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क्या था और कैसा था ग्रेट डिप्रेशन, जिसकी तुलना कोरोना महामारी से कर रहा है IMF?

अमेरिका जैसे देश ने 9 साल में अपनी अर्थव्यवस्था को दोगुना कर लिया था. लेकिन फिर शेयर बाजार टूटा और एक हफ्ते के अंदर की अमेरिका की पूरी अर्थव्यवस्था तबाह हो गई. इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ा, जिसे अंग्रेजी में कहते हैं ग्रेट डिप्रेशन और हिंदी में कहते हैं महामंदी.

दुनिया का हर छोटा-बड़ा देश कोरोना की वजह से तबाह है. दुनिया भर की आर्थिक संस्थाएं इस तबाही का आंकलन करने में जुटी हैं. ऐसी ही एक संस्था IMF यानि कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस वक्त की तबाही को ग्रेट डिप्रेशन यानि महामंदी के बाद की तबाही करार दिया है. IMF की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टॉलिना जॉर्जिविया ने कहा है कि इस वायरस की वजह से दुनिया के करीब 170 देशों की आर्थिक विकास दर नकारात्मक हो जाएगी और ऐसा ग्रेट डिप्रेशन के बाद पहली बार होगा.

तो सवाल ये है कि क्या था वो ग्रेट डिप्रेशन जिसकी तुलना अभी के कोरोना वायरस से पैदा हुए आर्थिक हालात से की जा रही है. क्या थे उस वक्त के हालात, जिसने दुनिया को आर्थिक मंदी की चपेट में ला दिया और कैसे फिर दुनिया के तमाम देश इस महामंदी को मात देकर फिर से उठ खड़े हुए. इसे समझने के लिए आपको चलना पड़ेगा अमेरिका. वही अमेरिका जो कोरोना की वजह से सबसे ज्यादा परेशान है. उस वक्त भी इस परेशानी की शुरुआत अमेरिका से ही हुई थी.

1920 का शुरुआती दशक अमेरिका का स्वर्णिम काल था. साल 1920 में अमेरिका की जितनी अर्थव्यवस्था थी, वो साल 1929 की शुरुआत तक आते-आते दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी थी. और जब लोगों के पास पैसे आने शुरू हुए थे, तो उन्हें इस पैसे से और ज्यादा पैसा बनाना था. लिहाजा उन्होंने पैसे को निवेश करना शुरू किया. और इस निवेश का सबसे आसान जरिया था स्टॉक मार्केट. न्यू यॉर्क के वॉल स्ट्रीट में बने स्टॉक मार्केट में लोगों ने अंधाधुंध पैसे लगाने शुरू किए, जिससे स्टॉक मार्केट का साइज भी बढ़ गया. अगस्त 1929 वो महीना था, जब अमेरिका का स्टॉक एक्सचेंज अपने इतिहास के सबसे ऊपरी पायदान पर था.

यही वो दौर भी था, जब अमेरिका में उत्पादन घटना शुरू हो गया था, क्योंकि मांग घट गई थी. जब मांग घटी और उसकी वजह से उत्पादन घटा तो फिर बेरोजगारी भी बढ़ गई. अमेरिका में सूखा भी आ गया था, जिसकी वजह से खेती भी बर्बाद हो गई. बैंकों ने जो बड़े-बड़े लोन दे रखे थे, लोगों ने उसकी मासिक किश्तें देना बंद कर दिया. अनाज से लेकर सोने तक के दाम गिरने लगे, लेकिन स्टॉक मार्केट पर कोई असर नहीं दिख रहा था. कम कीमत वाले शेयरों की वैल्यू भी बहुत ज्यादा हो गई थी और मार्केट लगातार बढ़ता जा रहा था.

