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परमाणु हमले में पूरा शहर तबाह हो जाए फिर भी जिंदा रह जाएंगे 'कॉकरोच', जानिए क्यों नहीं होता रेडिएशन का असर 

द्वितीय विश्व युद्ध में हुए परमाणु हमले की जब रिपोर्ट आई तो दुनिया चौंक उठी. रिपोर्ट में पता चला था कि परमाणु बम से निकलने वाले रेडिएशन से जहां जीवन पूरी तरह खत्म हो गया था, उसमें भी कॉकरोच बच गए थे.

दुनिया में जैसे-जैसे कई मोर्चों पर जंग बढ़ रही हैं, परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का खतरा भी बढ़ता जा रहा है. आखिरी बार परमाणु बम का प्रयोग द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के हिरोशिमा व नागासाकी पर किया गया था, जिसमें पूरा शहर तबाह हो गया था और लाखों लोग मारे गए थे. हालांकि, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस परमाणु हमले की जब रिपोर्ट आई तो दुनिया चौंक उठी. रिपोर्ट में पता चला था कि परमाणु बम से निकलने वाले रेडिएशन से जहां जीवन पूरी तरह खत्म हो गया था, उसमें भी कॉकरोच जिंदा निकल आए थे. जीवों की यह प्रजाति खुद को परमाणु हमले से भी सुरक्षित रखने में कामयाब रही थी. 

द्वितीय विश्व यद्ध की यह रिपोर्ट सचमुच चौंकाने वाली थी, क्योंकि परमाणु हमले में जहां एक तरफ पूरा शहर और सभ्यता खत्म हो गई, वहां ये कॉकरोच कैसे जीवित रहे? कुछ वैज्ञानिकों ने इस पर रिसर्च शुरू की, जिसमें ऐसी बातें निकलकर सामने आईं, जो हैरान करने वाली थीं. आइए जानते हैं कॉकरोचों के बारे में ऐसा क्या पता चला था... 

इंसानों से ज्यादा झेल सकते हैं रेडिएशन

वैज्ञानिकों ने जब कॉकरोचों पर रिसर्च की तो पता चला कि कॉकरोच का शरीर रेडिएशन को झेल सकता है और यही कारण था कि नागासाकी और हिरोशिमा में ज्यादातर कॉकरोच खुद को बचा सकने में कामयाब रहे. सिर्फ उन कॉकरोचों की मौत हुई जो विस्फोट के बाद सीधे उसकी गर्मी और ऊर्जा की चपेट में आए. 

कितना रेडिएशन झेल सकते हैं कॉकरोच

रिसर्च में सामने आया था कि कॉकरोच का शरीर 10000 रैड (रेडिएशन की इकाई) झेलने में सक्षम हैं, वहीं इंसानों की मौत 800 रैड तक हो सकती है. रिपोर्ट में पता चला कि जापान पर हुए परमाणु हमले में 10,300 रैड की गामा रेज निकली थीं, जो इंसानों को मौत की नींद सुलाने के लिए पर्याप्त थीं, लेकिन कॉकरोच का शरीर इससे लड़ सकता था. इसका एक कारण और भी था, दरअसल, हम इंसानों के शरीर में कोशिकाएं बहुत तेजी से विभाजित होती हैं, जितनी तेजी से कोशिकाओं का विभाजन होगा, उतना ही रेडिएशन का खतरा भी बढ़ता है. वहीं कॉकरोच में यह प्रक्रिया काफी धीमी है, मसलन कॉकरोच में सप्ताह में एक बार कोशिकाओं का विभाजन होता है, जिस कारण उन पर रेडिएशन का उतना असर नहीं होता, जितना कि हम इंसानों पर. 

यह भी पढ़ें: परमाणु बम फट जाए तो बचने के लिए मिलता है कितना वक्त, जानें इससे कितने तरीके की रेज निकलती हैं?

प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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