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Explained: 181 दिन सन्नाटे के बाद केदारनाथ में बहार, 12 ज्योतिर्लिंग में केदारेश्वर मशहूर क्यों? रहस्यमयी धाम की अनोखी कहानी

Kedarnath Temple History: चारधाम यात्रा के चौथे दिन केदारनाथ धाम के कपाट खुल गए. ज्योतिर्लिंग पर लगी भस्म को हटाकर श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में बांटा गया. पहली पूजा PM मोदी के नाम की हुई.

जब हिमालय की बर्फीली चोटियां सर्दी के कहर के आगे घुटने टेक देती हैं और तापमान शून्य से भी काफी नीचे चला जाता है, तब केदारनाथ धाम के कपाट बंद हो जाते हैं. 'केदार' शब्द का अर्थ ही होता है क्षेत्र या भूमि का वह भाग जो पवित्र हो. 'नाथ' यानी भगवान. केदारनाथ यानी पवित्र भूमि के भगवान. लगभग ठीक 181 दिनों तक यहां जीवन का कोई निशान नहीं रहता और पूरी घाटी का इलाका एक सफेद चादर में लिपटकर भगवान शिव की निंद्रा में चला जाता है.

फिर जब ग्रीष्म ऋतु की पहली किरणें इन चोटियों को छूती हैं और अक्षय तृतीया का शुभ मुहूर्त आता है, तो ठंडे और अंधेरे गर्भगृह में पहली बार दीपक जलता है और कपाट खुलने की जयघोष के साथ भगवान केदारनाथ फिर से अपने भक्तों के लिए दर्शन देने लायक हो जाते हैं. यह सिलसिला हजारों सालों से चला आ रहा है, लेकिन आज भी केदारनाथ की हर एक चट्टान और हर एक किस्सा लोगों को रोमांचित करता है. आइए एक्सप्लेनर में इस रहस्यमयी धाम की उस कहानी पर नजर डालते हैं, जिसे जानकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे...

 

मान्यता के अनुसार भुकुंड भैरव मंदिर को केदारनाथ धाम का क्षेत्र रक्षक माना जाता है
मान्यता के अनुसार भुकुंड भैरव मंदिर को केदारनाथ धाम का क्षेत्र रक्षक माना जाता है

12 ज्योतिर्लिंगों में केदारेश्वर ही सबसे विशेष क्यों माने जाते हैं?

भगवान शिव को 12 ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है, जिनमें सोमनाथ, महाकालेश्वर और विश्वनाथ जैसे प्रसिद्ध मंदिर शामिल हैं, लेकिन केदारनाथ की जो गरिमा अनूठी है. इसका सबसे बड़ा कारण है इसका अवस्थान स्थल, क्योंकि यह दुनिया का एकमात्र ज्योतिर्लिंग है जो समुद्र तल से करीब 11,755 फीट (लगभग 3,583 मीटर) की ऊंचाई पर हिमालय की गोद में बैठा है.

 

केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग
केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग

शास्त्रों और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को हिमालय सबसे प्रिय है और केदारनाथ उनकी प्रकृति के सबसे करीब वाली निवास स्थली है. यही वजह है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए सनातन धर्म में केदारनाथ का नाम सबसे पहले लिया जाता है. माना जाता है कि यहां की ठंडी और शुद्ध वातावरण में ध्यान लगाने पर इंसान और परमात्मा के बीच का दूरियां तुरंत समाप्त हो जाता है, जिसे अन्य किसी ज्योतिर्लिंग में इस अद्भुत रूप में अनुभव नहीं किया जा सकता, लेकिन यह उत्तराखंड में 2013 में आई एक आपदा में ध्वस्त हो गया होता, अगर एक चट्टान आकर रक्षा नहीं करती.

2013 की भयानक आपदा में मंदिर कैसे बच गया?  

केदारेश्वर की चर्चा करें तो 2013 की केदारनाथ त्रासदी की यादें सामने आ जाती हैं. 16 और 17 जून 2013 को केदारनाथ और उसके आसपास के इलाकों में भारी बारिश और ग्लेशियर टूटने के कारण एक ऐसी तबाही आई, जिसे देखकर पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई. मंदाकिनी और सरस्वती नदियां अपने विनाशकारी रूप में बदल गईं और लाखों टन सीलन, चट्टानें और मलबा बहता हुआ सीधा मंदिर की तरफ आया. पूरा केदारनाथ बाजार और हजारों लोग इस मलबे में दफ्न हो गए, लेकिन सबसे बड़ा चमत्कार तब देखने को मिला जब बादल छंटे. आठवीं शताब्दी में बना यह प्राचीन केदारनाथ मंदिर बिल्कुल एकदम सुरक्षित था, जबकि उसके चारों ओर का सब कुछ ध्वस्त हो चुका था.

इसके पीछे विज्ञान और आस्था दोनों की मिलीजुली कहानी है. विज्ञान का मानना है कि मंदिर की संरचना 'ए' (A) शेप की है, यानी इसकी छत नीचे की तरफ आती है और ऊपर से नुकीली है. जब लाखों टन मलबा और पानी तेजी से मंदिर से टकराया, तो इस नुकीली संरचना ने उसे दोनों तरफ विभाजित कर दिया और मलबा सीधे निकलकर नदी की तरफ चला गया, जिससे मंदिर के गर्भगृह पर बहुत कम दबाव पड़ा.

