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चीन के साथ व्यापार घाटा पाटने पर भारत का ज़ोर, बिगड़ते संबंधों के बीच है इसका सामरिक महत्व

India China Trade Deficit: चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का सबब है. वैश्विक व्यवस्था में हलचल के बीच नीति आयोग इसके समाधान के लिए कार्य योजना तैयार करेगा.

India China Trade  Deficit: भारत पिछले कुछ सालों से दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है. यह सिलसिला आने वाले सालों में जारी रहेगा. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक समेत तमाम संस्थाओं की ओर से भी लगातार इस तरह का भरोसा जताया जा रहा है.

भारत चालू वित्त वर्ष या'नी 2023-24 में भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा. देश के  वित्त मंत्रालय की सितंबर की मासिक आर्थिक समीक्षा में भी यह बात कही गई है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के 2023-24 के अनुमान में भी यही कहा गया है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बना रहेगा.

बाहरी कारकों का असर और भारतीय अर्थव्यवस्था 

पहले से ही वैश्विक अर्थव्यवस्था पर रूस-यूक्रेन युद्ध का असर देखा जा रहा था. अब हमास-इजरायल के बीच जारी जंग ने वैश्विक अर्थव्यस्था को लेकर चिंता और बढ़ा दी है. सबसे ज़्यादा आशंका कच्चे तेल की क़ीमतों को उछाल को लेकर है. कुछ और भी कारण हैं, जिनको लेकर चिंता बनी हुई है. इनमें अमेरिका में सख़्त मौद्रिक नीति की संभावना और अमेरिकी प्रतिभूतियों की आपूर्ति बढ़ना भी शामिल है. अमेरिकी शेयर बाज़ारों में गिरावट का जोखिम बरक़रार है. इससे दुनिया के बाक़ी बाज़ारों पर भी असर पड़ सकता है.

इन सबके बीच बाहरी कारकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर ज़्यादा असर पड़ने की संभावना कम है. इसके कई  कारण हैं. भारत में संपत्ति बाजार की सेहत अच्छी है. औद्योगिक क्षमता में सुधार हो रहा है. इनके साथ ही भारत में घरेलू खपत लगातार बढ़ रही है. साथ ही निवेश मांग भी उसी अनुपात में मज़बूत हो रही है.

2030 तक तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था फ़िलहाल आकार के हिसाब से दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. आकार में हमसे आगे अभी अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी की अर्थव्यवस्था है. जिस रफ्तार से भारतीय अर्थव्यवस्था अगले कुल सालों में बढ़ेगी, उसको देखते हुए माना जा रहा है कि 2030 तक हम जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेंगे. उस वक़्त तक भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 7300 अरब  डॉलर की जीडीपी के बराबर हो जायेगा. एसएंडपी ग्लोबल इंडिया विनिर्माण के ताज़ा इंडेक्स (PMI) में ऐसा अनुमान ज़ाहिर किया गया है. ऐसा हुआ तो 2030 तक एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत की होगी. एशिया में हमसे आगे सिर्फ़ चीन होगा.

अमेरिकी अर्थव्यवस्था का आकार उस दौरान 25500 अरब डॉलर था. दूसरे नंबर पर चीन की अर्थव्यवस्था का आकार  18000 अरब डॉलर के साथ था. वहीं तीसरे नंबर पर क़ाबिज़ जापान की अर्थव्यवस्था का आकार  4200 अरब डॉलर था. वहीं चौथे नंबर पर फ़िलहाल जर्मनी है. भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 2022 में वर्तमान क़ीमतों की जीडीपी में 3500 अरब अमेरिकी डॉलर था. इसके  2030 तक 7300 अरब डॉलर होने की संभावना है.

