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पाक पत्रकार के दावे और हामिद अंसारी पर हमला करने का आखिर क्या है सच ?

पत्रकार के भेष में भारत आये पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के एक जासूस के साथ मंच साझा करने को लेकर बीजेपी पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी पर बेहद तीखे अंदाज़ में हमलावर हो गई है. बीजेपी ने साल 2009 में आतंकवाद पर हुए एक सम्मेलन की तस्वीर जारी करते हुए अंसारी को कटघरे में खड़ा किया है, जिसमें पाकिस्तानी पत्रकार नुसरत मिर्जा भी उनके साथ मंच पर बैठे दिख रहे हैं. हालांकि हामिद अंसारी ने अपनी सफाई  में यही दोहराया है कि वे नुसरत मिर्जा से न तो कभी मिले और न ही उन्होंने उसे किसी समारोह में शिरक़त करने का कोई न्योता ही दिया.

अब सवाल उठता है कि अगर किसी समारोह के आयोजक ने पाकिस्तानी पत्रकार को बुलाया था तो इसके लिए हामिद अंसारी को भला कैसे कसूरवार ठहराया जा सकता है? वे तो उस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे. तब तक तो कोई जानता भी नहीं था कि नुसरत मिर्ज़ा पत्रकारिता की आड़ में आईएसआई के लिए जासूसी भी कर रहे हैं. ये ख़ुलासा तो खुद मिर्जा ने ही पिछले दिनों यू ट्यूब के लिए दिये गए एक इंटरव्यू में किया है. 13 साल बाद एक पत्रकार के दावे पर आंख मूंदकर यक़ीन कर लेना और इस बहाने देश के संवैधानिक पद से रिटायर हुए शख्स पर हमला करना सही है या फिर इसके पीछे भी किसी गहरी राजनीति का जाल बुना जा रहा है?

दरअसल, नुसरत मिर्ज़ा के जिस इंटरव्यू पर हमारे यहां तो इतनी सियासत हो रही है, उसे लेकर पाकिस्तान की पत्रकार बिरादरी हैरान है. इसलिये कि वे महज़ एक कॉलमनिस्ट हैं और जमीन से जुड़ी पत्रकारिता, उन्होंने कभी की नहीं. यू ट्यूब पर मिर्जा का इंटरव्यू करने वाले पाक पत्रकार शक़ील चौधरी कहते हैं कि वे अपने कॉलम में भी ऐसी साजिशों की परिकल्पना करते रहते हैं, जो किसी सपना देखने जैसा होता है, इसलिए लोग उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते. सोचने वाली बात है कि जो शख्स अपने कॉलम में ये कह रहा हो कि पाकिस्तान में भूकंप और जापान में जो सूनामी आई, वो अमरीका लाया था, तो कौन उन्हें गंभीरता से लेगा?"

चौधरी के मुताबिक "उनका आकलन इतना ढीला और लापरवाह किस्म का है कि उसमें कोई बौद्धिक विशेषज्ञता या इंटेलेक्चुअल सोफ़िस्टिकेशन नहीं है. किसी भी विषय पर लिखे उनके कॉलम को पढ़ने के बाद विश्लेषण करने की उनकी योग्यता के आप कायल नहीं हो सकते, इतना तय है. कराची के ही एक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक "खबर के हिसाब से हम उनको (नुसरत मिर्ज़ा को) भरोसेमंद नहीं कह सकते. वो बहुत ज़्यादा बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं. जर्नलिस्टिक कम्युनिटी में उनकी बहुत ज़्यादा विश्वसनीयता नहीं है. उनकी बातों पर शायद ही कोई ज्यादा भरोसा  करता हो.

इसलिये पाकिस्तान में भी नुसरत मिर्ज़ा के दावों को लेकर सवाल उठ रहे हैं औऱ पूछा जा रहा है कि ये सब उन्होंने शोहरत बटोरने व सुर्खियों में बने रहने के लिए ही किया है या फिर कोई और भी मकसद है? दरअसल, मिर्ज़ा ने इस इंटरव्यू में दावा किया है कि जब हामिद अंसारी भारत के उप-राष्ट्रपति थे तब उन्हें एक सेमिनार के लिए भारत बुलाया गया और उन्होंने भारत यात्रा के दौरान इकट्ठा की गई जानकारी को आईएसआई के साथ साझा किया था. उनके मुताबिक वे  पांच बार भारत यात्रा पर गए और इस दौरान वे दिल्ली समेत बेंगलुरु, चेन्नई, चंडीगढ़, कोलकाता, पटना व लखनऊ भी गए थे.

इसी इंटरव्यू में नुसरत मिर्ज़ा ने ये भी कहा है कि "पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी ने उन्हें कथित तौर पर भारत के सात शहरों का वीज़ा दिलवाया और जब वो भारत से जानकारी इकट्ठा करके लाए तो खुर्शीद कसूरी ने उनसे कहा कि वो उसे उस वक्त के आईएसआई प्रमुख जनरल कयानी को दे दें." लेकिन अब नुसरत मिर्ज़ा की इन बातों को बातों को सुनकर खुर्शीद महमूद कसूरी भी हैरान हैं. "अगर वो जासूस थे तो अपनी पहचान ज़ाहिर करके दुनिया भर को बताने की क्या ज़रूरत थी? दुनिया की किसी भी खुफिया एजेंसी का कोई जासूस क्या कभी खुद अपने मुंह से ढिंढोरा पीटता है कि वो क्या काम करता है! अगर वो जासूसी कर रहे थे तो सीधे चले जाते और बता देते आईएसआई को. उनको मेरे पास आने की क्या ज़रूरत थी?"

इधर हमारे यहां 2009 के उस सम्मेलन की तस्वीर जारी करते हुए बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया कहते हैं कि, "अगर हामिद अंसारी चाहते तो वह कह सकते थे कि उस व्यक्ति को सम्मेलन में नहीं बुलाया जाए. वह उसके साथ मंच साझा करने से मना कर सकते थे. संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति की जिम्मेदारी भी बड़ी होती है. किसी भी व्यक्ति से ऊपर देश और इसके नागरिकों का हित है." 

इस तस्वीर पर सफाई देते हुए हामिद अंसारी के कार्यालय से जारी बयान में कहा गया है कि भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति अपने पहले के बयान पर कायम हैं कि वे पाकिस्तानी पत्रकार नुसरत मिर्जा को कभी नहीं जानते थे. उन्होंने मिर्जा द्वारा उल्लिखित 2010 के सम्मेलन 2009 के आतंकवाद पर हुए सम्मेलन या किसी भी अन्य सम्मेलन में उसे आमंत्रित नहीं किया था. 

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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