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क्या शाहनवाज हुसैन के जरिए नीतीश कुमार पर दवाब बनाने की तैयारी में है बीजेपी?

ऐसी खबर है कि शाहनवाज़ नीतीश सरकार में मंत्री बनेंगे और गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी निभा सकते हैं.

शाहनवाज़ हुसैन के करियर को लेकर साल 2019 में काफी कुछ अटकलें लगाई गई. लेकिन कहते हैं ना कि किस्मत से अधिक और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता सो केंद्र में सात साल की सत्ता के बाद शाहनवाज़ की किस्मत खुलने जा रही है. शाहनवाज़ को बिहार विधान परिषद का उम्मीदवार बनाया गया है. सोमवार को उनका नामांकन होगा. साल 2024 तक का उनका कार्यकाल होगा. शाहनवाज़ को सुशील मोदी की खाली हुई विधान परिषद की सीट से पटना भेजा जा रहा है. सुशील मोदी राज्यसभा के जरिए पटना से दिल्ली आ चुके हैं. ये महज एक संयोग ही कहिए कि 15 साल पहले सुशील मोदी के दिल्ली से पटना लौटने पर शाहनवाज़ को सुशील मोदी की सीट से ही दिल्ली आने का मौका मिला था.

साल 2004 में सुशील मोदी भागलपुर से सांसद बने थे. 2005 में बिहार में जेडीयू बीजेपी सत्ता में आई तो सुशील मोदी ने इस्तीफा दिया और विधान परिषद के रास्ते सदन में जाकर उप मुख्यमंत्री बने. साल 2004 के चुनाव में शाहनवाज़ किशनगंज से लोकसभा हार गए थे. 2006 के उप चुनाव में उन्हें भागलपुर से मौका मिला और जीतकर दूसरी बार सांसद बने. शाहनवाज़ 2009 में भी भागलपुर से जीते थे. लेकिन 2014 में हार गए और 2019 में टिकट नहीं मिला.

2014 की हार के बाद से ही मुख्यधारा से साइड चल रहे थे. पार्टी में प्रवक्ता थे लेकिन कोई बड़ी भूमिका नहीं मिली थी. पिछले साल के अंत में जम्मू कश्मीर के चुनाव में घाटी में सक्रिय थे. जहां डीडीसी चुनाव में बीजेपी को तीन सीट मिली. अभी बंगाल में भी शाहनवाज़ सक्रिय हैं. लेकिन बिहार में जहां बीजेपी एनडीए में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी अनुभव के पैमाने पर कमजोर है वहां शाहनवाज़ की भूमिका अहम मानी जा रही है. ऐसी खबर है कि शाहनवाज़ नीतीश सरकार में मंत्री बनेंगे और गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी निभा सकते हैं.

शाहनवाज़ और नीतीश कुमार दोनों अटल सरकार में मंत्री रह चुके हैं. नीतीश रेल चला रहे थे तब शाहनवाज़ को प्लेन उड़ाने की जिम्मेदारी मिली थी. गया एयरपोर्ट का विकास शाहनवाज़ के समय हुआ था. शाहनवाज के नाम देश के सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री होने का रिकॉर्ड है. वे अभी 52 को पार कर गए हैं लेकिन 1999 में महज 31 साल की उम्र में वो मंत्री बने थे. उस चुनाव में वो किशनगंज से जीते थे. जिंदगी का पहला चुनाव वो 1998 में किशनगंज से ही हार गए थे.

भारतीय जनता युवा मोर्चा के जरिए वो राजनीति में सक्रिय हुए थे. सुपौल में जन्म भले हुआ लेकिन राजनीति का ककहरा उन्होंने मुजफ्फरपुर में सीखा. अब तक प्रदेश की राजनीति में कभी नहीं रहे. ये तो तय है कि शाहनवाज़ के जरिए बीजेपी नीतीश पर दबाव बनाएगी. दोनों साथ काम कर चुके हैं. शाहनवाज़ के पास बाकी मौजूदा मंत्रियों से ज्यादा का प्रशासनिक अनुभव है. इस बार एनडीए से कोई मुस्लिम चुनाव नहीं जीता है, ऐसे में बीजेपी एक बड़ा संदेश भी देने की कोशिश करना चाह रही होगी.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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