फिर एक दिन बुलबुला फूट गया. तारीख थी 24 अक्टूबर. साल था 1929. दिन था गुरुवार. स्टॉक मार्केट में निवेशकों को भी अंदाजा हो गया था कि उन्होंने कीमतों से ज्यादा पैसे देकर शेयर खरीदे हैं. उन्होंने बेचना शुरू कर दिया. एक ही दिन में करीब 130 लाख शेयरों की बिकवाली हो गई, जिससे बाजार गिर गया. एक ही दिन में करीब पांच अरब डॉलर डूब गए. अमेरिका के शेयर बाजार के इतिहास में इसे ब्लैक थर्सडे कहा गया.

अभी इससे अमेरिकी निवेशक उबर पाते कि पांच दिन के बाद ही 29 अक्टूबर, 1929 को अमेरिका के शेयर मार्केट के इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट हो गई. करीब 160 लाख शेयर एक दिन में खरीदे-बेचे गए, जिसकी वजह से करीब 14 अरब डॉलर एक झटके में डूब गए. लाखों शेयरों की कीमत कौड़ियों के भाव हो गई. बाजार बंद हुआ तो बाजार की करीब 12 फीसदी रकम स्वाहा हो चुकी थी. लाखों लोगों के करोड़ों-करोडों डॉलर डूब गए थे. इसे अमेरिका के शेयर बाजार के इतिहास में ब्लैक ट्यूजडे कहा जाता है.

इतनी बड़ी रकम के डूबने के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था का तबाह होना स्वाभाविक था. नौकरियां जाने लगीं, फैक्ट्रियों में उत्पादन बंद हो गया. लोगों के सामान खरीदने की क्षमता खत्म हो गई. बैंकों से लिए गए लोन को चुकाने में लोग असमर्थ हो गए. एक साल के अंदर ही अमेरिका में करीब 40 लाख लोग बेरोजगार हो गए. साल 1931 तक बेरोजगारी का आंकड़ा 60 लाख तक हो गया. देश का औद्योगिक उत्पादन आधा हो गया. हर शहर में बेघरों की फौज दिखने लगी, जिन्हें रहने के लिए घर और खाने के लिए खाना चाहिए था. लोग भूखे मर रहे थे और किसानों के पास इतने भी फैसे नहीं थे कि वो खेत में खड़ी अपनी फसलों को कटवा सकें. 1930 के अकाल ने लाखों को भूखा मार दिया और लोग गांव छोड़कर काम की तलाश में शहरों में निकल आए.

लेकिन अभी स्थितियां खराब होनी बाकी थीं. अमेरिका के बैंक तबाह हो गए थे. 1933 की शुरुआत तक अमेरिका में करीब 3000 बैंकों पर ताला लग गया. अमेरिका की हूवर सरकार ने बैंकों को लोन देकर स्थितियां सुधारने की कोशिश की, लेकिन नाकामी ही हाथ लगी. कोशिश थी कि बैंकों को लोन मिलेगा, तो लोगों को रोजगार भी मिल जाएगा, लेकिन 1932 तक अमेरिका की 20 फीसदी आबादी बेरोजगार हो चुकी थी. अंकों में ये आंकड़ा करीब 1 करोड़ 80 लाख था. इस बीच अमेरिका में सरकार बदल चुकी थी. नए राष्ट्रपति थे फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट. 4 मार्च, 1933 को उन्होंने सभी बैंकों को बंद करने का आदेश जारी कर दिया और कहा कि सरकार के पास अब इतने भी पैसे नहीं हैं कि वो कर्मचारियों को तनख्वाह दे सके. नतीजा ये हुआ कि 9000 से ज्यादा बैंक तबाह हो गए. बैंक में जमा पैसे का बीमा नहीं था, जिससे आम लोगों के पैसे भी डूब गए. जो बैंक बचे, उन्होंने भी लोगों को पैसे देने से इन्कार कर दिया. और इसका असर दुनिया के तमाम देशों पर पड़ा.