चीन है दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार

भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक है व्यापार. इस मोर्चे पर हमारे लिए चिंता का एक पहलू चीन को लेकर है. अतीत में भी चीन के साथ हमारे संबंध उतने अच्छे नहीं रहे हैं. इसके बावजूद पिछले कई साल से चीन, भारत का बेहद महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार रहा है. गलवान घाटी में जून, 2020 में  दोनों देशों की सेना के बीच हिंसक झड़प के बाद द्विपक्षीय संबंधों में कड़वाहट बेहद बढ़ गयी. पिछले तीन साल में संबंध सबसे ख़राब दौर में पहुँच गया. इसके बावजूद भारत का चीन के साथ व्यापारिक संबंध उतने  ही मज़बूत रहे. इसी का नतीजा है कि चीन फ़िलहाल भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. इस मोर्चे पर दो साल से पहले पायदान पर अमेरिका है. हालांकि उसके पहले कुछ सालों तक चीन ही हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है.

आयात के लिए चीन पर निर्भरता चिंताजनक

जहाँ अमेरिका के साथ व्यापार भारत के पक्ष में हैं वहीं चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा बेहद चिंतनीय पहलू है. अमेरिका के साथ व्यापार में भारत निर्यात ज़्यादा करता और उसके मुक़ाबले आयात कम करता है. जबकि चीन के साथ स्थिति बिल्कुल विपरीत है. हम चीन को जितना निर्यात करते हैं, उसकी तुलना में क़रीब सात गुना अधिक चीन से आयात करते हैं.

वास्तविक नियंत्रण रेखा या'नी LAC पर तनातनी से बिगड़ते द्विपक्षीय संबंधों के बीच चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा भारत के लिए चिंता का कारण है. जिस तरह हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन का आक्रामक रवैया जारी है, उसको देखते हुए भारत के लिए व्यापार घाटे का मुद्दा और भी गंभीर हो जाता है. अब भारत ने चीन के साथ व्यापार घाटा को पाटने के लिए कार्ययोजना पर काम करना शुरू किया है.

व्यापक कार्रवाई योजना तैयार करने पर काम

चीन के साथ व्यापार घाटा को पाटने के लिए व्यापक कार्रवाई योजना तैयार किया जाना है. इस कार्रवाई योजना तो नीति आयोग तैयार करेगा. नीति आयोग ने इसके लिए अध्ययन शुरू कर दिया है. मौजूदा बदलती वैश्विक व्यवस्था को ध्यान में रखकर इस कार्रवाई योजना को तैयार किया जायेगा. इसके लिए जो भी रणनीति तैयार की जायेगी, उसमें जियो-पॉलिटिकल सिचुएशन के हिसाब से तालमेल रखने पर ज़ोर होगा.

चीन के साथ भारत के व्यापार घाटे को पाटने के लिए कार्ययोजना तैयार होगी, उसमें इस बात पर भी ध्यान रखा जायेगा कि घरेलू ज़रूरत और मांग से जुड़े सप्लाई चेन पर कोई असर नहीं पड़े. भारत कई वस्तुओं के लिए चीन पर निर्भर रहा है. हम दवा बनाने के लिए आयात होने वाली कुल बल्क ड्रग्स या कच्चे माल में से 60% से भी ज्यादा चीन से आयात करते हैं.

वैश्विक व्यवस्था में अनिश्चितता का दौर

कुछ घरेलू उद्योगों ख़ासकर दवा उद्योग के लिए चीन की भूमिका बेहद निर्णायक है. नीति आयोग की कार्ययोजना में इन पहलुओं पर भी ख़ास ज़ोर रहेगा. यह इसलिए भी ज़रूरी हो जाता कि रूस-यूक्रेन युद्ध और हमास-इजरायल जंग के बीच भारत का कनाडा से तनाव बढ़ते जा रहा है. इस तनाव में अमेरिका की कोशिश  भारत पर ही दबाव बढ़ाने की है.

अमेरिका और चीन ही भारत के दो सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार है. वित्त वर्ष 2021-22 की भांति ही वित्त वर्ष 2022-23 में भी चीन की बजाय अमेरिका ही भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना रहा. हालांकि दूसरे नंबर पर चीन ही है. चीन 2013-14 और 2017-18 के बीच भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था. 2020-21 में भी यहीं हालात थे. चीन के पहले संयुक्त अरब अमीरात भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था. अब अमेरिका ने वो जगह ले ली है.

