Debts On Iran-Israel: ईरान या इजरायल... भारत ने किसे दिया है ज्यादा कर्जा, जानें किस पर ज्यादा उधार?
Debts On Iran-Israel: मिडिल ईस्ट में तनाव रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है. इसी बीच आइए जानते हैं कि भारत ने ईरान और इजरायल को कितना कर्ज दिया हुआ है.

- भारत ने ईरान के तेल आयात का भुगतान बकाया राशि में किया।
- भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह के विकास में निवेश किया।
- ईरान से भारत ने अरबों डॉलर की सैन्य तकनीक खरीदी।
- भारत पर ईरान का बकाया था, इजरायल का नहीं।
Debts On Iran-Israel: बीते कुछ हफ्तों में मिडिल ईस्ट में ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष और तेज हो चुका है. इस वजह से क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक भू राजनीति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. इसी बीच आइए जानते हैं कि भारत में इन दोनों देशों के साथ किस तरह के वित्तिय संबंध बनाए हुए हैं और क्या भारत ने इन दोनों देशों को कर्ज दिया है?
ईरान के साथ भारत के वित्तीय संबंध
ईरान के मामले में भारत की भूमिका कुछ हद तक अनोखी है. मुख्य रूप से कर्ज देने वाले के तौर पर काम करने के बजाय भारत ऐतिहासिक रूप से एक व्यापारिक साझेदार और निवेशक की भूमिका निभाता रहा है. ईरान पर लगाए गए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से भारत को वैश्विक बैंकिंग प्रणाली के जरिए कच्चे तेल के आयात का भुगतान करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा.
इसी वजह से भुगतान की एक बड़ी रकम बकाया व्यापारिक बकाए के तौर पर जमा हो गई. हाल के कुछ अनुमानों के मुताबिक भारत पर ईरान का लगभग 6 अरब डॉलर का एक तेल बकाया था. इसे बैंकिंग चैनलों के जरिए धीरे-धीरे चुका दिया गया. इसके साथ ही भारत ने ईरान के बुनियादी ढांचे में रणनीतिक निवेश भी किया है. सबसे जरूरी परियोजनाओं में से एक चाबहार बंदरगाह का विकास है. इसके जरिए भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच मिलती है. भारत ने इस परियोजना के लिए लगभग 500 मिलियन डॉलर देने का वादा किया है. इसमें से डेढ़ सौ मिलियन डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट दी गई है. इसके अलावा भारतीय कंपनियों ने ईरान के पेट्रोकेमिकल और उर्वरक क्षेत्र में 20 अरब डालर तक के निवेश का प्रस्ताव भी रखा है. हालांकि इनमें से कई परियोजनाएं भू राजनीतिक स्थिति और प्रतिबंध पर निर्भर करती हैं.
इजरायल के साथ भारत के आर्थिक संबंध
भारत और इजरायल के बीच संबंधों का स्वरूप कुछ अलग है. इजरायल एक विकसित अर्थव्यवस्था है और आर्थिक सहयोग और विकास संगठन का सदस्य है. इसका सीधा सा मतलब है कि उसे भारत से वित्तीय कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ती. इसके बजाय दोनों देशों के बीच आर्थिक जुड़ाव निवेश साझेदारियों और द्विपक्षीय समझौतों के जरिए होता है. सितंबर 2025 में भारत और इजरायल ने एक द्विपक्षीय निवेश संधि पर हस्ताक्षर किए थे. इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच निवेश को सुरक्षित रखना और उसे बढ़ावा देना था. 2000 और 2025 के बीच भारतीय कंपनियों ने इजरायल में लगभग 443 मिलियन डॉलर का निवेश किया.
भारत एक खरीदार के रूप में
दिलचस्प बात यह है कि जब रक्षा सहयोग की बात आती है तो वित्तीय प्रवाह असलियत में उलटी दिशा में होता है. भारत इजरायली रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा इंपोर्टर है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक इजरायल के कुल हथियार निर्यात में भारत की हिस्सेदारी लगभग 34% है. पिछले कुछ दशकों में भारत ने इजरायल से एडवांस मिलिट्री टेक्नोलॉजी को खरीदने पर अरबों डॉलर खर्च किए हैं. इस लेन देन में संबंध ऋण या फिर क्रेडिट व्यवस्था के बजाय सीधे भुगतान और संयुक्त विकास परियोजनाओं पर आधारित होते हैं.
दोनों देशों में किसका बकाया ज्यादा?
भारत और ईरान के बीच के संबंधों में व्यापारिक बकाया और रणनीतिक निवेश शामिल हैं. वहीं भारत इजराइल संबंध मुख्य रूप से टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप, निवेश और रक्षा व्यापार के इर्द-गिर्द घूमते हैं. अगर सीधी तस्वीर देखें तो बकाया भुगतान के मामले में भारत पर ही ईरान का बकाया था. ऐसा प्रतिबंधों से प्रभावित पिछले तेल व्यापार के लेनदेन की वजह से था. दूसरी तरफ इजरायल पर भारत का कोई भी ऋण नहीं है.
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Source: IOCL



























