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सूडान संकट का दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर, भारतीयों को निकालने की कोशिश जारी

सूडान में सेना और अर्धसैनिक बल के बीच चल रहे गृहयुद्ध के चलते वहां हालात बद से बदतर हैं. ऐसे में वहां फंसे भारतीयों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिक्र जताई है और वहां से उनकी जल्द से जल्द निकासी के लिए संबंधित अधिकारियों को कहा है. अफ्रीकी देश सूडान में फंसे भारतीय नागरिकों को वापस लाने के लिए सरकार ऑपरेशन कावेरी (Operation Kaveri) चला रही है, जिसके तहत 500 भारतीय पोर्ट सूडान पहुंच गए हैं.

ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिरकार सूडान में क्या संकट है. कैसे वहां से भारतीय नागरिकों को निकाला जाए. सूडान में पावर स्ट्रगल चल रहा है. सूडान संकट वहां के दो जनरल के बीच में शक्ति का प्रदर्शन है. वहां के जो आर्मी चीफ हैं, उनका नाम है फताल बुरहान और दूसरे वहां के पैरा मिलिट्री फोर्सेज के कमांडर हैं मोहम्मद हमदान डागलो. ताजा संकट जो उत्पन्न हुआ है वो इन दोनों के बीच की लड़ाई की वजह से हुई है और इसके बहुत ही गंभीर इम्पलिकेशन हैं.

ये संकट न सिर्फ सूडान के लिए बल्कि उसके पड़ोसी मुल्कों और सूडान के साथ जिन देशों के संबंध जैसे यूएई, भारत, ब्रिटेन और भी कई देशों के लिए बेहद गंभीर मसला है. सूडान की जो स्ट्रेटेजिक लोकेशन है वो रेड सी (लाल सागर) के पास की है और ब्लू नाइल का पूरा एरिया उससे लगता है. उसके जो पड़ोसी मुल्क हैं जैसे लीबिया, चाड, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, इरिट्रिया और दक्षिण सूडान इन देशों में भी इसका गहरा प्रभाव हो रहा है. अगर हम इथोपिया की बात करें तो वहां पर ओमोरो और अमारा ग्रुप्स हैं इन दोनों के बीच भी काफी डेडली फाइट हुआ है. इस संकट में 500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. जो भी रिफ्यूजी हैं वो साउथ सूडान और चाड में इंटर कर रहे हैं और मरने वालों के जो औपचारिक आंकड़ें हैं वो और भी ज्यादा हो सकते हैं. इसका भी डायरेक्ट इम्प्लीकेशन है क्योंकि साउथ सूडान भी पहले संकटग्रस्त सूडान का ही हिस्सा हुआ करता था.

इसमें फॉरेन एक्टर्स भी इन्वॉल्व हैं. यूएई के आर्मी चीफ जो हैं वो सूडान के पैरा मिलिट्री फोर्सेज के कमांडर मोहम्मद हमदान डागलो को सपोर्ट करते हैं और सूडान के जो आर्मी चीफ हैं फताल बुरहान उनको रूस सपोर्ट करता है. फताल के आने के बाद रसिया ने एक डील ब्रेक की थी जिसके तहत उसने वहां अपना एक नेवल बेस भी तैयार किया है. ऐसे में रसिया का उनको पूरा समर्थन मिल रहा है और वो कभी नहीं चाहेगा की फताल इस लड़ाई में हार जाएं. मिडिल ईस्टर्न देशों का भी इसमें काफी रोल है. क्योंकि सूडान में गोल्ड माइंस और कृषि का भी वो एक बहुत बड़ा हब है. इसमें यूएई का भी बहुत बड़ा निवेश है. रसिया के कुछ सीक्रेट ग्रुप्स हैं, उनका भी वहां पर काफी इंवेस्टमेंट है. इस तरीके से यह केवल सूडान की क्राइसिस नहीं है बल्कि पूरे रीजन को यह प्रभावित करेगी.

जहां तह भारत का संबंध की बात है तो ये ऐतिहासिक भी है. चूंकि एक बार जब गांधी जी लंदन जा रहे थे तब वहां उन्होंने स्टे किया था. सूडान में जो भारतीय नागरिक हैं उनमें गुजराती कम्यूनिटी सबसे पहले गई थी बिजनेस के लिए. वहां पर तकरीबन 1600 भारतीय हैं जोकि वेल सेटल्ड हैं और इनमें से अधिकतर बिजनेस क्लास के ही लोग हैं. अफ्रीका के किसी भी देश में जब इस तरह की क्राइसिस होती है वहां पर लूट और मार काट की घटनाएं बढ़ जाती हैं. ऐसे में किसी भी देश के नागरिक फिर वहां सुरक्षित नहीं रह जाते हैं. भारत की दृष्टि से देखें तो सूडान से जब साउथ सूडान अलग हुआ था उसमें भारत का बहुत बड़ा और अहम योगदान था. इसमें 75 % तेल के खदान साउथ सूडान के पास हैं और बाकी 25 % रिजर्व सूडान के पास हैं.

