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Expert View: रुपये में 3 साल के दौरान एक दिन में बड़ी गिरावट, टूट के क्या है कारण और ये आगे भी रहेगा जारी?

अंतरराष्ट्रीय बाजार की अनिश्चितताओं के बीच 21 नवंबर, यानी शुक्रवार को रुपया 98 पैसे टूटकर 89.66 के स्तर पर बंद हुआ. यह पिछले तीन वर्षों में एक दिन में आई सबसे बड़ी गिरावट है.

Indian Rupee Falls: यूएस टैरिफ से दुनियाभर में मचे हलचल के बीच देश में सबसे बड़ी चिंता भारतीय करेंसी के लगातार डॉलर के मुकाबले कमजोर होने की है. रुपये में गिरावट का हर सेक्टर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इस वर्ष भारतीय मुद्रा में तेज गिरावट देखी जा रही है. अंतरराष्ट्रीय बाजार की अनिश्चितताओं के बीच 21 नवंबर, यानी शुक्रवार को रुपया 98 पैसे टूटकर 89.66 के स्तर पर बंद हुआ. यह पिछले तीन वर्षों में एक दिन में आई सबसे बड़ी गिरावट है.

इससे पहले वर्ष 2022 में, 24 फरवरी को रुपये में एक ही दिन में 99 पैसे की गिरावट आई थी. ऐसे में सवाल उठता है कि रुपये में इतनी गिरावट की वजह क्या है? कौन-से कारक इसके लिए जिम्मेदार हैं? और आरबीआई की कोशिशों के बाद भी डॉलर के मुकाबले रुपया खुद को संभाल क्यों नहीं पा रहा है?

रुपये में गिरावट के कारण

आर्टभट्ट कॉलेज के इकोनॉमिक्स विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आस्था अहूजा बताती हैं कि सितंबर में रुपया पहली बार सर्वकालिक निचले स्तर 88.80 पर पहुंच गया था. उस समय आरबीआई ने हस्तक्षेप किया था. बाजार में यह धारणा बन गई थी कि आरबीआई रुपये को 88.80 से नीचे नहीं जाने देगा. इसी वजह से कई लोगों ने डॉलर बेचना शुरू कर दिया क्योंकि उन्हें विश्वास था कि यह स्तर स्थिर रहेगा.

लेकिन जैसे ही रुपया 89 के पार गया और इस "प्रोटेक्टिव लाइन" को पार किया, कारोबारियों ने स्टॉप लॉस की ओर कदम बढ़ाया. स्टॉप लॉस एक ऐसा ऑर्डर होता है, जिसमें तय कीमत से नीचे जाते ही सिक्योरिटी अपने-आप बेच दी जाती है.

उदाहरण के तौर पर, यदि आपने कोई सिक्योरिटी 100 रुपये में खरीदी है और स्टॉप लॉस 90 रुपये का लगाया है, तो कीमत 90 पर आते ही वह बेच दी जाएगी. रुपये–डॉलर बाजार में भी यही हुआ—जैसे ही कीमतें नीचे गईं, कारोबारियों ने अपनी स्थिति संभालने के लिए डॉलर की खरीदारी बढ़ा दी, जिससे डॉलर और मजबूत हो गया.

स्टॉप लॉस भी एक बड़ा कारण

जब शॉर्ट सेलर अपनी पोजिशन बचाने के लिए डॉलर खरीदते हैं, तो डॉलर का मूल्य तेजी से बढ़ता है. बाजार के कई प्रतिभागियों का मानना था कि आरबीआई को इस स्तर पर हस्तक्षेप करना चाहिए था. हालांकि, आरबीआई ने 88.80 के स्तर पर सीमित कारोबार के दौरान ही दखल दिया था.

एक दूसरी वजह यह भी है कि अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए उच्च टैरिफ के कारण आयात की मांग बढ़ी है, जबकि डॉलर की सप्लाई निर्यातकों के लिए कम हो गई है. आरबीआई गवर्नर ने हाल में कहा था कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील होने की घोषणा के अगले ही दिन रुपया 89 के पार पहुंच गया.

क्या आगे भी जारी रहेगी गिरावट?

इस पर डॉ. आस्था अहूजा का कहना है कि भारतीय बाजार में अभी भी अनिश्चितता काफी है. जब तक ट्रेड डील पूरी तरह नहीं हो जाती, गिरावट का सिलसिला जारी रह सकता है. भारत का व्यापारिक घाटा भी लगातार बढ़ रहा है.

इसका प्रभाव न केवल बाजार, बल्कि उपभोक्ताओं पर भी पड़ रहा है. विदेश में पढ़ाई कर रहे छात्रों पर इसका सीधा असर हुआ है—उन्हें अपने परिवारों से पहले की तुलना में अधिक पैसा भेजना पड़ रहा है. ट्रेड डील होने के बाद रुपये के 87 या 86 के स्तर तक पहुंचने की संभावना बढ़ सकती है. एक अन्य कारण यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब भी अनिश्चितता बढ़ती है, उसका सीधा असर आयात और निर्यात पर पड़ता है. यूक्रेन युद्ध से लेकर टैरिफ वॉर तक, कई वैश्विक घटनाओं का प्रभाव भारतीय रुपये पर देखने को मिला है.

ये भी पढ़ें: यूएस कोर्ट से Byju’s फाउंडर बायजू रवींद्रन को बड़ा झटका, 107 करोड़ डॉलर चुकाने का दिया आदेश, जानें पूरा मामला

राजेश कुमार पत्रकारिता जगत में पिछले करीब 14 सालों से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से लेकर अपराध जगत तक, हर मुद्दे पर वह स्टोरी लिखते आए हैं. इसके साथ ही, किसी खबरों पर किस तरह अलग-अलग आइडियाज के साथ स्टोरी की जाए, इसके लिए वह अपने सहयोगियों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे हैं. इनकी अंतर्राष्ट्रीय जगत की खबरों पर खास नज़र रहती है, जबकि भारत की राजनीति में ये गहरी रुचि रखते हैं. इन्हें क्रिकेट खेलना काफी पसंद और खाली वक्त में पसंद की फिल्में भी खूब देखते हैं. पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर ऑफ ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म किया है. राजनीति, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजेश कुमार लगातार लिखते आ रहे हैं.
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