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पीएम मोदी का सैनिकों के साथ ही दिवाली मनाने का आखिर क्या है राज़?

राजनीति,कूटनीति व अर्थशास्त्र के महान विद्वान आचार्य चाणक्य ने कहा था-" अगर कोई एक सफल शासक साबित होना चाहता है,तो उसे शास्त्रों के साथ-साथ शस्त्रों को भी उतना ही महत्व देना होगा." उस लिहाज़ से अगर देखें, तो देश के पंद्रहवे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब तक तो चाणक्य की उस कसौटी पर खरे ही साबित होते दिखते हैं. साल 2014 में देश की कमान संभालते ही उन्होंने बरसों पुरानी रवायत को तोड़ते हुए जब ये फ़ैसला लिया कि वे नयी दिल्ली के अपने सरकारी आवास पर या गुजरात के वडनगर में अपनी बुजुर्ग मां के साथ नहीं बल्कि हजारों किलोमीटर दूर ऊँची चोटियों पर देश की रक्षा का मोर्चा संभाल रहे जवानों के साथ सियाचिन में दिवाली मनाएंगे,तो उसे लेकर सियासी गलियारों से लेकर हमारे रक्षा-जगत में भी एक अजीब-से हड़कंप का माहौल बन गया था.

शायद इसलिए कि उससे पहले देश के किसी प्रधानमंत्री ने अपनी दिवाली मनाने का ऐसा अजीब-अनूठा फैसला लेने के बारे में सोचा भी नहीं था.आज फिर वे अपनी दिवाली कश्मीर के राजौरी सेक्टर के नौशेरा में भारत-पाकितान की बॉर्डर पर तैनात उन जांबाज़ सैनिकों के साथ मना रहे हैं,जो हमें हर रोज चैन से नींद लेने के लिए बेफिक्र करते हैं.

हालांकि पीएम मोदी की पृष्ठभूमि से वाकिफ लोगों को ये तो पता ही होगा कि सक्रिय व चुनावी राजनीति में आने से पहले वे आरएसएस के स्वयंसेवक और प्रचारक भी रहे हैं. संघ की समूची सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी विचारधारा का आधार ही शास्त्र व शस्त्र को समान रुप से महत्व देने पर रहा है. यही कारण है कि संघ दुनिया का एकमात्र ऐसा गैर राजनीतिक संगठत है,जहां विजयादशमी के अवसर पर पारंपरिक तरीके से शस्त्र-पूजा की जाती है.शास्त्र अगर हमें संयम से जीना सिखाते हैं,तो शस्त्र अपने दुश्मन के साथ पूरी ताकत से लड़ने की प्रेरणा देते हुए ये अहसास कराते हैं कि हम कमजोर नहीं हैं.

दरअसल, मोदी सैनिकों के साथ दिवाली मनाते हुए एक साथ कई संदेश देते आये हैं.पहला तो ये कि वे अपने अंतर्मन से खुद को आज भी फौज़ की वर्दी पहना देश की रक्षा में जुटा एक सैनिक ही समझते हैं.उसकी वजह भी है क्योंकि अपने छात्र-जीवन में वे एनसीसी के सर्वोत्तम कैडेट रहे हैं. गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने एक इंटरव्यू में अपने मन की बात करते हुए कहा भी था कि "अगर मैं संघ से नहीं जुड़ा होता, तो मैं सेना में ही जाता क्योंकि मेरी दिली इच्छा थी कि मैं फौज़ की वर्दी पहनकर राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दूं."

दिवाली जैसा महत्वपूर्ण त्योहार सैनिकों के साथ मनाकर वे अपने अतीत की दबी हुई इच्छा तो पूरी करते ही हैं लेकिन साथ ही वे हमारे जवानों का हौंसला बढ़ाते हुए उन्हें ये अहसास भी दिलाते हैं कि परिवार न सही लेकिन देश का मुखिया आपके साथ ये उत्सव मना रहा है, लिहाज़ा भूल जाइये कि आप अकेले हैं. जरा सोचिये कि प्रधानमंत्री को अपने बीच पाकर भला कौन-सा ऐसा सैनिक होगा जो खुश होने के साथ ही उनके साथ अपनी एक तस्वीर खिंचवाने में गर्व महसूस न करे.वही तस्वीर जब वो मोबाइल फोन के जरिये अपने परिवार को भेजता है,तो उस जवान का समूचा परिवार उस गांव,कस्बे या शहर के लोगों की निगाह में एक हीरो बन जाता है. पीएम मोदी के इस तरह से दिवाली मनाने को हम अपनी सेना का हीरोइज़्म करना भी कह सकते हैं जिसकी वो असली हकदार भी है. तीसरी बात कि बॉर्डर पर ऐसी दिवाली मनाते हुए मोदी हमारे पड़ोसी मुल्कों को भी एक सख्त संदेश देते हैं कि वे भारतीय सेना को कमजोर आंकने की भूल न करें. शायद ही कोई ये जानता होगा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने पिछली बार कब बॉर्डर पर आकर इस तरह से अपने सैनिकों के साथ ईद मनाई थी. या फिर चीन के राष्ट्रपति अपनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के सौ साल पूरा होने पर किस दिन बॉर्डर पर अपने सैनिकों के बीच आये थे.

साल 2014 में पीएम मोदी ने अपनी पहली दिवाली सियाचिन में मनाई थी.आगले साल वे पंजाब में भारतीय सेना के जवानों के बीच दीवाली मनाने पहुंच गए थे. तब उन्होंने 1965 युद्ध के वॉर मेमोरियल जाकर पाकिस्तान को संदेश दिया था. साल 2016 में मोदी हिमाचल प्रदेश के आर्मी और डोगरा स्काउट्स के जवानों के बीच पहुंचे थे.यहां पर पीएम और जवानों के बीच हुई मुलाकात ऐसी दिख रही थी मानों कोई पुराने दोस्त आपस में मिल रहे हैं. साल 2017 में भी पीएम मोदी ने जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा में BSF और सेना के जवानों के साथ दीवाली मनाई थी. तब भी उन्होंने पाकिस्तान को कड़ा संदेश दिया कि अगर आंतकवाद को पालोगे तो उसका अंजाम अच्छा नहीं होगा.अगले साल 2018 में मोदी ने उत्तराखंड के उत्तरकाशी में सेना और ITBP के जवानों के बीच जाकर दीवाली मनाई थी. तब उन्होंने अपने हाथों से मिठाई खिलाकर जवानों का हौसला बढ़ाया था.साल

2019 में मोदी ने कश्मीर के राजौरी में जवानों के साथ दीवाली अपनी मनाई और तब वे सेना की वर्दी में ही जवानों के बीच पहुंचे थे.पिछले साल उन्होंने जैसलमेर के लोंगेवाला पोस्‍ट जाकर जवानों के साथ वक्‍त बिताया.इस दौरान उन्‍होंने टैंक की सवारी की और जवानों मे मिठाइयां भी बांटी.पहले पोस्‍ट और फिर जैसलमेर एयरबेस पर मोदी ने देश के बहादुर जवानों को संबोधित किया था. तब उन्होंने सैनिकों से कहा था कि 'आपका यही जोश, यही जुनून देश को आश्वस्त करता है. आपकी ये हुंकार दुश्मन के पैरों में कंपकंपी पैदा कर देती है, माथे से पसीने छुड़ा देती है."

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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