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ब्लॉग: आलिम नहीं, ज़ालिम हैं तीन तलाक के पैरोकार

‘तीन तलाक़’ यानि एक साथ ‘तीन तलाक़’ को लेकर करीब साल भर से देश भर में बहस गर्म है. मुस्लिम महिलाओं के कई संगठन इस परंपरा को खत्म करने के लिए जोरदार आंदोलन चला रहे हैं. कई मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक के साथ ही खुला, हलाला और चार शादियों के मर्दों के तथाकतथित अधिकारों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है. पहले भी कई बार तीन तलाक का मामला सुप्रीम कोर्ट में आ चुका है. सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों का बेंच 2007 में भी तीन तलाक को गैर संविधानिक और कुरान के खिलाफ करार दे चुका है. हाल ही में इलाहबाद हाई कोर्ट ने तीन तलाक से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए इसे असंवैधानिक और कुरान के खिलाफ करार दिया है. इससे तीन तलाक पर बहस फिर तेज हो गई है.

इलाहबाद हाई कोर्ट के ऑब्जर्वेशन के बाद बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कड़ा रूख अख्तियार करते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया है. ताज्जुब की बात ये है कि तमाम मुस्लिम संगठन, आलिम एक साथ दी गई तीन तलाक को ग़लत मानते हैं. इसे कुरान के खिलाफ मानते है लेकिन इसे इसे ख़त्म करने के सवाल पर वो खामोश हो जाते हैं. तमाम आलिमों की राय में तीन तलाक़ एक बिदअत यानि इस्लाम की तालीमात के बाद में बाहर से जोड़ी गई एक परंपरा है. अब सवाल उठता है कि अगर तीन तलाक एक बिदअत है तो फिर तमाम आलिम इसे ख़त्म करने के लिए आगे क्यों नहीं आते.

तमाम आलिम ये कहते नहीं थकते कि इस्लाम ने औरतों को 1400 साल पहले जो अधिकार दिए हैं वो किसी और धर्म ने नहीं दिए. जब मुस्लिम औरतें अपने इन्हीं अधिकारों के हासिल करने के लिए आवाज़ उठाती हैं तो यही आलिम उनकी आवाज़ दबान में कोई कसर नहीं छोड़ते. आखिर ये आलिम एक साथ तीन तलाक देकर घर से निकाली गई औरतों को उनका हक़ दिलाने की पहल क्यों नहीं करते.

इस्लामी कानून तीन तलाक़ पर क्या कहता है?

सबसे पहले नजर डालते हैं कि शरीयत यानि इस्लामी कानून तीन तलाक़ पर क्या कहता है. भारत में प्रचलित शरीयत के मुताबिक अगर कोई शौहर अपनी बीवी को एक साथ तीन बार तलाक बोल दे तो उसका तलाक हो जाता है. चाहे गुस्से और नशे में ही क्यों न हो. इसके मुताबिक फोन पर, एसएमएस से, ई-मेल से भी तलाक हो जाता है. बीवी सुने या ना सुने तलाक हो जाता है. सोती हुई बीवी को भी शौहर तलाक दे सकता है. अगर शौहर बीवी को आमने सामने तलाक नहीं देना चाहता तो वो किसी और से भी अपनी बीवी से कहलवा सकता है कि उसने उसे तलाक दे दिया है. साधारण डाक या रजिस्टर्ड डाक से चिट्ठी भेज कर भी तलाक दी जा सकती है. इंटरनेट पर चैंटिंग के जरिए, स्काइपे या फेसबबुक पर वीडियो कॉलिंग के जरिए भी तलाक जी सकती है. किसी को अगर शक हो तो दुनिया भर में मशहूर इस्लामी शिक्षा के केंद्र दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट पर जाकर फतवे देख सकता है.

तीन तलाक क्या बला है, इसपर बहस करने से पहले ये सारी बातें जरूर जानें

इन फतवों में देवबंद के आलिमों ने ऐसे तमाम तरीकों से दी गई तलाक़ को सही ठहराया है. यहां तक कि अगर शौहर कहे कि उसकी नीयत तलाक देने की नहीं थी. उसने बेख्याली या गुस्से में तलाक़ दे दी. उलेमा ये दलील नहीं मानते. देवबंद से जारी ज्यादातर फतवों में शौहर को अपनी पत्नी को वापिस पाने के लिए जायज़ हलाला की तरकीब बताई गई है.

