिस्टम होते हैं. यानि एक एयरक्राफ्ट कई तरह के रोल अपना सकता है और अलग-अलग तरह के ऑपरेशन भी कर सकते हैं. जैसा कि

ये सी-गार्डियन ड्रोन है जो एंटी-सरफेस यानि दुश्मन के युद्धपोत को भी मिसाइल से मार गिराने में सक्षम है तो समंदर के कई सौ फीट नीचे ओपरेट कर रही पनडुब्बी को भी तबाह कर सकता है यानी एंटी-सबमरीन ऑपरेशन भी कर सकता है. ये हेल--HALE तकनीक यानि हाई ऑल्टिट्यूड लॉन्ग एंड्यूरेंस ड्रोन होते हैं. ये 40-50 हजार फीट की ऊंचाई पर 30-30 घंटे तक उड़ान भर सकते हैं. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जब ये इतनी खूबियों से लैस हैं तो आखिरकार ईरान जंग में इतने ज्यादा कोई गिर गए. 

ईरान में फुस्स रहे ड्रोन
ईरान जंग के दौरान अमेरिका की एमक्यू-9 ड्रोन की फ्लीट को जबरदस्त नुकसान हुआ. ईरान का दावा है कि पिछले पांच महीने में यानी जब से अमेरिका-ईरान जंग शुरू हुई है, तब से 40 से ज्यादा ऐसे ड्रोन गिराए जा चुके हैं. अमेरिका ने इन ड्रोन्स का इस्तेमाल, होर्मुज स्ट्रेट में ईरानी नौसेना (और आईआरजीसी-नेवी) की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए इस्तेमाल किया था. ईरान का दावा है कि जंग के दौरान अमेरिका की एमक्यू-9 फ्लीट की एक चौथाई ताकत खत्म हो चुकी है. एमक्यू-9 के बड़े संख्या में गिरने से अमेरिका की राजनीति में भूचाल आ गया है और ट्रंप प्रशासन को जबरदस्त आलोचना झेलनी पड़ी है. फिर भारत इन्हें क्यों खरीद रहा है.

क्यों खरीद रहा है भारत
 दरअसल, भारतीय नौसेना, पूरे हिंद महासागर की नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर है. ऐसे में इंडियन नेवी को हिंद महासागर के करीब 7 करोड़ वर्ग किलोमीटर के समंदर की सुरक्षा और निगहबानी करनी होती है. इतने बड़े समंदर की निगरानी एक टेढ़ी खीर है. इसमें 26-11 जैसे अटैक को रोकने के लिए आतंकियों को रोकना, ड्रग स्मगलर, सोमालियाई पायरेट्स यानी समुद्री डकैत और चीन जैसे देशों की नौसेनाओं के दबदबे को रोकना शामिल है. अगर किसी टोही विमान--जैसे भारतीय नौसेना के पास P8I है, उससे करते हैं तो बहुत ज्यादा खर्च आता है. इसके अलावा, पायलट्स 30-30 घंटे तक उड़ान भी नहीं भर सकते. अगर एक सिविल फ्लाइट की बात करें तो दिल्ली से न्यूयॉर्क की नॉन-स्टॉप फ्लाइट महज 13 घंटे की होती है. इससे ज्यादा उड़ान भरना किसी भी पायलट के लिए थोड़ा मुश्किल होता है. ऐसे में MQ9 जैसे ड्रोन बेहद कामगार साबित होते हैं. इनकी इन खूबियों को देखते हुए  अक्टूबर 2024 में भारत ने जनरल एटॉमिक्स से 31 एमक्यू-9बी प्रीडेटर ड्रोन लेना का करार किया था. इस सौदे की कुल कीमत 3.5 बिलियन डॉलर यानी लगभग 34 हजार करोड़ थी. यानी एक एमक्यू-9 की कीमत 1000 करोड़ से ज्यादा है. इसमें हालांकि, इनकी मिसाइल और दूसरे हथियार भी शामिल हैं. 

भारत को जो एमक्यू-9 मिलने जा रहे हैं वो अलग तरह के हैं. भारत को एमक्यू-9 के दो वेरिएंट मिलने जा रहे हैं. ये दो वेरिएंट हैं–स्काई-गार्डियन और सी-गार्डियन. थलसेना यानि भारतीय सेना और वायुसेना को मिलेंगे स्काई-गार्डियन. भारतीय नौसेना को मिलेंगे सी-गार्डियन. इसके मायने ये हुए कि जमीन और आसमान की निगहबानी के लिए स्काई-गार्डियन और समंदर में नजर रखने के लिए सी-गार्डियन. जानकारी के मुताबिक, अमेरिका से भारत कुल 31 एमक्यू-9 ड्रोन लेने जा रहा है. लेकिन ये डील किस्तों में होगी. यानि पहली खेप में 10 ड्रोन लिए जाएंगे, बाकी उसके बाद. कुल 31 ड्रोन में से 15 ड्रोन जो होंगे नौसेना को मिलेंगे यानि 15 सी-गार्डियन इंडियन नेवी को मिलेंगे. इसी तरह से 16 स्काई गार्डियन जो भारत अमेरिका से लेने जा रहा है उसमें से 8-8 थलसेना और वायुसेना को मिलेंगे. यानी एलएसी से लेकर हिंद महासागर में चीन की हर हरकत पर ये एमक्यू-9 रखेंगे पैनी नजर. लेकिन क्योंकि अभी तक इन 31 की डिलीवरी अभी शुरु नहीं हुई है, ऐसे में भारतीय नौसेना ने जनरल अटॉमिक्स से 02 ड्रोन लीज पर ले लिए हैं.