10 सालों में व्यापार में 10 गुना का इज़ाफ़ा

सीमा विवाद सुलझाने में भारत और चीन पिछले 7 दशकों से कामयाब नहीं हो पाए हैं. इसके बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते लगातार मज़बूत हुए हैं. भारत-चीन व्यापार लगातार बढ़ रहा है.  पिछले 10 सालों में द्विपक्षीय व्यापार में 10 गुना का इज़ाफ़ा हुआ है. दोनों देशों के बीच दो दशक में 50 गुना से ज्यादा व्यापार बढ़ा. भारत-चीन के बीच 2001 में सिर्फ़ 1.83 अरब डॉलर का व्यापार था.  20 साल के भीतर ही ये 100 अरब डॉलर पार कर गया.

व्यापार घाटा से भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ

चीन पर आयात को लेकर निर्भरता की वज्ह से होने वाले व्यापार घाटा से भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ जाता है. आँकड़ों से  समझें, तो वित्तीय वर्ष 2021-22 में भारत के कुल व्यापार घाटे में  38% हिस्सेदारी चीन के साथ था. यह 73.3 अरब डॉलर था. वहीं  वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारत का सिर्फ़ चीन के साथ व्यापार घाटा लभभग 32 फ़ीसदी था. यह 83.1 अरब डॉलर था.

कुल वस्तु व्यापार की बात करें, तो वित्तीय वर्ष 2021-22 में भारत का वस्तुओं का व्यापार 1,000 अरब डॉलर से ज़्यादा रहा. इस दौरान भारत ने 422 अरब डॉलर का निर्यात किया था. जबकि भारत ने इस अवधि में  613 अरब डॉलर का आयात किया था. वित्तीय वर्ष 2021-22 में व्यापार घाटा 191 अरब डॉलर रहा था. जबकि वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारत का निर्यात 450 अरब डॉलर था. वहीं भारत ने 714 अरब डॉलर का आयात किया था. इस दौरान व्यापार घाटा 263 अरब डॉलर रहा था. इन आँकड़ों से समझा जा सकता है भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चीन के बढ़ता व्यापार घाटा कितना चिंताजनक पहलू है.

2013-14 से व्यापार घाटा तेज़ी से बढ़ा

2003-2004 में चीन से भारत का आयात करीब 4.34 अरब डॉलर का था. साल 2013-14 आते-आते ये बढ़कर 51.03 अरब डॉलर तक पहुंच गया. इन 10 वर्षों की अवधि में आयात दस गुना से भी ज्यादा बढ़ गया. 2004-05 में भारत और चीन के बीच 1.48 अरब डॉलर का व्यापार घाटा था.  2013-14 में यह बढ़कर 36.21 अरब डॉलर हो गया.  2020-21 में चीन ने भारत को 65.21 अरब डॉलर मूल्य का सामान निर्यात किया था. वित्त वर्ष 2021-22 में इसमें तेज़ इज़ाफ़ा हुआ. इस वर्ष चीन ने 94.57 अरब डॉलर मूल्य का सामान भारत को निर्यात किया. वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा 44.33 अरब डॉलर का हो गया. दिलचस्प पहलू ये है कि अगले वित्त वर्ष 2021-211 के दौरान यह बढ़कर 73 अरब डॉलर के पार पहुंच गया. 2013-14 से तुलना करें तो सिर्फ 6 साल में व्यापार घाटा दोगुना हो गया है.

सप्लाई चेन में बाधा सबसे बड़ी चिंता

चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटा को कम करने के लिए ज़रूरी है कि हम ऐसी नीति पर भविष्य में आगे बढ़ें, जिससे चीन से धीरे-धीरे आयात कम हो. इसके लिए घरेलू ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अन्य वैकल्पिक पहलुओं पर काम करना होगा. इनमें घरेलू उत्पादन क्षमताओं को बढ़ाने के साथ ही व्यापारिक साझेदार के तौर पर अन्य विकल्पों पर भी फोकस करना होगा. इस दिशा में यूरोपीय यूनियन और अरब के देश बेहतर विकल्प बन सकते हैं.  हालांकि यह इतना आसान नहीं है. इससे सप्लाई चेन में कोई बाधा नहीं आए, महँगाई पर कोई असर नहीं पड़े, इन बातों का ख़ास ख़याल नीति आयोग की कार्ययोजना में रखना होगा.

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