क्या है हलाला? जानें- कैसे मुल्लाओं ने की है इस अच्छे नियम से शरारत

तलाक पर कुरान क्या कहता है? शरीयत का पहला स्रोत कुरान है. देखते हैं कि तलाक पर कुरान क्या कहता है. सूराः बक़रा की आयत नबंर. 25 में कहा गया है, “अल्लाह तुम्हारी अनजानी सौगंधों पर तुमको नहीं पकड़ता, बल्कि वह उस संकल्प पर पकड़ता है जो तुम पक्के इरादे से करते हो. और अल्लाह क्षमा करने वाला और सहनशील है.” इससे साफ है कि अगर कोई शौहर कहे कि उसने गलती से गुस्से में या नशे की हालत में तलाक दिया है. तलाक का उसका इरादा नहीं था तो कुरान के हिसाब से उसे माफी मिलनी चाहिए. अल्लाह माफ करने वाला, सहनशील और रहम करने वाला है. अफसोस कि हमारे उलेमा रहमदिल, सहनशील और माफ करने वाले नहीं है. इसी सूराः बक़रा की आयत न. 226 में कहा गया है, “जो लोग अपनी बीवियों से न मिलने की कसम खा लें तो उनके लिए चार महीन की मोहलत है. वो अपनी पत्नी की तरफ लौट आएं तो अल्लाह क्षमा करने वाला दयावान है.”

quran

अगली सूराः 227 में कुरान कहता है, “अगर वो तलाक का फैसला करें तो वास्तव में अल्लाह सुनने वाला और जानने वाला है.” अगली आयत न. 228 में ताकीद है, “तलाक दी हुई औरतें अपने आप को तीन मासिक धर्मों तक रोके रखे. अगर वो अल्लाह और क़यामत के दिन पर यक़ीन रखती हो तो उनके लिए जायाज़ नहीं कि वो उस चीज़ को छुपाए तो अल्लाह ने उनके गर्भ में पैदा किया है. और इस बीच अगर उनके पति संबंधों को सुधारना चाहें तो वो उनको लौटा लेने का ज्यादा अधिकार रखते हैं.”

कुरान आगे इसी सूराः बकरा की आयत न. 229 में कहता है, “तलाक दो बार है. उसके बाद या तो रिवाज के अनुसार बीवी को रख लेना है या अच्छे ढंग से विदा कर देना है.” इससे जाहिर है कि कुरान ने शौहर को तलाक की गलती सुधारने के दो मौके दिए हैं. अगली आयत 230 में कुरान कहता है, “अगर उसने फिर तलाक दे दिया तो वह औरत उसके लिए हलाल नहीं रही. वो औरत किसी और मर्द से निकाह कर ले और अगर वो भी उसे तलाक दे दे तो फिर दोनों के आपस में मिलने में कोई गुनाह नहीं, शर्त ये है कि उन दोनों को अल्लाह की सीमाओं पर जमे रहने की उम्मीद हो. यह अल्लाह के दिए हुए नियम हैं जिनको वो बयान कर रहा है उन लोगों के लिए जो बुद्धि वाले हैं.” इससे साफ है कि कुरान में एक साथ तीन तलाक का कोई जिक्र नहीं है. बल्कि तलाक का तरीका साफ-साफ समझाया गया है.

कुरान में 16 सूरतों में तलाक से संबंधित कुल 44 आयतों हैं. इनमे कहीं भी एक साथ तीन बार तलाक कह कर निकाह को तोड़ने की बात नहीं कही गई है. तलाक के बाद भी औरतों को इज्जत से विदा करने की ताकीद की गई है.

तलाक पर हदीस का क्या कहती है?

शरीयत का दूसरा स्रोत है हदीसें. यूं तो हदीसें बहुत सी है. लेकिन सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम, तिरमिज़ी, अबू दाऊद, इब्ने माज़ा, और नसाई कुल मिलाकर इन छह हदीसों को प्रामाणिक और विश्वसनीय माना जाता है. इनमें तलाक से जुड़ी हदीसों मे एक भी हदीस ऐसी नहीं हैं जिसमें मुहम्मद (सअ) ने एक साथ दी गई तीन तलाक को जायज़ बताया हो. इसके उलट नसाई की एक हदीस के मुताबिक एक साथ तीन तलाक देने की खबर पर मुहम्मद साहब का बेहद गुस्सा हो गए थे. उन्होंने इसे अल्लाह की किताब का मजाक उड़ाना कहा था. हदीसों के अध्यन से पता चलता है कि मुहम्मद साहब सामने, पहले खलीफ हज़रत अबू बक्र की खिलाफत में और दूसरे खलीफा हजरत उमर की खिलाफत के पहले दो साल तक एक बार में दी गई तीन तलाक को एक ही माना जाता था. बाद में खास परिस्थितियों में हजरत उमर ने एक इन्हें तीन मामने का हुक्म दिया लेकिन कुछ दिन बाद इस फैसले को वापिस ले लिया था. सहीह मुस्लिम के पुराने संस्करण में इब्ने अब्बास के हवाले से लगातार तीन हदीसों में इसका जिक्र है लेकिन मौजूदा संस्करण में से तीसरी हदीस निकाल दी गई है.

