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UP Election Result: 'हठ योग' से 'राज योग' को वश में करने वाले बन गए योगी आदित्यनाथ

क्या आप कभी सोच सकते थे कि उत्तर प्रदेश की सियासत का इतिहास एक भगवाधारी सन्यासी इतनी आसानी से बदल सकता था? लेकिन बदल कर दिखा दिया.बेशक राजनीति की भाषा में इसे साम,साम दंड,भेद से मिली जीत कहा जा सकता है लेकिन अगली 5 जून को अपनी उम्र के 50 बरस पूरे करने वाले योगी आदित्यनाथ की जिंदगी को खंगालेंगे,तो आप जान जाएंगे कि 24 बरस पहले राजनीति के अखाड़े में कूदने वाले इस संन्यासी को 'हठ योग' में कितनी महारथ हासिल है.

जाहिर है कि इस योग में पारंगत होने के लिए एक संन्यासी को बेहद कठोर तपस्या और साधना के उन अनगिनत दिनों से गुजरना होता है,जिसके बारे में एक गृहस्थ इंसान सोच भी नहीं सकता. लेकिन पौराणिक इतिहास बताता है कि इस विद्या को हासिल करने वाला सन्यासी जो ठान लेता है,उसे पूरा होना अवश्यम्भावी है,बशर्ते कि उसमें उसका अपना कोई निजी स्वार्थ न हो.उस लिहाज़ से अगर देखें,तो योगी आदित्यनाथ ने उसी विद्या के बलबूते देश के सबसे बड़े सूबे के लोगों का दिलो-दिमाग जीतने में ऐसी सफलता पाई है,जिसे हम 'भूतो न भविष्यति' के तराजू पर तौल सकते हैं.

देश की राजनीति का इतिहास लिखने वालों को न चाहते हुए भी ये सच तो लिखना ही पड़ेगा कि सबसे बड़े सूबे यूपी में एक भगवाधारी सन्यासी ने 37 साल पुराने सियासी इतिहास को बदलकर रख डाला. योगी आदित्यनाथ दोबारा यूपी के उस सिंहासन पर बैठने वाले हैं,जिसकी ताकत उन्हें गुरु गोरखनाथ की उस गद्दी पर बैठने से मिली है,जिस नाथ सम्प्रदाय के जनक दसवीं शताब्दी में अवतार लेने वाले पीर मत्सेयन्द्र नाथ को माना जाता है,जिन्हें मच्छरनाथ भी कहते हैं.उन्हीं के शिष्य थे गोरखनाथ जो बाद में गुरु गोरखनाथ के नाम से मशहूर भी हुए और उन्हीं के नाम पर उस शहर का नाम भी रखा गया.

योगी आदित्यनाथ देश ही नहीं बल्कि दुनिया के अकेले ऐसे संन्यासी नेता हैं,जो एक साथ दो भूमिका निभाते आये हैं. पिछले पांच साल से वे एक तरफ गुरु गोरखनाथ की गद्दी को संभाल रहे थे,तो वहीं खुद को यूपी की प्रजा का सबसे ईमानदार पालनहार साबित करने में भी पूरी शिद्दत से जुटे हुए थे.जाहिर है कि इतिहास को बदल देने वाली इस कामयाबी के बाद वे अगले पांच साल फिर उसी भूमिका होंगे लेकिन एक नए हौंसले और आत्मविश्वास से भरे एक नए जज़्बे के साथ.

शायद ये कम लोग ही जानते होंगे कि अजय सिंह बिष्ट यानी  योगी आदित्यनाथ के गुरु और उन्हें गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बनाने वाले दिवंगत महंत अवैद्यनाथ का नाता भी उत्तराखंड के पौढ़ी गढ़वाल से ही रहा है.उनका असली नाम कृपाल सिंह बिष्ट था लेकिन महज 23 साल की उम्र में ही वे संन्यासी बन गए और गोरक्षापीठ का उत्तराधिकारी बनते ही वे महंत अवैद्यनाथ के रुप में चर्चित हो गए.कहते हैं कि धर्म को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए लेकिन आप ये जानकर हैरान होंगे कि आज से 60 साल पहले यानी 1962 में  हिन्दू महासभा की तरफ से वे उत्तरप्रदेश की मानीराम सीट से विधानसभा के सदस्य चुने गए और उसके बाद भी वे तीन बार विधायक बने.बाद में,वे बीजेपी से जुड़ गए और गोरखपुर से ही चार बार लोकसभा के सांसद बने.

बताते हैं कि हठ योग व दर्शन के मर्मज्ञ महंत अवैद्यनाथ के  राजनीति में आने का मकसद जहां एक तरफ हिंदू समाज में फैली कुरीतियों को दूर करना था,तो वहीं अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के आंदोलन को गति देना भी रहा और इसके लिए वे अपने अंतिम समय तक डटे भी रहे. हिन्दू धर्म में ऊंच-नीच के भेदभाव को दूर करने के लिए वे लगातार सहभोज के आयोजन करते रहे,जिसके चर्चे गोरखपुर से लेकर दिल्ली के सियासी गलियारों में भी हुआ करते थे.लेकिन उनकी दूरदृष्टि और तप से प्राप्त हुई साधना की तारीफ इसलिये की जानी चाहिए कि उन्होंने अपने देहांत से 16 साल पहले ही योगी आदित्यनाथ को न सिर्फ गोरक्षापीठ का उत्तराधिकारी बनाया बल्कि महज 26 साल की उम्र में उन्हें गोरखपुर से लोकसभा का चुनाव लड़वाकर और जितवाकर ये साबित कर दिखाया कि उनका शिष्य सौ टके खरा है.

संसद की रिपोर्टिंग करने वाले कई पत्रकार साथियों को मार्च 1998 का वह वाकया भी याद होगा,जब संसद सदस्य की शपथ लेने के बाद महंत अवैद्यनाथ ने ही एक भगवा वस्त्रधारी नौजवान से परिचय कराते हुए कहा था कि -"अब मैं पूर्व सांसद हो गया हूँ. लेकिन ये योगी आदित्यनाथ हैं जो गोरखपुर से पहली बार निर्वाचित हुए हैं. मुझे विश्वास है कि इनके द्वारा सदन में उठाये जाने वाले मुद्दों को भी आप उतना ही महत्व देंगे, जितना मुझे देते आये हैं.'

संसद के मुख्य द्वार पर हुई उस औपचारिक मुलाकात  के बाद कई पत्रकार साथी इस बात को लेकर हैरान थे कि आखिर 26 साल का एक युवक संन्यासी भी हो सकता है और सांसद भी बन सकता है? उसी संन्यासी युवा ने लगातार पांच बार सांसद बनकर सबको चौंकाया.लेकिन कौन जानता था कि उम्र के 45 बरस पूरे करने से पहले ही वह देश के सबसे बड़े सूबे का  मुख्यमंत्री बन जायेगा और उससे भी बड़ी बात ये कि कितने लोगों को ये विश्वास था कि 50 बरस पूरे करने से पहले ही वह यूपी की सियासत का एक नया इतिहास लिख देगा.अब इसे हम हठयोग का कमाल नहीं तो और क्या समझेगें,जो राजयोग को भी एक संन्यासी के चरणों में लाल कालीन की माफ़िक बिछा देता है?

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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