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आदिवासी नरसंहार- सोनभद्र की हिंसक पटकथा का अंत कोई नहीं जानता!

सोनभद्र इलाके का नाम सुनने में तो बड़ा प्रभावशाली, संपन्न और शक्तिशाली लगता है लेकिन हकीकत यह है कि यह यूपी के ही नहीं बल्कि देश के सबसे पिछड़े जिलों में गिना जाता है और सूबे का तो यह सर्वाधिक आदिवासी आबादी वाला जिला है.

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां हैं- 'जब तक मनुज-मनुज का यह/ सुख भाग नहीं सम होगा/शमित न होगा कोलाहल/ संघर्ष नहीं कम होगा.'

लेकिन बीते बुधवार यानी 17 जुलाई, 2019 को हमारे महान भारत देश ने देखा कि देश की ऊर्जा राजधानी कहे जाने वाले सोनभद्र जिले (यूपी) में चार-चार बार अपनी जमीन से विस्थापित हो चुके दर्जन भर निहत्थे आदिवासियों को भू-माफिया दबंगों ने फिल्मी स्टाइल में गोलियों से भून डाला, गड़ासों से काट डाला और वे चीत्कार भी नहीं कर सके! हालांकि इस नरसंहार के बहाने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी, टीएमसी, बसपा और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने सियासी संघर्ष अवश्य तेज कर दिया है. आदिवासियों का हितैषी दिखने की होड़ में मचे भयंकर कोलाहल के चलते राज्यसभा और यूपी की विधानसभा स्थगित करनी पड़ी. सोनभद्र जाते हुए प्रियंका गांधी की गिरफ्तारी और प्रदेश भर में मचे बवाल के बाद योगी सरकार ने पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया है. मामला इतना नाजुक हो चला है कि वाराणसी की सीमा से मिर्जापुर में प्रवेश करते ही हर पार्टी के नेताओं को रोका जा रहा है.

सोनभद्र इलाके का नाम सुनने में तो बड़ा प्रभावशाली, संपन्न और शक्तिशाली लगता है लेकिन हकीकत यह है कि यह यूपी के ही नहीं बल्कि देश के सबसे पिछड़े जिलों में गिना जाता है और सूबे का तो यह सर्वाधिक आदिवासी आबादी वाला जिला है. जिले की दो विधानसभा सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं लेकिन यहीं पर मूल निवासी सुरक्षित नहीं हैं. पूरे जिले में आदिवासियों की जमीनें छीनी जा रही हैं और विरोध करने पर उन्हें मारा जा रहा है. हालात यह हैं कि बीते दस सालों के दौरान सोनभद्र में कई कंपनियां और उद्योग समूह विराट भूस्वामी बन चुके हैं, उनकी फैक्ट्रियों और खानों से उड़ने वाले धुआं-धक्कड़ ने पूरे वन-प्रांत को नरक बना दिया है और दस-दस रुपए में लकड़ियों के गट्ठर बेचने वाले मूल निवासी वहां से लगातार बेदखल किए जा रहे हैं.

समूचा सोनभद्र सन 1996 से लेकर 2012 तक नक्सल आंदोलन से जूझता रहा था. इसके पीछे जल-जंगल-जमीन से दलितों-आदिवासियों व गरीबों की बेदखली प्रमुख कारण रहा. लेकिन जब नक्सलवाद अपने चरम पर था, तब भी इस तरह का जघन्यतम नरसंहार नहीं हुआ था. यह नरसंहार किसी बड़ी साजिश की तरफ इशारा करता है. समूचे जनपद में व्यापक स्तर पर जमीनों की हेराफेरी करके लोगों को लाभ पहुंचाया जाता है, जिसमें बाहुबली से लेकर मंत्री-संत्री सब शामिल होते हैं. सोनभद्र में जो जमीन कभी कौड़ियों के दाम मिलती थी, आज सोना हो चुकी है. इसीलिए इस अंचल में नेताओं और अधिकारियों की संवेदनाएं आदिवासियों के लिए नहीं, बल्कि अवैध खनन-परिवहन और जमीनों पर कब्जे के लिए उमड़ती हैं. राजस्व विभाग ने सर्वे सेटलमेंट के नाम पर करीब डेढ़ लाख हेक्टेयर सरकारी-गैर सरकारी जमीन पर सफेदपोशों और राजनीतिक रुतबा रखने वालों से कब्जा करा दिया है. सोचने की बात है कि अगर सरकारी नुमाइंदों और पुलिस प्रशासन की मिलीभगत न होती तो क्या इतनी बड़ी संख्या में दिनदहाड़े हमलावरों के ट्रक और ट्रैक्टर जैसे बड़े वाहन सड़कों पर धूल उड़ाते हुए आदिवासियों के खेतों तक पहुंच जाते और पुलिस को कानोंकान खबर भी न होती!

