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BLOG: चूंकि मूर्ति से वोट मिलते हैं

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति तोड़ी गयी. बंगाल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति पर कालिख पोती गयी. तमिलनाडु में ई एम रामासामी पेरियार की मूर्ति को खंडित किया गया. लेनिन साम्यवादी आंदोलन के जनक माने जाते हैं जिन्होंने रूस में बोल्शेविक क्रांति का सूत्रपात किया था. डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी और कश्मीर में एक झंडा एक संविधान की मांग करते हुए शहीद हुए थे. ई एम रामासामी तमिलनाडु में दलित राजनीति के जनक माने जाते हैं जिन्हें दलितों का मसीहा यानि पेरियार की उपाधि दी गयी. पेरियार ने दलितों के हकों को लेकर और सवर्ण जातियों के अत्याचार के खिलाफ बड़ा सामाजिक आंदोलन शुरु किया था जिसे अन्नादुरई ने राजनीतिक रूप दिया और डीएमके पार्टी बनाई. इसी पार्टी से करुणानिधि और एम जी रामचन्द्र जुड़े थे. दोनों ने तमिल फिल्मों के सहारे दलित आंदोलन को धार दी थी.

कुल मिलाकर लेनिन वाम मोर्चे की विचारधार के करीब हैं. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बीजेपी और संघ की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं. पेरियार दलित आंदोलन और दलित अस्मिता के प्रेरक रहे हैं. इन तीनों का अपना-अपना सामाजिक और राजनीतिक महत्व है. वाम दलों के लिए लेनिन का जो महत्व है वही बीजेपी के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी का है. लेकिन हम कह सकते हैं पेरियार का महत्व एआईडीएमके और डीएमके तक या फिर तमिलनाडु तक सीमित नहीं है. पेरियार पूरे देश की दलित राजनीति को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं.

इस बात को बीजेपी से ज्यादा कोई और दल मसहूस नहीं कर सकता. बीजेपी तो हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला से लेकर गुजरात के उना दलित कांड को भुगत चुकी है. वह जानती है कि पेरियार की मूर्ति के साथ तोड़फोड़ उसे कितना सियासी नुकसान पहुंचा सकती है. तात्कालिक नुकसान तो यूपी में फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में हो सकता है जहां दलित वोटर अच्छे खासे हैं. तमिलनाडु की राजनीति में पैर जमाने के साथ साथ सत्तारुढ़ एआईडीएमके साथ राजनीतिक रिश्ता बनाने में रुकावट आ सकती है. सबसे बड़ी बात है कि राज्य के बीजेपी अध्यक्ष के ट्वीट से प्रेरणा लेकर स्थानीय बीजेपी नेता ने परियार की मूर्ति तोड़ने का काम किया. यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को तुरंत मूर्तितोड़ अभियान की निंदा करनी पड़ी.

बीजेपी ने मूर्ति तोड़ने वाले नेता का सीधे पार्टी से बर्खास्त कर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की है. त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति तोड़े जाने पर कुछ बीजेपी नेताओं ने इसके समर्थन में बयान दिये थे. कुछ ने तो लेनिन को आतंकवादी तक करार दिया था तो कुछ ने सवाल उठाया था कि आखिर विदेशी लेनिन की मूर्ति त्रिपुरा में लगाई ही क्यों गयी. तब न तो पीएम मोदी की तरफ से प्रतिक्रिया आई और न ही अमित शाह ने मूर्तियां तोड़े जाने के खिलाफ बयान दिया. लेकिन पेरियार की मूर्ति तोड़े जाने पर पार्टी बैकफुट पर आई है.

मायावती से लेकर अन्य विपक्षी दल बीजेपी को सवर्णों की पार्टी बताते हुए उसे दलित विरोधी बताते रहे हैं. गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले वहां के उना गांव में दलितों के साथ गोरक्षकों ने मारपीट की थी जिसे कांग्रेस समेत अन्य दलों ने बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की थी. मायवती से लेकर अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी उना गांव गये थे. दलित आंदोलन चला था जिससे निकले थे जिन्नेश मवाणी जो आज गुजरात विधानसभा में विधायक हैं. बीजेपी और संघ को अच्छी तरह इल्म है कि दोनों ने यूपी में मायावती और कांग्रेस के दलित वोट बैंक में कितनी मुश्किलों से सेंध लगाई थी और तीन सौ पार सीटें हासिल कर सरकार बनाई.

