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Opinion: एक महीने बाद भी क्यों नहीं रुकी इजरायल-हमास की जंग, ये हैं इसके तीन बड़े फैक्टर

पिछले एक महीने में इजरायल-हमास संघर्ष में जो कुछ भी घटा है और इजरायल ने जिस तरह का कड़ा रुख अख्तियार करके रखा हुआ है, वो पीछे हटने वाला नहीं है, भले ही इजरायल पर कितना ही दबाव क्यों न पड़े, दुनिया भर में फिलीस्तीन के समर्थन में कितने ही जुलूस क्यों न निकल रहे हों! इजरायल का कहना है कि जब तक हमास का एक भी सरगना या आतंकी जिंदा है, वह इस ऑपरेशन को खत्म नहीं करेगा. पिछले कई बार से ऐसा ही लग रहा है कि जब भी इजरायल या फिलीस्तीन का विवाद हुआ है, तो अमेरिका इजरायल के पक्ष में ही खड़ा हुआ है. ये विवाद चूंकि अमेरिका भी मानता है कि होलोकॉस्ट के बाद यहूदियों पर सबसे बड़ा हमला है, इसलिए वह शुरुआत से ही इजरायल के साथ खड़ा है.

कई और मुल्क हैं, चाहे लेबनान हो, उसका हिजबुल्ला हो, ईरान हो या सीरिया हो, सभी को इजरायल के साथ अपना स्कोर सेटल करना है, उनके अपने स्वार्थ हैं, इसलिए वे फिलीस्तीन के साथ हैं. अमेरिका ने अपना एक टैक्टिकल स्टैंड लिया है और वह चाहता है कि यह संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध में न बदले, इसलिए उसने अपने जंगी जहाज भी भेजे हैं. पनडुब्बियां अक्सर समंदर के अंदर चलती हैं, उनके आने-जाने की खबर सबको नहीं दी जाती, लेकिन अमेरिका ने उसके फोटो भी जाहिर कर दिए. 

आइसिस को रोकने के लिए अमेरिका ने सीरिया में अपना बेस बना रखा था. मौके का फायदा उठाकर ईरान ने उन्हीं अड्डों पर हमला कर दिया. उन हमलों में 40 से अधिक सुरक्षाकर्मी घायल हुए. वे अमेरिका के थे. ईरान मौके का फायदा उठा रहा है, लेकिन अमेरिका ने भी कहा है कि वह अपने किसी भी सैनिक की जान बेजां नहीं जाने देगा और वह इसे सहन नहीं करेगा. इसलिए, अमेरिका ने भी ईरानी मिलिशिया पर हमला किया है. वे जहां असलहा-बारूद रखते थे, उसको अमेरिका ने नेस्तनाबूद कर दिया है और इसमें ईरान के कुछ सैनिक भी मारे गए हैं. अमेरिका ने अपने सैनिक ठिकानों की भी सुरक्षा की है और गोला-बारूद से कोई मदद हमास को न जा सके, इसको भी सुनिश्चित किया है. 

फिलीस्तीन के नाम पर इस्लामिक ब्रदरहुड को दिखाने की कोशिश की जाती रही है और इसी बहाने वे इस मुद्दे को भुना लेना चाहते हैं. पूरी इस्लामिक दुनिया जो शिया और सुन्नी में बंटी हुई है, वह इसके बहाने इजरायल को सबक सिखाना चाहती है. वे कहीं न कहीं यह खिचड़ी भी पकाने में लगे हैं कि फिलहाल वे अपने सारे गिले-शिकवे भुलाकर, शिया-सुन्नी विवाद को भुलाकर एक हो जाएं. हालांकि, ये दूर की कौड़ी लगती है, क्योंकि जो भी बड़े इस्लामिक मुल्क हैं, वे मुंहजबानी खर्च तो फिलीस्तीन के बारे में कर रहे हैं, लेकिन उनको भी पता है कि हमास ने जो हमला किया था, वह आतंकी हमला था और उसे किसी भी तरह डिफेंड नहीं किया जा सकता है. हम मिस्र की बात करें या यूएई की बात करें, ये कुछ मुल्क ऐसे हैं, जो तार्किक बात करते हैं. ओआइसी की जो मीटिंग रविवार यानी 12 नवंबर को हो रही है, उसमें भी निंदा प्रस्ताव ही आएगा, ऐसा सोचना फिलहाल दूर की कौड़ी लगाना होगा कि इस्लामिक देश एकजुट होकर इजरायल के खिलाफ युद्ध में शामिल हो जाएं. 

ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी का 12 साल के बाद रियाद जाना बड़ी घटना तो है. इस मुद्दे पर इस्लामिक देशों को दिखाना है कि वे कुछ कर रहे हैं और यह एक दिखावा ही है. इस बैठक से बहुत कुछ निकलने की उम्मीद नहीं है. एक कठोर निंदा प्रस्ताव और इस्लामिक देशों की एकजुटता दिखाई जाएगी. इजरायल से सीजफायर का आग्रह किया जाएगा या फिर बड़ी ताकतों ब्रिटेन और अमेरिका से यह आग्रह किया जाएगा कि इजरायल को संघर्षविराम के लिए मनाया जाए. भारत से भी यह आग्रह किया जा सकता है. 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत इंडोनेशिया के बाद सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश है. भारत लेकिन आतंकवाद का भुक्तभोगी देश रहा है और उसने हमेशा बड़े मुल्कों को समझाने की कोशिश की है. बड़े देशों ने 9-11 की घटना के बाद ही आतंक को अलग नजरिए से देखना शुरू किया है, लेकिन भारत का हमेशा से ही जीरो टॉलरेंस रहा है. आतंक के मुद्दे पर भारत कोई समझौता नहीं करना चाहता है. फिलीस्तीन और इजरायल साथ बैठकर इस मसले का हल निकालें, यह भारत की हमेशा से नीति रही है. भारत ने फिलीस्तीन से भी बात की है, इजरायल से भी वार्ता की है. हरेक मुल्क यह चाह रहा है कि भारत इस मामले में मध्यस्थता करे, लेकिन भारत अभी तक तो उसमें रुचि नहीं दिखा रहा है. 

इजरायल ने अभी एक घंटे का टैक्टिकल पॉज दिया है. इसको कुछ लोग सीजफायर भी बोल रहे हैं, लेकिन यह टैक्टिकल प़ॉज है. अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इसके कई मायने निकल सकते हैं. इजरायल को पता है कि अगर उसने लंबा पॉज या विराम दिया तो हमास फिर से रसद मंगवा सकता है और यह युद्ध चलता ही रहेगा. इजरायल चाह रहा है कि जो बंधक हैं, उनको एक घंटे में निकलवा ले, या फिर अस्पतालों वगैरह को थोड़ी राहत या मदद पहुंचाई जा सके. इस पॉज के लिए भी भारत और बड़े देशों के दखल की संभावना से इनकार नहीं कर सकते हैं. भारत अगर आनेवाले दिनों में और भी बड़ी भूमिका निभाता है, तो उससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]

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