न कुरान, न हदीस में तीन तलाक, फिर हठधर्मिता क्यों?

अब ये सवाल पैदा होता है कि अगर कुरान में एक बार में तीन तलाक का जिक्र नहीं है. हदीसों में भी इसे अच्छा नहीं बताया गया. तो फिर हमारे उलेमा इसे क्यों जारी रखने पर अड़े हुए हैं. जॉर्डन, मिस्र, सूडान, ईरान, इराक और पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों ने एक साथ दी गई तीन तलाक पर पाबंदी लगा रखी है. यानि अगर कोई एक साथ तीन बार तलाक देकर अपनी बीवी को छोड़ना चाहे तो वो ऐसा नहीं कर सकता. उसे तलाक की ठोस वजह बतानी होगी. सवाल उठता है कि अगर तमाम मुस्लिम देशों में ऐसा हो सकता हो तो फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता. ये बात समझ से बाहर है कि हमारे उलेमा कुरान और हदीस की तमाम दलीलों को दरकिनार कर एक बार में तीन तलाक के चलन को ही जारी रखने पर ही क्यों अड़े हुए है.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ के झंडे तले तमाम मुस्लिम संगठन एकजुट होकर तीन तलाक के हक में आंदोलन चला रहे हैं. शरीयत बचाओ आंदोलन चलाया जा रहा है. ये सब मजहब के नाम पर आम मुलसमानों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर राजनीतिक रोटिंया सेंकी जा रही हैं. ऐसा करके हमारे तथाकथित आलिम मुस्लिम समाज का कोई भला नहीं कर रहे बल्कि उसे गुमरराही की दलदल में धकेल कर आने वाली पीढियों के भविष्य पर ग्रहण लगा रहे हैं.

आखिर मुसलमान तीन तलाक के सवाल पर बहस से क्यों डरता है, क्या हैं वजहें?

कुरान की कसौटी पर आलिम

तथाकथित इन आलिमों के आचरण को अगर हम कुरान की कसौटी पर कस कर देखते हैं. आइए देखते हैं कुरान ऐसे लोगों के बारे में क्या कहता है. सूराः अल माइदा की आयत न. 44-47 में अल्लाह ने उन यहूदी और ईसाई उलेमा को अकृतज्ञ, ज़ालिम, अत्याचारी और काफिर तक कहा है जो अल्लाह की उतारी हुई किताबों तौरेत और इंजील यानि बाइबिल के अनुसार फैसले नहीं करते थे. उसके बाद सूराः अल माइदा की आयत न. 48 में अल्लाह अपने नबी मुहम्मद (सअव) से मुखातिब होकर कहता है, “और हमने तुम्हारी तरफ एक किताब उतारी है. सच्चाई के साथ. ये किताब पिछली किताबों की पुष्टि करने वाली है और उनके विषयों की संरक्षक भी है. अतः तुम उनके बीच फैसला करो उसके अनुसार जो अल्लाह ने उतारा है. और जो सच्चाई तुम्हारे पास आई है उसे छोड़ कर उनकी (लोगों की) इच्छाओं का अनुसरण न करो.” कुरान की इन आयतों की रोशनी में साबित होता है कि तीन तलाक की पैरवी करने वाले लोग आलिम नहीं ज़ालिम है. अब तो मुस्लिम समाज के भीतर से इसके खिलाफ मजबूत आवाज उठने लगी है. अपने हक के लिए कई महिलाओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार के साथ अन्य पक्षों की राय भी मांगी है. केंद्र सरकार के महिला एवं बाल विकास कल्याण मंत्रालय ने मुस्लिम देशों में प्रचलित तलाक के तौर तरीकों पर एक खास रिपोर्ट तैयार करके सुप्रीम कोर्ट को दी है. बेहतर होगा कि मुस्लिम समाज के सच्चे मजहबी रहनुमा आगे आकर एक साथ तीन तलाक के मसले को हल करके इसकी वजह से बड़े पैमाने पर बर्बाद हो रही मुस्लिम औरतों की जिंदगी बचाएं.

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