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पुरानी अदावत भूल त्रिपुरा में बीजेपी के खिलाफ लेफ्ट और कांग्रेस ने क्यों बनाया गठबंधन?

कांग्रेस और सीपीएम के बीच अदावत की कहानी दशकों पुरानी है. 1988 में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने बीरचंद्र मनू गांव में सीपीएम ऑफिस पर हमला कर 11 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी थी.

त्रिपुरा विधानसभा की 60 सीटों के लिए हो रहे चुनाव में प्रचार अभियान ने रफ्तार पकड़ ली है. गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की रैली हो चुकी है. 

लालगढ़ के नाम से मशहूर त्रिपुरा में इस बार सियासी फिजाएं बदली हुई है. भगवा ब्रिगेड बीजेपी को हराने के लिए लेफ्ट (कम्युनिष्ट) और कांग्रेस ने गठबंधन कर लिया है. बीजेपी, लेफ्ट गठबंधन के अलावा, टिपरा मोथा और तृणमूल कांग्रेस भी मैदान में है. 

त्रिपुरा में कांग्रेस और सीपीएम सरकार में रहने के दौरान एक दूसरे पर राजनीतिक हत्या का आरोप लगाते रहे हैं. माणिक सरकार के मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस के विधायक मधुसूदन साहा की 2001 में लेफ्ट समर्थकों ने हत्या कर दी थी. 2009 में युवा कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव मंटू दास की हत्या का आरोप भी लेफ्ट समर्थकों पर लगा.

कांग्रेस और सीपीएम के बीच अदावत की कहानी दशकों पुरानी है. 1988 में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने बीरचंद्र मनू गांव में सीपीएम ऑफिस पर हमला कर 11 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी थी. 

कांग्रेस और लेफ्ट गठबंधन पर 2 बड़ा बयान...
1. जेपी नड्डा, बीजेपी अध्यक्ष- त्रिपुरा में लाल आंतक खत्म हो गया है. कुर्सी के लिए कांग्रेस और लेफ्ट ने गठबंधन किया है. ये सभी लोग अवसरवादी हैं और जनता सबक सिखाएगी. 

2. ममता बनर्जी, टीएमसी सुप्रीमो- बंगाल में बीजेपी, सीपीएम और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ती है. यहां सीपीएम और कांग्रेस मिलकर बीजेपी के खिलाफ लड़ रही है. ये लोग सेटिंग कर उम्मीदवार उतारते हैं.

त्रिपुरा में कैसे साथ आए धुर-विरोधी लेफ्ट और कांग्रेस
2018 तक एक दूसरे के धुर-विरोधी रहे सीपीएम और कांग्रेस 2023 में साथ आ गई है. समझौते के तहत सीपीएम 46 और कांग्रेस 13 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन किया गया है. 

2018 में सीपीएम को 14 और कांग्रेस को एक सीट पर जीत मिली थी. 2013 में सीपीएम ने अकेले बूते सरकार बनाई थी और 60 में 46 सीटें जीती थी. कांग्रेस दूसरे नंबर की पार्टी रही थी और उसे 10 सीटों पर जीत मिली थी. 

राज्य में अब राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं. बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है और सीपीएम दूसरे नंबर की. कांग्रेस आस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. 

2019 में प्रद्युत देवबर्मन जैसे कद्दावर नेता के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस के पास चेहरे का भी संकट है. पार्टी के पास कई सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए बेहतर उम्मीदवार नही हैं. 

त्रिपुरा कांग्रेस के सीनियर नेता सुदीप रॉय बर्मन ने गठबंधन की घोषणा करते हुए कहा कि हम बीजेपी को विपक्षी बंटवारे का फायदा नहीं देना चाहते हैं, इसलिए गठबंधन का निर्णय लिया गया है. 

लेफ्ट की मजबूरी क्या है?
सीपीएम का केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में ही बड़ा जनाधार बचा है, जिसमें केरल में सरकार भी है. पश्चिम बंगाल में 2021 में करारी हार मिली थी. ऐसे में विस्तार के लिए त्रिपुरा ही एकमात्र ऑप्शन बचा है. 

