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Opinion: चुनाव से पहले बिहार में 75% आरक्षण का लालू-नीतीश ने खेला दांव, लेकिन कोर्ट में हो सकता है बड़ा खेला

बिहार में पहले जातिगत-सर्वेक्षण हुआ और फिर सरकार ने आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 75 फीसदी तक कर दी. यह फैसला विधानसभा और कैबिनेट में पारित हो चुका है. हालांकि, एक सवाल यह उठ रहा है कि कानूनी तौर पर यह कितना मजबूत फैसला है और कोर्ट में कितनी देर तक टिका रहेगा...सुप्रीम कोर्ट ने जो 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तय की है, उसको असाधारण परिस्थितियों में ही बढ़ाने की बात कही है. बिहार में यह फैसला किस करवट बैठेगा, यह देखने की बात होगी. 

यह एक राजनीतिक फैसला

बिहार में जो 75 फीसदी तक आरक्षण की सीमा करने का फैसला आया है, वह एक राजनैतिक निर्णय है, क्योंकि आरक्षण की जो नीति है, वह पार्टियों का ऐसा फैसला है, जिससे उन्हें वोट आकर्षित करने में सहायता मिलती है. इस प्रकार के जो निर्णय हैं, वे राजनीतिक ही होते हैं. जो नीति हमारे संविधान में दी गयी है, वह आर्थिक और सांस्कृतिक तौर पर पिछड़ों को आगे लाने की रही है. जब उसका राजनीतिकरण किया गया तो आरक्षण की नीति हरेक 20 साल, 10 साल में आती रही है, उस पर चर्चा होती रही है. हमारे संविधान में तो 10 साल के लिए आरक्षण की व्यवस्था थी.

अगर कोई दल 10 साल से अधिक तक आरक्षण लाना चाहता है, तो उसको बढ़ा सकता था. अब तो यह ऐसा टूल हो गया है, जो लोग वोट पाने के लिए करते हैं. कभी कास्ट-सेंसस के नाम से तो कभी किसी और नाम से. अभी ही जो रिजर्वेशन है, उसी में तो लोग भरते नहीं हैं, उसी में तो जिन लोगों को आना चाहिए था, वही गरीब लोग आते नहीं हैं, तो इस प्रकार के एक्शन से पिछड़ों-वंचितों को कोई फायदा उठेगा. सरकारी नौकरी तो है नहीं. आप नयी-नयी बातें कर रहे हैं, तो मुझे लगता है कि चुनावी समय है तो यह एक चुनावी बात है, बस. 

कानूनी तौर पर गिरेगा फैसला

जहां तक कानूनी पेंच का सवाल है तो जब मंडल कमीशन को 1992 में चुनौती दी गयी, और उस समय जो सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, जब 27 फीसदी आरक्षण ओबीसी को चुनौती दी गयी, उसे वैलिडेट किया गया था तो उस समय एक कैप बांध दी गयी थी कि असाधारण समय में ही इसको बढ़ाया जा सकता है. 50 फीसदी की जो सीमा थी, उसे आर्थिक आरक्षण के तौर पर तोड़ा गया और अब आरक्षण 60 फीसदी हो गया है. झारखंड सरकार ने भी बिल लाकर इसको बढ़ाया है. आर्टिकल 15 और 16 के संबंध में ये 50 फीसदी का कैप था और अगर इसे बढ़ाया जाएगा तो असाधारण मामलों में बढ़ाया जाएगा. कोर्ट में जब यह मामला जाएगा, तो इसकी वैधानिकता देखी जाएगी. हाल ही में तमिलनाडु में स्पेशल रिजर्वेशन दिया गया था, जो वेन्नियार समुदाय को 27 फीसदी के अंतर्गत ही 15 फीसदी आरक्षण की बात करता था. मद्रास हाईकोर्ट ने उसको बंद कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने यह बताया है कि केवल जाति ही एक फैक्टर नहीं है, जिस पर आप रिजर्वेशन दे दीजिए. उनके लिए शैक्षणिक, सांस्कृतिक, आर्थिक कई तरह के मसले देखे जाएंगे. हाल ही में 2021 में तमिलनाडु में स्पेशल रिजर्वेशन एक्ट को रद्द कर दिया गया, जो वेन्नियार कास्ट के लिए था. आप जाति के आधार पर इस तरह की व्यवस्था नहीं कर सकते. तो, प्राथमिक तौर पर तो यही लगता है कि यह कानूनी तौर पर टिक नहीं पाएगा. यह तो एक राजनीतिक फैसला है. यह सामाजिक उद्देश्यों को पूरा नहीं करता है. कानूनी निर्णय निश्चित तौर पर इस राजनीतिक व्यवस्था पर भारी पड़ेगा, क्योंकि इसका कोई आधार नहीं है. यह तार्किक नहीं है. धीरे-धीरे तो आप इसे 100 फीसदी कर देंगे, लेकिन यह तार्किक नहीं है, यह केवल वोट लेने के लिए किया गया है. 

सुप्रीम कोर्ट का रिजर्वेशन पर सीधा फैसला

अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्वेशन के जितने मामले सुप्रीम कोर्ट के पास आए हैं, उन्होंने यह ओपिनियन दिया है कि आप सेपरेट ग्रुप के आधार पर यह नहीं कर सकते, आपको ऑब्जेक्टिव क्राइटेरिया अपनाना पड़ेगा. आप वोट के लिए इस तरह से नहीं कर सकते. अगर आप लोगों के लिए कंसर्न्ड हैं, तो आप बढ़ा सकते हैं. हालांकि, अगर वह ऑब्जेक्टिव नहीं है, तो उसे शट डाउन कर दिया जाएगा. आप मराठा आरक्षण देखिए. संविधान अगर किसी भी रिजर्वेशन पॉलिसी की बात करता है, तो वह 10 साल के लिए बात करता है, वह कहता है कि मूलतः 10 साल के बाद इसे इरैडिकेट करना पड़ेगा. डेमोक्रेसी में आप इसे पॉलिटिकली लागू नहीं कर सकते.

हमें तो इसको डेमोक्रेटिकली देखने की जरूरत है. अगर किसी व्यक्ति में योग्यता है और उसको पीछे कर दिया जाता है, तो वह गलत है. यह फैसला आगे टिक नहीं पाएगा, क्योंकि यह राजनीतिक फैसला है. सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी पर जो कैप लगाया है, उसमें एक ही विंडो है कि असाधारण परिस्थितियों में उसको हटाया जा सकता है. असाधारण परिस्थितियों को क्या बिहार सरकार का यह फैसला पारिभाषित करता है, यह तो अब सुप्रीम कोर्ट ही देखेगा. हालांकि, अगर 1992 का फैसला देखें, इंदिरा सैनी का फैसला देखें तो यह कदम कहीं से रेशनल नहीं कहा जा सकता है. केवल उसके नंबर ज्यादा हैं, इसलिए यह रिजर्वेशन दिया जा रहा है. न तो बैकवर्डनेस या न ही बाकी किसी मसलें पर यह खरा उतरेगा, यह केवल राजनीतिक फैसला है और इसी वजह से इसको सुप्रीम कोर्ट में मुंह की खानी पड़ेगी. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]

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