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BLOG: बच्चों की मौत पर राजनीति के बजाय समग्र स्वास्थ्य नीति बनाए योगी सरकार

इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सितंबर में भी मासूम बच्चों पर मौत का सिलसिला बेखौफ तरीक़े से जारी है. ऊपर से तुर्रा यह है कि सरकार इसकी जिम्मेदारी तक लेने को तैयार नहीं.

उत्तर प्रदेश आजकल मासूम बच्चों की मौत को लेकर राष्ट्रीय मीडिया में लगातर सुर्खियों में है. राज्य में बच्चों की मौत के चौंकाने वाले मामले सामने आ रहे हैं. पिछले महीने गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में तीन सौ से ज़्यादा बच्चों की मौत पर कोहराम मचा वहीं अब फरूर्खाबाद में एक ही महीने में वहां के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में 49 बच्चों की मौत पर बवाल मच रहा है. बच्चों की मौत पर बड़ी ही बेशर्मी और बेहयाई के साथ राजनीति हो रही है.

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज के दौरे पर गए मख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खड़े-खड़े वहां इंसेफेलाइटिस विभाग के अध्यक्ष डॉ कफील को प्राइवेट प्रैक्टिस के आरोप में बर्खास्त कर दिया था. उनके इस कदम की खूब आलोचना हुई. इस कार्रवाई को पूरे मामले को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश माना गया था. वहीं राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने यह कर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ा कि अगस्त के महीने में ज़्यादा मौतें होती हैं. बाद में कालेज ने बाकायदा आंकड़े जारी करके स्वास्थ्य मंत्री के दावे की पुष्टि भी की. इन आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2014 में अस्पताल में 567 बच्चों की जान गई थी. वहीं अगस्त 2015 में 668 और अगस्त 2016 में 587 बच्चों ने दम तोड़ा. अगस्त 2017 में यह आंकड़ा 325 रहा.

इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सितंबर में भी मासूम बच्चों पर मौत का सिलसिला बेखौफ तरीक़े से जारी है. ऊपर से तुर्रा यह है कि सरकार इसकी जिम्मेदारी तक लेने को तैयार नहीं. मासूम बच्चों की मौत का गोरखपुर जैसा ही मामला फर्रुखाबाद के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सामने आया है. यहां पिछले एक महीने में 49 बच्चों की मौत हो चुकी है. मौत का ये आंकड़ा 21 जुलाई से 20 अगस्त के बीच का है. गोरखपुर की तरह यहां भी मामले को रफा-दफा करने की कोशिश हो रही है. सरकार यहां भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही है.

डीएम की पहल पर कराई गई जांच में सामने आया है कि बच्चों की मौत ऑक्सीजन और जरूरी दवाओं की कमी की वजह से हुई है. इस रिपोर्ट के आधार पर डीएम ने सीएमओ और सीएमएस सहित कई लोगों के खिलाफ़ गैर-इरादतन हत्या के आरोप में रिपोर्ट दर्ज करा दी. उत्तर प्रदेश सरकार ने गोरखपुर की तरह फरूर्खाबाद के डीएम की रिपोर्ट पर ही सवाल उठा दिए. ऑक्सीजन और दवाओं की कमी मानने से साफ इंकार कर दिया और पुलिस को एफआईआर पर कार्रवाई करने से रोक दिया गया. सरकार का आरोप है स्थानीय प्रशासन और अस्पताल प्रशासन के बीच तालमेल की कमी है. इस लिए डीएम ने दुर्भावना से प्रेरित होकर अस्पताल के डॉक्टरों के खिलाफ जल्दबाज़ी में रिपोर्ट लिखा दी है.

बहरहाल ताज़ा हालात यह है कि सितंबर के पहले ही हफ्ते में बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बीते 48 घंटे के दौरान 24 और बच्चों की मौत का मामला सामने आया है. मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. पीके सिंह के मुताबिक अलग-अलग वार्डों में तीन सितंबर को नौ बच्चों की मौत हुई जबकि चार सितंबर को 15 बच्चों की मौत की गोद में सो गए. इसके साथ ही इस मेडिकल कालेज में इस साल मरने वाले बच्चों की संख्या 1341 हो गई है.

दरअसल उत्तर प्रदेश में बच्चों की मौत का ये तांडव कोई नई सरकार की वजह से नहीं हो रहा है. ये प्रदेश में लगातर खस्ताहाल होती जा रही सरकार स्वास्थ्य सेवाओं का नतीजा है. पिछली सरकारों ने प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और उनके विकार पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया. नई सरकार की प्राथमिकता सूची से भी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का एजेंडा गायब है. 15 साल बाद सत्ता में लौटी भाजपा सरकार के पहले बजट में इन्हें सुधारने के लिए कोई योजना पेश नहीं की गई. कोई बड़ा ऐलान नहीं किया गया. पिछले साल के मुकाबले इसका बजट भी सिर्फ 9 फीसदी ही बढ़ाया गया.