वहीं सीपीएम का आरोप है कि बीजेपी शासन के दौरान उसके करीबी 25 नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई है.

प्रयोग नया नहीं, उठते रहे हैं सवाल
चुनाव पूर्व कांग्रेस और लेफ्ट गठबंधन का प्रयोग पश्चिम बंगाल और बिहार में भी हो चुका है. बंगाल में 2016 और 2021 के चुनाव में कांग्रेस और सीपीएम ने मिलकर चुनाव लड़ा था. हालांकि, दोनों पार्टियों को कोई फायदा नहीं हुआ. 

बंगाल 2021 चुनाव में गठबंधन में लड़ने के बावजूद लेफ्ट और कांग्रेस जीरो सीट पर सिमट गई. बंगाल में केरल को लेकर लेफ्ट और कांग्रेस से सवाल भी पूछे जाते रहे हैं. केरल में लेफ्ट पार्टियां सरकार में है और कांग्रेस विपक्ष में. 

बिहार में भी कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां राजद के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी. बिहार में कांग्रेस और लेफ्ट को जरूर फायदा मिला था और वर्तमान में दोनों पार्टियां सत्ता में भागीदार है.

कांग्रेस की 15 सीटों पर पकड़, सफलता मिली तो खेल होगा
नॉर्थ-ईस्ट के त्रिपुरा में कांग्रेस की पकड़ 15 सीटों पर है. 2018 का चुनाव छोड़ दिया जाए तो पार्टी 2008 और 2013 में 10-10 सीटें जीतती रही है. 2003 में कांग्रेस को 13 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. 

सीपीएम को इसी समीकरण पर भरोसा है. अगर कांग्रेस को 15 सीटों पर जीत मिलती है, तो राज्य का समीकरण बिल्कुल बदल जाएगा. पिछले चुनाव में बीजेपी से सीपीएम का सीट मार्जिन भले ही ज्यादा का रहा हो, लेकिन वोट प्रतिशत का फासला बहुत कम का था. 

2018 में बीजेपी को 43.59 प्रतिशत और सीपीएम को 42.22 फीसदी वोट मिले थे. कांग्रेस को 1.79 फीसदी वोट मिला था और पार्टी के अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. 

त्रिपुरा में वापसी से लिए बीजेपी की रणनीति क्या है?
त्रिपुरा में 2018 में बीजेपी पहली बार सरकार बनाई थी. 20 साल बाद यहां वाम का किला उखड़ा था और माणिक सरकार को बेदखल कर बिप्लव देव मुख्यमंत्री बने थे. हालांकि, मई 2018 में पार्टी ने बिप्लव की जगह मानिक साहा को राज्य की कमान सौंप दी. 

मुख्यमंत्री बदलने का यह प्रयोग चुनाव को देखते हुए ही किया गया था. गुजरात, उत्तराखंड और गोवा में पार्टी का यह प्रयोग सफल रहा है. बीजेपी सत्ता में वापसी के लिए 2 रणनीति अपना रही है.

1. विकास का मुद्दा- बीजेपी नॉर्थ-ईस्ट के विकास को मुद्दा बनाकर त्रिपुरा में जीत की राह आसान करने की कोशिश में जुटी है. बीजेपी नेता HIRA यानी हाइवे, इंटरनेट, रेलवे, एयरपोर्ट के क्षेत्र में किए जा रहे कामों को वोटरों के बीच भुना रही है.

त्रिपुरा में उग्रवाद एक बड़ी समस्या रही है. हाल ही में एक रैली में गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया था कि पिछले 5 सालों के दौरान त्रिपुरा में 9000 आतंकवादियों ने सरेंडर किया है. 

2. हिंदु्त्व की रणनीति- 2011 जनगणना के मुताबिक त्रिपुरा में करीब 82 फीसदी हिंदू है. बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे को उठाकर दूसरी बार सत्ता में आने की रणनीति अपना रही है. 

बीजेपी ने इसके लिए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी त्रिपुरा चुनाव में ड्यूटी लगाई है. त्रिपुरा में चुनाव प्रचार के दौरान योगी अपने भाषणों में अयोध्या, राम मंदिर और हिंदुत्व जैसे शब्दों का भी प्रयोग करते हैं. 

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