 अब एक बार फिर  ईरान जंग पर लौटते हैं तो हम देखते हैं कि अगर इन 40 ड्रोन की जगह अगर अमेरिका के कोई टोही विमान होते, जिन्हें पायलट्स फ्लाई कर रहे होते, तो पायलट्स की जान पर बन सकती थी. ड्रोन का ये फायदा है कि पायलट्स को कोई नुकसान नहीं पहुंचता वॉर-जोन में. दूसरा ये कि अमेरिका ने इन एमक्यू-9 के जरिए ईरान की नौसेना की गतिविधियों पर नजर बना कर रखी और साथ में ईरान के उन सीक्रेट मिसाइल ठिकानों को पता लगाया जहां से इन ड्रोन्स को मार गिराने के लिए ईरानी मिसाइल लॉन्च की जाती थी.

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नीरज राजपूत देश के जाने-माने डिफेंस-जर्नलिस्ट और वॉर-लेखक हैं. पत्रकारिता में करीब ढाई दशक का अनुभव रखते हैं और प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल मीडिया तीनों में गहरी पकड़ है.

वर्तमान में वे ABP नेटवर्क से जुड़े हैं, जहाँ युद्ध, रक्षा, नेशनल सिक्योरिटी और जियो-पॉलिटिक्स से संबंधित विषयों को कवर करते हैं. ABP लाइव पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘गेम-चेंजर’ के प्रस्तुतकर्ता भी हैं.

रूस-यूक्रेन युद्ध पर उन्होंने पहली हिंदी पुस्तक "ऑपरेशन Z लाइव" लिखी, जो बेस्टसेलर सूची में भी शामिल हुई और पाठकों द्वारा खूब सराही गई.

रिपोर्टिंग का दायरा
- दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन से लेकर आतंकवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर और चीन सीमा पर तिब्बत के पठार तक
- पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर-स्ट्राइक से लेकर पनडुब्बी के जरिए समुद्र के भीतर तक
- ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनके एक्सक्लूसिव खुलासे और सटीक विश्लेषणों की व्यापक सराहना हुई
- यूक्रेन-रूस युद्ध क्षेत्र में मारियुपोल, डोनेत्स्क और लुहांस्क जैसे एक्टिव वॉर-जोन से रिपोर्टिंग. इसी अनुभव पर आधारित उनकी पुस्तक प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई
- दुनिया की सबसे संवेदनशील सीमाओं में से एक उत्तर-दक्षिण कोरिया की DMZ
- ⁠अमेरिका के सबसे बड़े सैन्य अड्डों में से एक JBLM, और शीत युद्ध के दौरान "गैर-मौजूद" माने जाने वाले रूसी सैन्य अड्डों से भी ग्राउंड रिपोर्टिंग. 
- ⁠वे उन चुनिंदा रक्षा जुड़े पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने भारत के पहले स्वदेशी अटैक हेलिकॉप्टर LCH-प्रचंड के कॉकपिट में उड़ान भरी है. इसके अलावा फ्रांस में राफेल लड़ाकू विमान निर्माण सुविधा से भी उन्होंने विशेष रिपोर्टिंग की.

भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित 'Defence Correspondent Course' के Alumni हैं.

पूर्व कार्य अनुभव
- STAR NEWS में लगभग 6 वर्षों तक चीफ रिपोर्टर (क्राइम) के तौर पर कार्य किया और लोकप्रिय क्राइम शो 'सनसनी' से जुड़े रहे
- पत्रकारिता की शुरुआत अंग्रेजी दैनिक नेशनल हेराल्ड से की
- इसके बाद B.A.G. Films के साथ जुड़कर STAR NEWS के लिए क्राइम शो बनाए
- SAHARA TV में भी लगभग 2 वर्षों तक कार्यरत रहे

रक्षा और सुरक्षा के मामलों पर उनकी पकड़, ग्राउंड-जीरो रिपोर्टिंग और गहन विश्लेषण उन्हें देश के सबसे भरोसेमंद डिफेंस जर्नलिस्ट्स में स्थापित करती है.

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