20 करोड़ लोगों की संख्या के साथ उत्तर प्रदेश आबादी के हिसाब से ब्राजील देश के बराबर है. अर्थव्यवस्था की बात करें तो उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था कतर के बराबर है. जबकि कतर की आबादी उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर बिजनौर के बराबर है. करीब 24 लाख. यहां प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) केन्या के लोगों की तरह है. और इस राज्य का शिशु मृत्यु दर गरीबी से त्रस्त एक पश्चिम अफ्रीकी गाम्बिया के बाराबर है. प्रदेश के 75 जिलों में 814 ब्लॉक और 97607 गांव हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2016 के अध्यन के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में आधे से ज्यादा डॉक्टर हैं. यह अनुपात देश भर में सबसे अधिक है. अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की पर्याप्त संख्या नहीं होने का एक नतीजा है. उत्तर प्रदेश में, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संख्या भी सबसे कम है. यह संख्या करीब 19.9 फीसदी है, जबकि भारतीय औसत 38 फीसदी है.

नर्सों की संख्या के हिसाब से रैंकिग देखें तो देश में नीचे से 30 जिलों में से ज्यादातर जिले इसी राज्य के हैं. राज्य मे देश की 16.16 फीसदी आबादी रहती है, लेकिव समग्र स्वास्थ्य कार्यकर्ता 10.81 फीसदी हैं.

उत्तर प्रदेश के अस्पतालों पर सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़े बेहद निराशाजनक हैं. ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी-216 के अनुसार, उत्तर प्रदेश के सीएचसी में 84 फीसदी विशेषज्ञों की कमी है. यदि पीएचसी और सीएचसी, दोनों को एक साथ लिया जाए तो उनकी जरुरतों की तुलना में मात्र पचास फीसदी स्टाफ हैं. दिसंबर 2016 में जारी किए गए, 2015 के लिए नवीनतम नमूना पंजीकरण प्रणाली बुलेटिन के अनुसार, 36 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में, शिशु मृत्यु दर यानि प्रति 1000 जन्म लेने वाले बच्चों में होने वाली मौत के मामले में उत्तर प्रदेश बाकी राज्यों में नीचे से तीसरे स्थान पर है. कई गरीब राज्य उत्तर प्रदेश की तुलना में काफी बेहतर हैं.

उत्तर प्रदेश में पूर्वी राज्य खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जिला गोरखपुर इन्सेफेलाइटिस से सबसे ज्यादा प्रभावित है. देश भर में दर्ज हुए जापानी इन्सेफेलाइटिस (जेई) मामलों में से 75 फीसदी से ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में पाए गए हैं. वर्ष 2016 में, देश भर में 1277 एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) मौतों की सूचना मिली थी, जिसमें से 615 मामले उत्तर प्रदेश से थे. इसी तरह देश भर में दर्ज हुई 275 जेई मौतों में से 73 मामले उत्तर प्रदेश से थे. यहां तक पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में, जहां हर साल जेई और एईएस से कई लोगों की जान जाती हैं, फिर भी ऐसी मौतें कभी चुनावी मुद्दा नहीं बनती हैं. अब जरूर इन पर राजनीति हो रही है.

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 71वें दौर के आंकड़ों के आधार पर ‘ब्रूकिंग्स इंडिया’ नाम की एक संस्था ने अध्यन किया तो यूपी के बद से बदतर होते हालात सामने आए. इसके मुताबिक उत्तर प्रदेश प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य पर हर साल मात्र 488 ही रुपये खर्च करता है. ये आंकड़े केवल बिहार और झारखंड से ज्यादा हैं. हिमाचल सरकार प्रति व्यक्ति 1830 रुपये खर्च करती है. इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश का खर्च केवल 26 फीसदी है. उत्तर प्रदेश के 20 करोड़ लोगों का स्वास्थ्य बीमा अभी सिर्फ 4 फीसदी तक ही पहुंचा है. इस मामले में अखिल भारतीय औसत 15 फीसदी है.

देश के दूसरे राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश के सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का स्तर भी बहुत खराब है. यहां के ज्यादातर लोग अपने इलाज के लिए निजी अस्पतालों पर निर्भर हैं. क्योंकि यहां राज्य सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर बहुत कम खर्च करती है. निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में निजी अस्पतालों का दबदबा है. प्रदेश के अलग-अलग अस्पतालों में बच्चों की लगातार हो रही मौत यूपी में बरसों से ख़स्ताहाल स्वास्थ्य सेवाओं का नतीजा है. इस पर राजनीति करन से से कोई फायदा नहीं है. योगी सरकार को चाहिए कि वो पिछली सरकारों की गलतियां दोहराने के बजाय प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और उनके विकास की समग्र नीति बनाकर उसे अमली जमा पहनाए.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)
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