वैसे तो सोनभद्र ऊर्जा राजधानी होने के बावजूद जिले के अंधेरे में डूबे होने के लिए कुख्यात है लेकिन यहां का मूल मसला आदिवासियों की पीढ़ियों से कब्जे वाली जमीन का विवाद न सुलझ पाना ही रहा है. आज से 40 साल पहले गांधीवादी समाजसेवी प्रेमभाई ने सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई पीएन भगवती को मात्र एक पोस्टकार्ड भेजकर आदिवासियों को भूमि अधिकार बहाल करने का अनुरोध किया था. सीजेआई ने पोस्टकार्ड को ही जनहित याचिका मानकर सोनभद्र में सर्वे सेटलमेंट का आदेश दे दिया. लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि इसका लाभ आदिवासियों को पीछे छोड़कर बाहुबलियों, उद्योगपतियों और सामंतों ने उठा लिया. दशकों बाद वनाधिकार कानून से आदिवासियों को अपनी भूमि पर काबिज की उम्मीद जागी थी, लेकिन देखने में आया कि वन विभाग इसे लागू ही नहीं करना चाहता. इस आदिवासी बाहुल्य जनपद में सदियों से आदिवासियों के जोत-कोड़ को तमाम नियमों के आधार पर नजरअंदाज किया जाता रहा है. तमाम सर्वे के बावजूद अधिकारियों की संवेदनहीनता उन्हें भूमिहीन बनाती रही है.

उम्भा गांव के खूनी संघर्ष से बिहार के रहने वाले बंगाल काडर के पूर्व आईएएस अधिकारी प्रभात कुमार मिश्रा के तार जुड़ रहे हैं. उसने तत्कालीन ग्राम प्रधान की मिलीभगत से गांव की करीब 600 बीघा जमीन अपने नाम कराने का प्रयास शुरू कर दिया था. आईएएस की बेटी इस जमीन पर हर्बल खेती करवाना चाहती थी. लेकिन जमीन पर कब्जा न मिल पाने की वजह से उसका प्लान फेल हो गया. ऐसे में आईएएस ने इसी में से करीब 200 बीघा जमीन 17 अक्टूबर 2010 को आरोपी यज्ञदत्त भूरिया और उसके रिश्तेदारों के नाम औने-पौने दामों बेच दी. पिछले 70 वर्ष से अधिक समय से खेत जोत रहे गोंड़ जनजाति के लोग प्रशासन से गुहार लगाते रहे लेकिन उन्हें उनकी जमीन पर अधिकार नहीं दिया गया. आखिरकार भूरिया ने उन्हें बेदखल करने के लिए यह नरसंहार करा दिया!

प्राकृतिक सौंदर्य और खनिज संपदा से संपन्न सोनभद्र को कभी प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने स्विट्जरलैंड ऑफ इंडिया कहा था. योगी सरकार भी इस आशय के पोस्टर छपवाती है. लेकिन अब यह वनांचल अपनी गरीबी पर खून के आंसू रोता एक धूल-धूसरित भूखंड बन कर रह गया है. अब यहां वन्य जीव नहीं, दैत्याकार मशीनें दहाड़ती हैं. यहां की मिट्टी जरूर लाल है, लेकिन इस पर अधिक से अधिक कब्जा करने के लिए इसे अब आदिवासियों के खून से और गाढ़ा लाल किया जा रहा है. देश भर के आदिवासियों से जल-जंगल-जमीन छीन कर पूंजीपतियों के हाथों में सौंपने की यह नए ट्विस्ट वाली हिंसक पटकथा है. इस नरसंहार में सेंट्रल या स्टेट की फोर्स इनवॉल्व नहीं है, लेकिन उद्देश्य एकसमान है. यूपी से लेकर एमपी, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना समेत कई अन्य राज्यों में इस पटकथा की ‘शूटिंग’ चल रही है. दुखद यह है कि इसका अंत कोई नहीं जानता.

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(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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