बीजेपी इस सियासी मुनाफा को आसानी से हाथ से जाने नहीं देना चाहती इसलिए वह तुरंत फुरंत में कार्रवाई कर रही है. उधर मायावती से लेकर कांग्रेस के नेता जानते हैं कि पेरियार की मूर्ति तमिलनाडू से हजारों किलोमीटर दूर यूपी बिहार की हिन्दी पट्टी तक में असर डाल सकने की गुंजाइश रखती है लिहाजा वह संसद नहीं चलने दे रहे हैं. भले ही दोनों दल दलितों को सिर्फ वोटबैंक के रूप में लेते रहे हों.

वैसे हिंदुस्तान में मूर्तियों को लेकर हमेशा से राजनीति होती रही है. कुछ साल पहले तक बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की मूर्तियां तोड़े जाने की खबरे आती रही थीं. वैसे हैरानी की बात है कि संविधान निर्माता बाबा साहब खुद मूर्तिपूजा के विरोधी रहे थे और उन्होंने संविधान सभा में एक बार बहस के दौरान कहा था कि भारत अभी भी भक्तिकाल में ही जी रहा है लेकिन उनके निधन के बाद उनकी मूर्तियां राजनीतिक इस्तेमाल करने का जरिया बनीं.

इसी तरह वाम दल भी यूं तो मूर्तिपूजा के विरोधी रहे हैं लेकिन जहां अपनी राजनीति चमकाने की बात आती है तो वहां लेनिन की मूर्तियां लगाने से नहीं चूकते हैं. महात्मा गांधी से लेकर नेहरु और फिर इंदिरा गांधी की मूर्तियों की भरमार हमारे देश में रही है. हालत तो यह है कि मायावती जब सत्ता में आई तो कांशीराम के साथ-साथ खुद की मूर्ति भी बनवा ली जबकि हमारे यहां जिंदा व्यक्ति की मूर्ति लगाना या उसके नाम पर किसी जगह का नामकरण करना गलत माना जाता रहा है. खुद की मूर्ति से लेकर अपने चुनाव चिन्ह हाथी की सैंकड़ों मूर्तियां मायावती के राज में लगाई गयीं. हालत यह थी कि मायावती के सत्ता में आते ही राजस्थान के भरतपुर के गुलाबी पत्थर के व्यापारी खुश हो जाया करते थे. साथ ही जयपुर के मूर्तिकार-कारीगर खुश हो जाया करते थे. ठीक ठाक काम मिल जाता था और पैसा भी.

सवाल उठता है कि आखिर नेताओं , महापुरूषों की मूर्तियां आखिर लगायी क्यों जाती है. इसलिए कि आम लोग चौराहे से गुजरते हुए उस महापुरुष को नमन करें, उनके दिखाए रास्ते पर चलने की कोशिश करें और प्रेरित हों . लेकिन ऐसा होता ही नहीं है. ऐसा होता होता तो कम से कम न तो मूर्तियां तोड़ी जा रही होतीं , न मुंह पर कालिख पोती जा रही होती और न ही सियासत हो रही होती.

आमतौर पर देखा गया है कि चौराहे पर खड़ी मूर्ति चिड़ियों की बीट का शिकार होती रहती हैं, आसपास भी कोई सफाई नहीं करता है. साल में एक बार मूर्ति का दिन आने पर जरूर सफाई हो जाती है. फूलमालाओं से लाद दिया जाता है लेकिन उसके कुछ दिन बाद सूखे हुये फूल ही गंदगी फैलाने लगते हैं.

हमारे देश में तो शहीदों की मूर्तियों को लेकर भी सियासत होती रही है. करगिल की लड़ाई में शहीद हुए सैनिकों के घरवाले उनकी याद में मूर्ति बनाते रहे हैं. राजस्थान में तो देखा गया कि मूर्ति की जगह को लेकर कभी राजनीति हुयी तो कभी मूर्ति के अनावरण में किसी बड़े नेता को बुलाने के नाम पर बीच के लोग पैसा खा गये. कुछ जगह विवादित जमीन पर मूर्ति लगवा कर आसपास की जमीन को वैध कर लिया गया तो कभी शहीद की विधवा का शहीद पैकेज का आधे से ज्यादा हिस्सा मूर्ति लगवाने में ही खर्च कर दिया गया.

कुछ समय पहले एक तस्वीर अखबारों में छपी थी. उसमें शहीद की विधवा अपने बच्चों के साथ शहीद की मूर्ति और आसपास से गंदगी को हटा रहे थे, झाड़ू लगा रहे थे. देश में शहीद की मूर्ति की सारसंभाल करने वाला भले ही कोई न हो लेकिन मूर्ति के तोड़ने पर मातम करने वाले हजारों मिल जाते हैं. यह किसी त्रासदी से कम नहीं है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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