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पीएम मोदी किसी देश में एक भी कदम न रखें तो कैसे साइन होती है कोई डील, क्या है इसका तरीका?

भारत और किसी देश के बीच कोई ट्रेड डील हुई तो यह अचानक लिया गया फैसला नहीं होता है, बल्कि लंबे समय से चल रही तकनीकी और कूटनीतिक चर्चाओं का नतीजा होता है.

अक्सर देखा जाता है कि जब भी कोई ट्रेड डील फाइनल होती है तो दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष या तो भारत आकर बातचीत करते हैं या पीएम मोदी उस देश में जाकर चर्चा में शामिल होते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर पीएम मोदी किसी देश में कदम भी न रखें तो क्या कोई ट्रेड डील फाइनल हो सकती है? आइए जानते हैं कि इसका प्रोसेस क्या है? 

बिना पीएम की मौजूदगी कैसे होती है डील?

मान लीजिए कि भारत और किसी देश के बीच कोई ट्रेड डील हुई तो यह अचानक लिया गया फैसला नहीं होता है, बल्कि लंबे समय से चल रही तकनीकी और कूटनीतिक चर्चाओं का नतीजा होता है. ऐसे मामलों में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का हर बार खुद मौजूद होना जरूरी नहीं होता है. असल काम सरकारों के अधिकृत प्रतिनिधि और अधिकारी करते हैं, जबकि शीर्ष नेता राजनीतिक मंजूरी और दिशा तय करते हैं.

उस देश में भारत की ओर से कौन करता है बात?

जिस भी देश से ट्रेड डील होती है, वहां मौजूद भारतीय दूतावास और वाणिज्यिक विंग इस तरह की बातचीत संभालता है. इस विंग में तैनात अधिकारी भारत के व्यापार हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये लोग उस देश प्रशासन, वहां के ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव और संबंधित एजेंसियों से सीधे संपर्क में रहते हैं. टैरिफ, आयात-निर्यात नियम और बाजार पहुंच जैसे मुद्दों पर बातचीत इन्हीं स्तरों पर होती है. 

कौन करता है डील से जुड़े दस्तखत?

इस तरह की ट्रेड डील किसी एक व्यक्ति के साइन से पूरी नहीं होती है. आमतौर पर ऐसी डील एक फ्रेमवर्क या समझौते के रूप में होती है, जिसे दोनों देशों के अधिकृत अधिकारी स्वीकार करते हैं. भारत की ओर से वाणिज्य मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और उस देश के वरिष्ठ व्यापारिक प्रतिनिधि दस्तावेजों को अंतिम रूप देते हैं. 

क्या होती है प्रधानमंत्री की भूमिका?

मसला कोई भी हो, देश के प्रधानमंत्री की भूमिका रणनीतिक और राजनीतिक होती है. किसी भी ट्रेड डील के दौरान यह ध्यान रखा जाता है कि देश के हितों से कोई भी समझौता नहीं हो, लेकिन वह दूसरे देश का सहयोग करने के लिए तैयार रहता है. 

कब फाइनल मानी जाती है कोई डील?

यह समझना जरूरी है कि किसी भी ट्रेड डील का समझौता बेहद व्यापक होता है. इसमें कई शर्तें जैसे नॉन-टैरिफ बैरियर घटाने या भविष्य में खरीदारी के आंकड़े, चरणबद्ध तरीके से लागू हो सकते हैं. यानी आगे भी दोनों देशों के अधिकारी बैठकर इसके बारीक नियम तय करेंगे. ये सभी बातें डील के अंतिम कानूनी प्रावधानों पर निर्भर होती हैं.

यह भी पढ़ें: क्या ट्रेड डील के बाद एक्स्ट्रा टैरिफ नहीं लगा सकता अमेरिका, जानें क्या हैं इसके नियम?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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