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तमिलनाडु चुनाव में नंबर गेम या 69 फीसदी आरक्षण? किसी भी दल ने क्यों नहीं उतारा ब्राह्मण उम्मीदवार, जानिए वजह

तमिलनाडु की सियासत में इस बार बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. द्रविड़ आंदोलन का असर कहें या संख्याबल की ताकत, किसी भी बड़ी पार्टी ने इस बार ब्राह्मणों पर दांव नहीं लगाया है.

तमिलनाडु की सियासत में इस बार बड़ा उल्टफेर देखने को मिल रहा है. आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर ना सिर्फ DMK और कांग्रेस बल्कि AIADMK और BJP तक ने किसी ब्राह्मण को अपना प्रत्याशी नहीं बनाया है. करीब साढ़े तीन दशक में पहली बार ऐसा हो रहा है जब अन्नाद्रमुक ने किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया है. 

द्रविड़ आंदोलन का कितना असर
द्रविड़ आंदोलन के चलते साउथ के इस राज्य में ब्राह्मण राजनीति ना सिर्फ हाशिए पर चली गई है बल्कि इस बार के विधानसभा चुनावों में प्रमुख दलों ने ब्राह्मणों को टिकट देने से भी परहेज किया है और तो और ब्राह्मणों का समर्थन हासिल करने वाली बीजेपी ने भी किनारा कर लिया है. बीजेपी ने अपने कोटे की 27 विधानसभा सीटों में से किसी भी सीट पर ब्राह्मण प्रत्याशी घोषित नहीं किया. 

ऐसे में सवाल ये उठ रहे हैं कि ये सब तमिलनाडु में ये बदलती सियासत का नतीजा है या फिर सियासी मजबूरी है. बता दें कि तमिलनाडु की 234 विधानसभा सीटों में इंडिया गठबंधन में DMK 164 और कांग्रेस 28 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन दोनों में किसी ने भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया. इसके अलावा उनके सहयोगी लेफ्ट, वीसीके और मुस्लिम लीग ने भी किसी ब्राह्मण पर भरोसा नहीं किया है.

एनडीए गठबंधन में AIADMK 178 सीटों पर बीजेपी 27 और पीएमके 18 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन एक भी सीट पर ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं उतारा गया है. 

जयललिता की पार्टी ने भी बनाई दूरी
दिलचस्प बात ये है कि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता ब्राह्मण समाज से रही हैं, लेकिन उनके निधन के करीब 10 साल बाद भी उनकी पार्टी ने किसी भी ब्राह्मण को मैदान में नहीं उतारा. AIADMK ने 2021 में ब्राह्मण समाज से आने वाले पूर्व पुलिस महानिदेशक आर नटराज को उम्मीदवार बनाया था, पर इस बार उनको भी टिकट नहीं दिया.

ब्राह्मणों को किसने दिया टिकट
अभिनेता से नेता बने थलपति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कझगम (TVK) ने 2 ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारे. इसके अलावा तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमन की पार्टी नाम तमिलर कच्ची ने 6 ब्राह्मणों को टिकट दिया है. इन दोनों ही दलों ने मायिलापुर और श्रीरंगम जैसे इलाके को चुना है, जहां ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. एनटीके द्वारा 6 ब्राह्मणों को मैदान में उतारने के पीछे विश्लेषकों का कहना है कि सीमान ने तमिलनाडु में पेरियार-विरोधी रुख अपनाया है. RSS से जुड़े एक कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए उन्होंने कहा कि वो द्रविड़ दीवार को गिराने का काम करेंगे. वे अपने राजनीतिक संदेशों में भी जाति और पहचान का खुलकर इस्तेमाल करते हैं. 

क्या कहते हैं राजनीतिक पंडित
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, राजनीतिक विश्लेषक अरुण कुमार का कहना है कि AIADMK ने कई दशकों तक ब्राह्मण समाज से समर्थन लिया लेकिन हाल के सालों में बदलाव आया है. जयललिता के निधन के बाद ब्राह्मण मतदाताओं का झुकाव बीजेपी के पक्ष में हुआ है. इसके चलते ही AIADMK ने ब्राह्मणों से दूरी बना ली है, लेकिन बीजेपी के परहेज करने की वजह से लोग जरूर चिंतित हैं.

ब्राह्मणों की कितनी जनसंख्या
तमिलनाडु की कुल जनसंख्या में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी सिर्फ 3 फीसदी है. राजनीतिक पार्टियां उन जातियों को प्राथमिकता देती हैं जिनकी संख्या अधिक है. मुथुराय्यर, थेवर, वन्नियार और गौंडर. कम संख्या के कारण ब्राह्मणों को वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाता. इसके अलावा राज्य में 69 फीसदी आरक्षण लागू है. द्रविड़ दलों ने अपनी राजनीति को OBC और दलितों के उत्थान के इर्द-गिर्द बुना है. 

द्रविड़ राजनीति में ब्राह्मणों को आर्य या बाहरी माना जाता है, जबकि गैर-ब्राह्मणों को मूल द्रविड़. यही कारण है कि किसी ब्राह्मण नेता के लिए खुद को विशुद्ध रूप से तमिल हितों का रक्षक साबित करना अपने आप में ही बड़ी चुनौती है.

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