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ब्लॉग: नरसिंह Vs मनमोहन, इतिहास किसे सुनहरे अक्षरों में याद करेगा?

आर्थिक सुधारों के 25 साल बाद नरसिंह राव और डॉक्टर मनमोहन सिंह में तुलना की जा रही है. कुछ लेखक जैसे विनय सीतापती और डॉक्टर संजय बारू नरसिंह राव की महानता का गुणगान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं. लेकिन सच कुछ और है. पहली नज़र में मनमोहन शायद अपने राजनीतिक गुरू के सामने हल्के दिखेंगे, लेकिन इतिहास मनमोहन सिंह की उपलब्धियों को स्वर्णिम शब्दों मे लिखेगा. नरसिंह राव की तरह मनमोहन ने कभी भ्रष्टाचार का दाग़ नहीं सहा. राव 1984 के दंगों के समय देश के गृह मंत्री थे. भोपाल गैस का मुजरिम वॉरेन एंडर्सन उनकी नाक के नीचे से निकल गया और राव कुछ नहीं कर सके. एक विद्वान और वरिष्ठ नेता होने के बावजूद आखिरी समय तक उनकी लेखनी या वाणी से कुछ भी नहीं निकला. राव के बाबरी मस्जिद विध्वंस के रोल को अगर दरकिनार भी किया जाए तो लखू भाई पाठक, जेएमएम घूसकांड, हवाला, सैंट किट्स, स्टॉक मार्केट घोटाला, यूरिया घोटाला और अनेक विवाद नरसिंह राव के अंतिम समय तक साथ रहे. वो स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने जो आपराधिक मामलों मे अदालत में पेश हुए. राजनीतिक स्तर पर भी नरसिंह राव फ़्लॉप रहे. तेलुगू भाषी होने के बावजूद 1994 के आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हारी. उत्तर प्रदेश में राव ने मानो पूर्वाग्रह से कांग्रेस के परंपरागत वोटर्स को अलग किया. बहुजन समाज पार्टी से सिर्फ 125 विधानसभा सीटें ले कर राव ने उत्तर प्रदेश मे कांग्रेस की कमर ही तोड़ दी. 1996 का लोकसभा चुनाव आने से पहले राव ने जैन हवाला के शगूफ़े से कांग्रेस और विपक्ष के प्रमुख राज नेताओं के साथ षड्यंत्र रचा. लाल कृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री की दावेदारी 1996 में चुनाव न लड़ पाने से धुमिल हो गई. राव अपने राजनीतिक कौशल पर कोई चुनाव नहीं जीत सके. मरणोप्रांत राव कांग्रेस के बड़े तबके का सम्मान नहीं हासिल कर सके. इसकी तुलना मे मनमोहन सिंह का रिकॉर्ड कहीं बेहतर है. 2009 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस मनमोहन की लोकप्रियता पर, खासकर शहर के मतदाताओं के बल पर जीती. मनमोहन उसका व्यक्तिगत लाभ नहीं उठा पाए जो कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की अलग कहानी है. मनमोहन ने 10 जनपथ से हमेशा पेशेवर संबंध रखे. 10 साल में मैंने गुरू शरण कौर को कभी गुलाब का फूल या गुलदस्ते लिए लाइन में खड़े नहीं देखा, न कभी राहुल, सोनिया गांधी को जन्मदिन की बधाई देने की आतुरता दिखी. हां! मनमोहन की ब्यूरोक्रेटिक मानसिकता और कुछ फैसलों में देरी की वजह से यूपीए सरकार को बदनामी मिली. दरअसल फ़ैसलों में देरी की कई वजहें थीं, जैसे कि द्रमुक के मंत्री को हटाने के लिए लम्बी कवायद करनी पड़ती थी. गठबंधन की सरकार में प्रधानमंत्री को अपने मंत्री रखने या हटाने का पूरा अधिकार होना चाहिए, लेकिन अटल बिहारी बाजपेयी सरकार में भी घटक दल के नेताओं को अपने मंत्री रखने और हटाने का अधिकार था जो प्रधानमंत्री की मर्यादा के विपरीत था. मनमोहन की सबसे बड़ी अयोग्यता उनकी राजनातिक साहस की कमी थी. विदेश, रक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में वो बहुत कुछ कर सकते थे. अगर वो न्यूक्लियर डील वाली तत्परता अन्य क्षेत्रों में दिखाते तो उनकी और कांग्रेस की ये दुर्गति ना होती. अगर मनमोहन में राजनीतिक साहस की कमी थी तो उनके गुरू राव में नैतिक साहस की. कांग्रेस को कमजोर बनाने में राव का मनमोहन से कहीं बड़ा योगदान है जो लेखक विनय सीतापती या संजय बारू बयान नहीं कर पा रहे हैं. (रशीद किदवई 24 अकबर रोड, सोनिया अ बायोग्राफी के लेखक और दी टेलीग्राफ के एसोसिएट एडिटर हैं. इस लेख में उनके निजी विचार हैं.)

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