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आतकंवाद को पालने-पोसने वाले पाकिस्तान को अचानक क्यों आ गई भारत की याद?

शायद आपको याद न हो लेकिन हमारे देश की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत यानी UN में कहा था कि "आतंकवाद को अपनी सरजमीं पर पैदा करने और उसे पालने-पोसने वाला पाकिस्तान आखिर किस हक़ से मानवाधिकार की वकालत करता है.वो पाकिस्तान जो मुल्क हैवानियत की हदें पार करते हुए बेगुनाहों को मौत के घाट उतारता है, वह यहां खड़े होकर हमें (भारत) इंसानियत का पाठ पढ़ा रहा है.लेकिन एक दिन ऐसा भी आयेगा, जब पाकिस्तान के हुक्मरान भारत की अहिंसा पर चलने वाली नीति की तारीफ़ भी करेंगे और हमसे मदद भी मांगेंगे." कोई सोच सकता था कि सितंबर 2018 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा के 73 वें सत्र में जब सुषमा स्वराज ये भाषण दे रही थीं, तब उनकी जिव्हा पर साक्षात सरस्वती विराजमान थीं. आज सुषमा जी इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी कही बात सच होते हुए सामने देखने को मिल रही है.

सियासी मैच के गणित में रन आउट होने के लिए तैयार दिख रहे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को अब भारत की याद आ गई है और अपने बागी सांसदों को समझाने के लिए अब  वे हमारी तारीफ में कसीदे पढ़ते जा रहे हैं.इमरान खान और नवजोत सिंह सिद्धू में एक समानता है कि ये दोनों ही क्रिकेट की पिच के महारथी रहते हुए सियासत के अखाड़े में तो कूद आये लेकिन दोनों ही उसकी मिट्टी की गंध और लोगों की उम्मीदों को समझने और उन्हें पूरा करने में नाकामयाब ही रहे. बेशक पाकिस्तान के अवाम ने इमरान खान को एक मौका दिया ठीक उसी तर्ज़ पर जैसे दिल्ली की जनता ने अरविंद केजरीवाल को दिया कि चलो, एक मौका इन्हें भी देकर देखते हैं.

लेकिन बात फिर वहीं आकर अटक जाती है कि एक बेहतरीन खिलाड़ी बैटिंग या बॉलिंग का बादशाह तो हो सकता है लेकिन जरुरी नहीं कि वो सियासत की पथरीली पिच को समझ पाए,जहां लाखों-करोड़ों लोग उससे उम्मीद लगाए बैठे होते हैं. जिस गलती के कारण नवजोत सिद्धू ने पंजाब में कांग्रेस को डुबा दिया,ठीक वैसे ही मंज़र का सामना अब इमरान खान कर रहे हैं और इसके लिए किसी और को कसूरवार ठहराना एक बड़ी नाइंसाफी होगी. पाकिस्तान में आज अगर समूचा विपक्ष एकजुट हो गया है और इमरान खान को पीएम की कुर्सी से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाया है, तो ये उस मुल्क की वो जम्हूरियत दिखाता है,जहां सेना के समर्थन और उसके दम पर ही इमरान की ताजपोशी हुई थी.

लेकिन मौजूदा राजनीतिक संकट में पाकिस्तान की सेना भी इमरान का साथ देते नहीं दिखाई दे रही. पाक सेना प्रमुख जनरल कमर बाजवा ने फिलहाल तो न्यूट्रल यानी तटस्थ रुख अपना रखा है लेकिन कौन जानता है कि इमरान सरकार के खिलाफ नेशनल असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव के पास होते ही वो कौन-सी चाल चलेंगे? इमरान की कुर्सी जाते ही संयुक्त विपक्ष को सरकार बनाने का मौका मिलेगा या फिर वहां की सेना अपना कब्जा कर लेगी? ये ऐसा सवाल है,जिसका जवाब  पाकिस्तान की सियासी नब्ज़ समझने वालों से लेकर वहां की राजनीति को बरसों से कवर कर रहे हुनरमंद पत्रकारों के पास भी फिलहाल तो नहीं है.

इसकी बड़ी वजह भी है. जो खबरें आ रही हैं, उसके मुताबिक इमरान सरकार विपक्ष द्वारा लाये गए इस अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ संसद में 28 मार्च को चर्चा कर सकती है. लेकिन कल रविवार को पीएम इमरान खान ने अपने समर्थकों की रैली में जो ऐलान किया है, वह पाकिस्तान में आने वाले हिंसक खतरे की तरफ इशारा कर रहा है. इमरान ने कहा है कि "27 मार्च को इस्लामाबाद में ऐसा हुजूम जुटेगा, जिसके बारे में पाकिस्तानी अवाम ने कभी सोचा भी नहीं होगा."

पाकिस्तान के मीडिया में उनके इस ऐलान को विपक्ष को कमजोर करने और अपनी ताकत की नुमाइश के रुप में देखा जा रहा है.लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि उसी दिन विपक्ष के तीन बड़ेनेताओं-शहबाज शरीफ,बिलावल भुट्टो और मौलाना फ़ज़रुल रहमान ने भी अपने समर्थकों को इस्लामाबाद में जुटाकर शक्ति प्रदर्शन करने का फैसला लिया है. इसलिये पाकिस्तान के सियासी जानकार मानते हैं कि दोनों तरफ से होने वाली ताकत की ये नुमाइश बेहद खतरनाक हिंसक रुप ले सकती है और हो सकता है कि अगले दिन संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा शुरु होने से पहले ही बाज़वा की सेना कमान अपने हाथ मे ले ले. हालांकि ये उनकी आशंका है और जरुरी नहीं कि ऐसा ही होगा.लेकिन उनकी इस एक दलील में दम भी नज़र आता है कि इमरान खान सेना की मदद से ही इस कुर्सी तक पहुंचे हैं. तीन दिन पहले ही चीनी दूतावास के आला अफसरों ने जनरल बाज़वा से मुलाकात की औऱ उसके बाद बाज़वा व इमरान के बीच लंबी मीटिंग हुई.यानी पर्दे के पीछे से चीन कोई ऐसे खेल को अंजाम दे रहा है कि अगर इमरान की कुर्सी जाना तय है,तो विपक्ष के हाथों सरकार की कमान सौंपने से बेहतर है कि इमरान और चीन के भरोसेमंद मानये जाने वाले जनरल बाज़वा के हाथों में ही सत्ता आ जाए.

इस सियासी उथल पुथल के बीच सबसे अहम बात ये है कि अविश्वास प्रस्ताव से ऐन पहले चीन ने अपने ताकतवर विदेश मंत्री को पाकिस्तान भेजने का फैसला किया है.पाकिस्तान ने रविवार को कहा कि चीन के विदेश मंत्री वांग यी यहां इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में शिरकत करेंगे.बात दें कि पाकिस्तान 22-23 मार्च को अपने यहां ओआईसी के विदेश मंत्रियों की परिषद (सीएफएम) के 48वें सत्र की मेजबानी करने जा रहा है.पाक विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि चीनी विदेश मंत्री 23 मार्च को विशिष्ट अतिथि के रूप में पाकिस्तान दिवस परेड भी देखेंगे. विदेश कार्यालय ने कहा, 'पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के विदेश मंत्री और स्टेट काउंसलर वांग यी विशेष अतिथि होंगे.' लिहाज़ा,सबकी निगाहें अब इस पर टिकी हैं कि चीन इमरान खान की सरकार को बचाने में मददगार बनता है या फिर अपने मनमाफिक मोहरे के हाथ इसकी कमान सौंपने का भागीदार बनता है?

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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