अमेरिका ने खुद के उद्योगों को स्थापित करने के लिए आयात शुल्क बढ़ा दिया. नतीजा ये हुआ कि दूसरे देशों जैसे जापान पर बड़ा असर पड़ा. वो अपने कुल उत्पादन का बड़ा हिस्सा अमेरिका को निर्यात करता था, जो अमेरिकी मंदी से ठप हो गया. इससे जापान में भी मंदी आ गई. खेती और औद्योगिक उत्पादन पर आधारित ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई. कनाडा का औद्योगिक उत्पादन 60 फीसदी तक कम हो गया. उस समय के सबसे बड़े साम्राज्यवादी देश ब्रिटेन को सोने का निर्यात रोकना पड़ा. दुनिया के जो तमाम देश अमेरिका से मिलने वाले पैसे से चल रहे थे जैसे कि चिली, बोलिविया और पेरू, वो पूरी तरह से बर्बाद हो गए.

इस मंदी से बचने की कोशिश के दौरान दुनिया के तमाम देशों ने अपनी-अपनी मुद्रा का अवमूल्यन कर दिया. कहा जाता है कि 1929 से पहले लोग जेब में पैसे भरकर ले जाते थे और थैला भरकर सामान लाते थे. लेकिन मंदी में लोग थैला भरकर पैसे लेकर जाते थे और जेब भरकर सामान लेकर आते थे. साल 1938 से अर्थव्यवस्था में थोड़ा सुधार होना शुरू हुआ. अभी दुनिया की अर्थव्यवस्था उबरने की कोशिश कर ही रही थी कि जर्मनी के नए तानाशाह हिटलर ने देश को विश्वयुद्ध में झोंक दिया. इस लड़ाई में जर्मनी के साथ जापान और इटली जैसे देश थे.

द्वितीय विश्वयुदध में अमेरिका ने फ्रांस और ब्रिटेन का साथ देने का फैसला किया. और इस तरह से दुनिया के हर देश में सैनिक के तौर पर रोजगार मिल गया. हथियारों का उत्पादन होने लगा. हर देश या तो हथियार बना रहा था या फिर हथियार खरीद रहा था. और ऐसे में धीरे-धीरे रोजगार के अवसर बढ़ने लगे. 1942 आते-आते अमेरिका में बेरोजगारी की दर आर्थिक महामंदी से पहले वाली स्थिति में आ गई. औद्योगिक उत्पादन भी अक्टूबर, 1929 से पहले वाली स्थिति में आ गया. और जब जापान पर अमेरिका के परमाणु हमले के साथ ही दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हुआ तो दुनिया इस महामंदी से उबर चुकी थी.

IMF की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टॉलिना जॉर्जिविया ने कोरोना के कारण पैदा हुए हालात की तुलना उसी अक्टूबर, 1929 के हालात से की है, जिसके बाद स्थितियां इतनी खराब हुईं कि उन्हें संभलने में 15 साल से ज्यादा का वक्त लग गया. अगर कोरोना की वैक्सीन जल्द ही नहीं मिलती और पूरी दुनिया जल्दी से अपने काम की रफ्तार वापस नहीं पा लेती तो IMF की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टॉलिना जॉर्जिविया की बातें पूरी तरह से सच साबित होंगी. अब भी दुनिया में मंदी के आसार हैं, हर देश की अर्थव्यवस्था पहले से कमजोर हो रही है और अगर ऐसे में कोरोना की वजह से लॉकडाउन चलता ही रहा तो फिर पहले बेरोजगारी बढ़ेगी, फिर महंगाई बढ़ेगी, औद्योगिक उत्पादन ठप होगा, लोगों के पास पैसे खत्म होंगे. वो लोन नहीं चुकाएंगे, जिसका असर बैंकों पर होगा. बैंक डूबेंगे और फिर दुनिया उसी महामंदी की चपेट में आ जाएगी, जिसे अंग्रेजी में लोग ग्रेट डिप्रेशन कहते हैं.

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