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क्या होता है पॉलीग्राफ टेस्ट, कोर्ट में क्यों नहीं माना जाता मान्य

आपने फिल्मों में देखा होगा कि पुलिस अपराधियों के शरीर में मशीन लगाकर सच बोलने के लिए कहती है. मेडिकल साइंस में इसे पॉलीग्राफ टेस्ट कहा जाता है. क्या आप जानते हैं कि ये टेस्ट कैसे होता है.

मेडिकल साइंस में कई इस तरह के टेस्ट हैं, जिससे इंसान के बारे में लगभग सब कुछ पता किया जा सकता है. कोई इंसान सच बोल रहा है या झूठ ये जानने के लिए पॉलिग्राफ टेस्ट किया जाता है. कोलकाता में ट्रेनी डॉक्टर से रेप-मर्डर के मामले में आरोपी संजय रॉय समेत 6 का पॉलिग्राफ टेस्ट होगा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि पॉलिग्राफ टेस्ट की रिपोर्ट को कोर्ट मान्य नहीं मानती है. आज हम आपको बताएंगे कि आखिर पॉलिग्राफ टेस्ट कैसे होता है.

क्या होता है पॉलीग्राफ टेस्ट

अब सबसे पहले ये जानते हैं कि पॉलीग्राफ टेस्ट क्या होता है. बता दें कि लाई डिटेक्टर मशीन को ही पॉलीग्राफ मशीन कहा जाता है, इससे यह पता लगाया जाता है कि कोई व्यक्ति सच बोल रहा है या झूठ. दिखने में यह ECG मशीन की तरह ही होता है. अब आप सोच रहे होंगे ऐसा कैसा? दरअसल पॉलीग्राफ टेस्ट इस धारणा पर आधारित है कि जब कोई झूठ बोल रहा होता है, तो दिल की धड़कन, सांस लेने में बदलाव, पसीना आने लगता है. वहीं पूछताछ के दौरान कार्डियो-कफ या सेंसेटिव इलेक्ट्रोड जैसे उपकरण व्यक्ति से जुड़े होते हैं और बीपी, नाड़ी आदि को मापा जाता है.

कब हुई इस मशीन की शुरूआत

जानकारी के मुताबिक ऐसा टेस्ट पहली बार 19वीं शताब्दी में इतालवी अपराध विज्ञानी सेसारे लोम्ब्रोसो ने किया गया था. उन्होंने पूछताछ के दौरान आपराधिक संदिग्धों के बीपी में परिवर्तन को मापने के लिए एक मशीन का उपयोग किया था. इसी तरह की मशीन बाद में 1914 में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक विलियम मैरस्ट्रॉन और 1921 में कैलिफोर्निया पुलिस अधिकारी जॉन लार्सन द्वारा बनाया गया था.

पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए सहमति जरूरी?

अब सवाल ये है कि कोई भी जांच एजेंसी किसी भी इंसान का टेस्ट करा सकती है? इसका जवाब है नहीं. दरअसल पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए आरोपी की सहमति जरूरी होती है. यदि आरोपी सहमति नहीं देता है, तो उसे सुरक्षा एजेंसियां बाध्य करके पॉलीग्राफ टेस्ट नहीं करा सकती हैं. लेकिन अमूमन आरोपी खुद को निर्दोष साबित करने के लिए पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए हामी भर देते हैं. आरोपी कई बार कोर्ट में खुद को सही साबित करने के लिए पॉलीग्राफ टेस्ट के लिए सहमति दे ही देते हैं.

ये टेस्ट कोर्ट में मान्य नहीं

कई कारणों की वजह से पॉलीग्राफ टेस्ट और नार्को टेस्ट वैज्ञानिक रूप से 100% सफल साबित नहीं हुए हैं. हालांकि जांच एजेंसियां इन्हें प्राथमिकता देती हैं. शायद उन्हें इससे सबूत जुटाने में मदद मिलती है. कोई भी कोर्ट पॉलीग्राफ टेस्ट की रिपोर्ट को नहीं मानता है, हालांकि कोर्ट पॉलीग्राफ टेस्ट में पूछताछ के दौरान आरोपी द्वारा किसी जगह और सबूत को मान्य मानता है. 

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