वहीं, मंदिर के ठीक पीछे एक विशालकाय चट्टान है, जिसने एक ढाल का काम किया और तेज बहाव को सीधे मंदिर से टकराने से रोक दिया. भक्तों की मान्यता तो और भी गहरी है, क्योंकि वे इस चट्टान को भैरवनाथ का रूप मानते हैं, जिन्होंने पीछे से खड़े होकर अपने इष्ट को बचाया और जब तक भैरवनाथ खड़े हैं, तब तक केदारनाथ को कोई आपदा नहीं छू सकती.

 

केदारनाथ मंदिर के पीछे चट्टान
केदारनाथ मंदिर के पीछे चट्टान

इंटरलॉक कटे पत्थरों का रोचक इतिहास और इंजीनियरिंग

जब आप केदारनाथ मंदिर को देखते हैं, तो आपको वहां सीमेंट, लोहे के बोल्ट या किसी तरह के गैदर (मिट्टी या चूने का मिश्रण) का इस्तेमाल नहीं होता दिखेगा. ब्रिटेनिका के मुताबिक, यह मंदिर पूरी तरह से बड़े-बड़े और भारी-भरकम पत्थरों से बना है, जिन्हें बेहद ही सटीक तरीके से काटकर एक-दूसरे में इंटरलॉक किया गया है. इसे आज के समय की भाषा में 'लीगो ब्लॉक्स' यानी जुड़ते हुए खिलौनों की तरह फिट किया गया है. इस शैली को उत्तर भारतीय शैली के नागर स्थापत्य का एक अद्भुत उदाहरण माना जाता है.

अब सवाल उठता है कि बिना सीमेंट के यह मंदिर कैसे 1200 से ज्यादा सालों तक आतंकवादी भूकंपों और भयंकर बर्फबारी में डटा रहा? 

इसका राज इन पत्थरों की कटाई और उनके बीच की छोटी सी खाली जगहों में छिपा है. प्राचीन शिल्पकारों ने इन पत्थरों को इस तरह से जोड़ा कि जब भूकंप आता है, तो ये पत्थर एक-दूसरे के ऊपर हल्का सा फिसलते हैं, जिससे भूकंप की ऊर्जा अवशोषित हो जाती है और मंदिर टूटने के बजाय थोड़ा कांपता है.

 

केदारनाथ मंदिर के निर्माण में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं हुआ
केदारनाथ मंदिर के निर्माण में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं हुआ

अगर इन पत्थरों के बीच सीमेंट भरा होता, तो भूकंप में वह जमकर टूट जाता और मंदिर धराशायी हो गया होता. इसी तरह 2013 में जब पानी का दबाव पड़ा, तो चूंकि मंदिर में कोई ठोस गैदर नहीं था, इसलिए पानी उसके अंदर घुसकर दबाव नहीं बना सका और बस बाहर से बहकर निकल गया. यह प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का ऐसा करिश्मा है, जिसे आज के आधुनिक विज्ञान भी सलाम करता है.

लेकिन मंदिर का निर्माण हुआ कैसे और कब?

केदारनाथ का इतिहास महाभारत से भी पुराना माना जाता है. चारधाम पिलग्रिम टूर के मुताबिक, किस्सा यूं है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों को अपने ही कुटुंब के लोगों को मारने का बहुत बड़ा पाप लगा. उन्हें इस पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव का आशीर्वाद चाहिए था, लेकिन शिव पांडवों से नाराज थे. शिव उनसे बचने के लिए काशी से हटकर कैलाश की तरफ चले गए और फिर गुप्तकाशी में एक बैल का रूप धारण कर लिया. पांडवों ने जब उन्हें पहचान लिया, तो भीम ने अपनी ताकत से बैल को पकड़ लिया, लेकिन बैल धरती के अंदर धंसने लगा.

इस धंसाव में बैल का ऊपरी हिस्सा (कूबड़) केदारनाथ में, बाहु (हाथ) तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि (पेट) मद्यमहेश्वर में और जटा (बाल) कल्पेश्वर में प्रकट हुए. इस तरह पांडवों ने इन पांच स्थानों पर मंदिर बनाकर शिव की पूजा की, जिन्हें आज 'पंच केदार' के नाम से जाना जाता है.

इसके बाद लंबे समय तक यह मंदिर बर्फबारी और भूकंपों के कारण ध्वस्त होकर धरती में दफन हो गया. इतिहास के पन्ने पलटने पर आठवीं शताब्दी में महान दार्शनिक और संत आदि शंकराचार्य ने जब हिमालय की यात्रा की, तो उन्हें केदारनाथ के इस ढांचे के अवशेष मिले. उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की और शिव ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया.

तभी आदि शंकराचार्य ने इस ढांचे को दोबारा बनवाया और उसी प्राचीन इंटरलॉकिंग शैली में इस मंदिर को फिर से खड़ा किया, जिसे आज हम देख रहे हैं. इसके बाद शंकराचार्य ने ही यहां दक्षिण भारत के केरल से आए नंबूदरी ब्राह्मणों को पूजा-अर्चना के लिए नियुक्त किया, जो कि आज भी उसी वंशानुगत परंपरा को निभा रहे हैं.

 

आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था
आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था

यह कहानी सिर्फ एक मंदिर की नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता की उस अद्भुत विरासत की गवाही है, जहां अंधविश्वास को परे रखकर विज्ञान, इंजीनियरिंग और आस्था का ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है जो हजारों सालों की तबाही को भी अपने सामने झुकने पर मजबूर कर दे. जब भी आप केदारनाथ की यात्रा करें, तो बस उस मंदिर की दीवारों को छूकर यह सोचने की कोशिश करें कि ये पत्थर कितनी कहानियां संजोए खड़े हैं.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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