भारत का संबंध दोनों से ही अच्छा है क्योंकि दोनों ही के लिए भारत अच्छा और मित्रवत देश रहा है. चूंकि जब हरदीप पुरी यूएन में भारत के प्रतिनिधित्व करते थे तब उन्होंने साउथ सूडान को अलग करने में काफी मदद की थी और वहां पर स्थिरता को स्थापित करने में भी उनकी भूमिका रही थी. हामिद अंसारी वहां के स्वतंत्रता दिवस पर चीफ गेस्ट के तौर पर भी गए थे, जब वे उप-राष्ट्रपति थे. इसलिए भारत के साथ सूडान का बहुत ही गहरा संबंध रहा है. खासतौर पर कृषि के क्षेत्र में, फार्मास्यूटिकल के क्षेत्र में जो भारतीय कंपनियां हैं उनकी भी वहां पर उपस्थिति है. चूंकि अभी संकट है और अगर यह और ज्यादा फैलता है तो जो जिबूती पोर्ट में अमेरिका और मिडिल ईस्टर्न कंट्री का भी बेस है तो ऐसे में गंभीर संकट उत्पन्न होने के खतरे और बढ़ जाते हैं. मुझे लगता है कि यह सिविल वॉर तुरंत से रुकने वाली नहीं है. चूंकि ये दोनों ही जनरल विदेशी ताकतों से समर्थन ले रहे हैं. इसमें कुछ अरब के देश और इजराइल भी शामिल है.

ऐसे में यह बहुत जल्दी रुकने वाली नहीं है. इससे अफ्रीका के नॉर्थ ईस्ट के जो देश हैं वो भी पूरे तरह से प्रभावित होंगे. क्योंकि सूडान का जो रोल है वो बहुत ही अहम रोल है. वह मिलिट्री के तौर पर इजिप्ट का भी दोस्त है. इजिप्ट और सूडान दोनों ही इथोपिया के विरुद्ध हैं. चूंकि इथोपिया में जो ग्रेट डैम बन रहा है उसमें ब्लू नाइल नदी में हिस्सेदारी को लेकर पहले से ही तनाव है. ये लड़ाई वहां पर माहौल खराब करेगा. इससे जो ऑयल सेक्टर है, कोल सेक्टर है, फॉरेन इन्वेस्टमेंट है इन सब पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा. इसके अलावा आतंकवाद भी बढ़ेगा. कुल मिलाकर वर्ल्ड इकॉनोमी पर इसका बहुत ही गहरा प्रभाव पडे़गा. जहां तक सूडान से भारतीय नागरिकों को निकालने का सवाल है इसके लिए हमारे यहां से नेवल शिप सूडान के पड़ोसी देशों में भेजे जा चुके हैं. ये एक चैलेंज भी है और ये सिर्फ भारत के लिए नहीं और भी देशों के लिए है. क्योंकि वहां पर जब तक ग्राउंड लेवल पर थोड़ी सी स्थिरता नहीं होगी, हिंसा कम नहीं होगी तब उन्हें वहां से निकाल पाना आसान नहीं होगा. वहां से नागरिकों को निकालने के लिए यूएन में भी बातचीत हुई है कि विभिन्न देशों के के नागरिक जो वहां फंसे हैं उन्हें, कैसे बाहर निकाला जाए.

भारत में भी इस पर राजनीतिक तौर पर बात होनी शुरु हो गई है कि कैसे भारतीय नागरिकों को वहां से सुरक्षित तरीके से निकाला जाए. कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया उन्होंने भी स्टेटमेंट दिया है कि भारत सरकार को इसके लिए आगे आना चाहिए. हालांकि हम किस तरीके से अपने नागरिकों को वहां से बाहर निकालेंगे इसकी योजना अभी एक्सपोज नहीं की जानी चाहिए. भारत सरकार ने भी एक एडवाइजरी जारी की है जिसमें नागरिकों से यह कहा गया है कि वे अपने निवास स्थान से बाहर नहीं निकलें चूंकि वहां पर ऑन ग्राउंड सिचुएशन सही नहीं है. भारत हमेशा की तरह जहां पर भी संकट रहा है वहां से अपने नागरिकों को गंभीरतापूर्वक बाहर निकाला है. भारत सरकार इस प्लान पर काम कर रही है लेकिन इसे राजनीतिक तौर पर जगजाहिर नहीं किया जाना चाहिए. ये डिप्लोमैटिक तरीके से ही हो सकता है.

(ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है)

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