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Screen Time For Babies: 2 साल से छोटा है बच्चा तो गलती से भी न देना फोन, 'मम्मी' सुनने को तरस जाएंगी आप

Mobile Phones For Babies: कई माता-पिता उसे चुप कराने के लिए मोबाइल फोन या टैबलेट थमा देते हैं. कुछ ही सेकंड में बच्चा स्क्रीन देखने में व्यस्त हो जाता है और रोना बंद कर देता है.

Why Babies Under 2 Should Avoid Screen Time: आजकल छोटे बच्चे के रोते ही कई माता-पिता उसे चुप कराने के लिए मोबाइल फोन या टैबलेट थमा देते हैं. कुछ ही सेकंड में बच्चा स्क्रीन देखने में व्यस्त हो जाता है और रोना बंद कर देता है. यह तरीका भले ही आसान लगता हो, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी कीमत बच्चे के भविष्य को चुकानी पड़ सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे आपने बच्चों के लिए दिक्कत पैदा कर रहे हैं. 

लंबे समय तक डाल सकता है असर

ब्रिटेन की चार यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने शिशुओं और दो साल से कम उम्र के बच्चों में स्क्रीन टाइम को लेकर कई स्टडी की समीक्षा की है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जीवन के शुरुआती दो साल में बच्चों को जानबूझकर मोबाइल, टैबलेट या किसी भी तरह की स्क्रीन से दूर रखना चाहिए. रिसर्चर का मानना है कि इस उम्र में स्क्रीन का कोई खास फायदा नहीं है, जबकि इसके नुकसान लंबे समय तक असर डाल सकते हैं.

किन चीजों की हो सकती है दिक्कत?

रिपोर्ट के मुताबिक, जो बच्चे कम उम्र से ही नियमित रूप से स्क्रीन देखने लगते हैं, उनमें भाषा सीखने की रफ्तार धीमी हो सकती है. कई बार वे अपने माता-पिता से बातचीत करने की बजाय स्क्रीन में ज्यादा रुचि लेने लगते हैं. ऐसे बच्चों को बोलने में देर हो सकती है और वे 'मम्मी' या 'पापा' जैसे शुरुआती शब्द भी अपेक्षाकृत देर से बोलते हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि बच्चे के शुरुआती साल उसके दिमाग के सबसे तेज विकास का समय होते हैं. इस दौरान वह अपने आसपास के लोगों से बात करके, चेहरे के हाव-भाव देखकर, खेलकर और नई चीजें छूकर सीखता है. अगर यही समय मोबाइल स्क्रीन के सामने बीतने लगे, तो उसके सीखने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.

मां-बाप से हो सकती है दूरी

अध्ययन में यह भी सामने आया कि ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में माता-पिता के साथ  इमोशनल जुड़ाव कमजोर पड़ सकता है. धीरे-धीरे वे रोने या बेचैन होने पर मां-बाप की गोद में आने की बजाय मोबाइल देखकर शांत होने की आदत विकसित कर सकते हैं. लंबे समय में इसका असर उनके भावनात्मक विकास पर भी पड़ सकता है. रिसर्चर ने यह भी बताया कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की नींद खराब कर सकता है. इसके अलावा आंखों पर असर, शारीरिक गतिविधियों में कमी और आगे चलकर मोटापे का खतरा भी बढ़ सकता है. कम उम्र में मोबाइल की आदत बच्चों को बाहर खेलने, दौड़ने-भागने और आसपास की दुनिया को समझने के अवसरों से भी दूर कर देती है.

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बच्चों की किस चीज की जरूरत होती है

शोध से जुड़े एक्सपर्ट का कहना है कि आज के डिजिटल दौर में स्क्रीन से पूरी तरह बचना आसान नहीं है, लेकिन दो साल से कम उम्र के बच्चों को जानबूझकर मोबाइल या टैबलेट देना सही फैसला नहीं माना जा सकता. उनका मानना है कि इस उम्र में बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत माता-पिता के साथ बातचीत, खेल, कहानियां सुनने और प्यार भरे स्पर्श की होती है, क्योंकि यही चीजें उनके मानसिक, इमोशनल और भाषा विकास की मजबूत नींव तैयार करती हैं.

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About the author सोनम

जर्नलिज्म की दुनिया में करीब 15 साल बिता चुकीं सोनम की अपनी अलग पहचान है. वह खुद ट्रैवल की शौकीन हैं और यही वजह है कि अपने पाठकों को नई-नई जगहों से रूबरू कराने का माद्दा रखती हैं. लाइफस्टाइल और हेल्थ जैसी बीट्स में उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल रीडर्स का ध्यान खींचा है, बल्कि अपनी विश्वसनीय जगह भी कायम की है. उनकी लेखन शैली में गहराई, संवेदनशीलता और प्रामाणिकता का अनूठा कॉम्बिनेशन नजर आता है, जिससे रीडर्स को नई-नई जानकारी मिलती हैं. 

लखनऊ यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में ग्रैजुएशन रहने वाली सोनम ने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत भी नवाबों के इसी शहर से की. अमर उजाला में उन्होंने बतौर इंटर्न अपना करियर शुरू किया. इसके बाद दैनिक जागरण के आईनेक्स्ट में भी उन्होंने काफी वक्त तक काम किया. फिलहाल, वह एबीपी लाइव वेबसाइट में लाइफस्टाइल डेस्क पर बतौर कंटेंट राइटर काम कर रही हैं.

ट्रैवल उनका इंटरेस्ट  एरिया है, जिसके चलते वह न केवल लोकप्रिय टूरिस्ट प्लेसेज के अनछुए पहलुओं से रीडर्स को रूबरू कराती हैं, बल्कि ऑफबीट डेस्टिनेशन्स के बारे में भी जानकारी देती हैं. हेल्थ बीट पर उनके लेख वैज्ञानिक तथ्यों और सामान्य पाठकों की समझ के बीच बैलेंस बनाते हैं. सोशल मीडिया पर भी सोनम काफी एक्टिव रहती हैं और अपने आर्टिकल और ट्रैवल एक्सपीरियंस शेयर करती रहती हैं.

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