Sarojini Naidu Birthday: जिन्ना से कैसे थे सरोजिनी नायडू के संबंध, दोस्ती से दरार तक कैसे पहुंचा था यह रिश्ता?
Sarojini Naidu Birthday: 13 फरवरी को सरोजिनी नायडू का जन्मदिन मनाया जाता है. आइए जानते हैं कि उनकी और मोहम्मद अली जिन्ना की दोस्ती कैसी थी और यह दोस्ती बाद में कैसे बदल गई.

Sarojini Naidu Birthday: 13 फरवरी 1829 को सरोजिनी नायडू का जन्मदिन मनाया जाता है. सरोजिनी नायडू को नाइटेंगल ऑफ इंडिया भी कहा जाता है. वे एक कवि, स्वतंत्रता सेनानी और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे प्रमुख महिला नेताओं में से एक थी. वे 1925 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की पहली भारतीय महिला प्रेसिडेंट बनी और बाद में उत्तर प्रदेश की पहली महिला गवर्नर. मोहम्मद अली जिन्ना के साथ उनका रिश्ता आजादी से पहले के भारत की सबसे दिलचस्प राजनीतिक दोस्ती में से एक है. आइए जानते हैं कि आखिरकार यह दोस्ती बाद में जाकर दरार तक कैसे पहुंची थी.
शुरुआत में दोस्ती
सरोजिनी नायडू और जिन्ना पहली बार 1906 में कोलकाता में इंडियन नेशनल कांग्रेस के सेशन के दौरान मिले थे. उस समय जिन्ना को बड़े पैमाने पर एक नरमपंथी राष्ट्रवादी नेता माना जाता था. जिन्ना संवैधानिक सुधारों और हिंदू मुस्लिम एकता में विश्वास करते थे. नायडू उनके बोलने की कला और राजनीतिक स्पष्टता की काफी तारीफ करती थी. 1916 के ऐतिहासिक लखनऊ पैक्ट के बाद उन्होंने जिन्ना को हिंदू मुस्लिम एकता का राजदूत बताया था. 1918 में उन्होंने जिन्ना के भाषणों को इकट्ठा करके उनकी तारीफ करते हुए एक किताब भी लिखी थी. उनका कनेक्शन सिर्फ पॉलिटिक्स तक ही सीमित नहीं था. सरोजिनी नायडू जिन्ना की पत्नी रतनबाई जिन्ना के भी काफी करीब थी.
महात्मा गांधी का असर और पॉलिटिकल बदलाव
उनके रिश्ते में टर्निंग पॉइंट 1920 के दशक में महात्मा गांधी के आने और उनके नॉन कोऑपरेशन और सत्याग्रह जैसे बड़े आंदोलन के साथ आया. जिन्ना गांधी के तरीकों खासकर पॉलिटिक्स में सिविल डिसओबिडिएंस और धार्मिक सिंबल के इस्तेमाल से काफी असहज थे. उन्होंने संवैधानिक बातचीत को प्राथमिकता दी और धीरे-धीरे कांग्रेस से दूरी बना ली. दूसरी तरफ सरोजिनी नायडू गांधी के सबसे वफादार समर्थकों में से एक बन गई और उनके कैंपेन में सक्रिय रूप से भाग लिया.
जैसे-जैसे जिन्ना का राजनीतिक रास्ता ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के साथ जुड़ता गया और उन्होंने 2 नेशन थ्योरी की वकालत शुरू की उनके और कांग्रेस नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ते गए. सरोजिनी नायडू एक भारत और सांप्रदायिक सद्भाव में विश्वास रखती थी.
दोस्ती से औपचारिक दूरी तक
1940 के दशक तक जैसे-जैसे पाकिस्तान की मांग तेज हुई सरोजिनी नायडू और जिन्ना के बीच व्यक्तिगत दोस्ती औपचारिक राजनीतिक दूरी में बदल गई. वह दोस्ती जो कभी हिंदू मुस्लिम एकता की निशानी थी अब भारतीय राजनीति के अंदर दर्दनाक बंटवारे से जूझ रही थी. हालांकि सरोजिनी नायडू ने कभी भी सार्वजनिक रूप से जिन्ना के प्रति व्यक्तिगत कड़वाहट को नहीं दिखाया.
बंटवारा और आखिरी अलगाव
1947 में भारत के बंटवारे ने उनके साझा राजनीतिक सफर का पक्का अंत कर दिया. जिन्ना पाकिस्तान के फाउंडिंग लीडर बने और सरोजिनी नायडू भारत में ही रही और उत्तर प्रदेश की पहली महिला गवर्नर बनीं.
ये भी पढ़ें: वंदे मातरम बजने पर खड़े नहीं हुए तो कितनी मिलेगी सजा, क्या गिरफ्तार कर सकती है पुलिस?
टॉप हेडलाइंस
Source: IOCL


























