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क्या सोशल डिस्टेंसिंग 2022 तक जा सकता है?

क्या कोरोना का इकलौता उपाय सोशल डिस्टेंसिंग ही है? क्या अब वक्त आ गया है कि हम इस बात को स्वीकार कर लें कि अब हम किसी से नज़दीक से नहीं मिल पाएंगे और सोशल डिस्टेंसिंग अब न्यू नॉर्मल बन जाएगा?

कोरोना का कहर अभी थमता नहीं दिख रहा है. दुनिया भर में 20 लाख से भी ज्यादा लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं. करीब 1 लाख 30 हजार लोगों की इससे मौत हो चुकी है और अब भी न तो इस बीमारी का कोई इलाज खोजा जा सका और न ही इससे बचाव का कोई टीका. बचने का सिर्फ एक ही उपाय है और वो है सोशल डिस्टेंसिंग. यानि कि दूरी बनाए रखना. विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर अमेरिका, चीन और यूरोप के तमाम देशों के डॉक्टर एक सुर में सिर्फ एक ही बात कह रहे हैं कि कोरोना से बचना है तो सोशल डिस्टेंसिंग को अपनाना पड़ेगा. और यही वजह है कि भारत समेत दुनिया के तमाम देशों ने अपने यहां लॉकडाउन लगा रखा है.

लेकिन आखिर कब तक. कब तक लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग करनी होगी. जवाब आया है अमेरिकी रिसर्चर्स की तरफ से. हॉर्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के रिसर्चर्स ने जर्नल साइंस में एक रिसर्च पब्लिश की है. 14 अप्रैल, 2020 को छपी इस रिसर्च के मुताबिक अगर जल्द ही कोरोना की वैक्सीन नहीं बन पाती है तो फिर अमेरिका में सोशल डिस्टेंसिंग का टाइम 2022 तक जा सकता है और इस दौरान लोगों को घर में रहने का आदेश दिया जा सकता है और स्कूलों को बंद रखा जा सकता है.

हालांकि इस रिसर्च के सामने आने से पहले वॉइट हाउस की तरफ से कहा गया था कि उम्मीद है कि अमेरिका में इस गर्मी तक कोरोना खत्म हो जाएगा. लेकिन अब इस नई रिसर्च ने अमेरिका के साथ ही दुनिया के तमाम देशों की चिंता बढ़ा दी है. रिसर्चर्स की इस टीम ने कोरोना वायरस के बारे में मौजूद तमाम जानकारियों के आधार पर कहा है कि या तो गंभीर रूप से बीमार लोगों के इलाज की क्षमता बढ़ाई जाए या फिर इस बीमारी का इलाज खोजा जाए या फिर इसकी वैक्सीन मुहैया करवाई जाए और जब तक ऐसा नहीं होता, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाए. रिपोर्ट ने ये सब होने के लिए कम से कम 2022 तक इंतजार करने को कहा है. रिपोर्ट में रिसर्चर्स ने यहां तक लिखा है कि कोरोना या कोविड 19 या फिर यूं कहें कि सार्स कोव 2 की निगरानी 2024 तक की जानी चाहिए.

हॉर्वर्ड की टीम की ये रिसर्च कहती है कि अगर सोशल डिस्टेंसिंग जैसे प्रतिबंध हटा लिए जाएं, तो कोरोना महामारी और विकराल रूप में सामने आ सकती है. सीएनएन के मुताबिक इस रिसर्च की रिपोर्ट को लिखने वाली टीम के मेंबर और हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर डॉक्टर मार्क लिपस्टिक के मुताबिक अगर कोरोना से लड़ने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग को ही अपनाया गया है, तो फिर इसे लंबे समय तक कायम रखना पड़ेगा और इसमें कई साल का भी वक्त लग सकता है. वहीं अमेरिका में सेंटर फॉर डिजिज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के डायरेक्टर रॉबर्ट रेडफिल्ड का मानना है कि अगर सोशल डिस्टेंसिंग को और भी ज्यादा बढ़ा दिया जाए तो इस वायरस पर और भी बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है.

और यही वजह है कि जो अमेरिका पहले सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन के सख्त खिलाफ था, अब उसी अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में इन नियमों को बहुत सख्त बना दिया गया है. अलग-अलग राज्यों ने इन नियमों का उल्लंघन करने पर सख्त सजाओं और जुर्माने का प्रावधान किया है. भारत में भी 24 मार्च को 21 दिन के लिए लॉकडाउन लगाया गया. अभी 21 दिन पूरे होते, उससे पहले ही फिर से 19 दिनों के लिए इस लॉकडाउन को बढ़ा दिया गया है. दूसरे देशों में भी कमोबेश ऐसी ही स्थितियां हैं. कोरोना से लड़ाई में अभी तक हम जहां भी पहुंचे हैं, उसे देखकर तो यही लगता है कि मंजिल अभी दूर है और सोशल डिस्टेंसिंग उस मंजिल तक पहुंचने का एक ज़रूरी रास्ता है.

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