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काल को भी मात देने वाले 'महाकाल' को अलौलिक रुप देने की है ये वैभव-गाथा !

PM Modi Inaugurates Mahakal Lok: पहले अवंतिका फिर उज्जयिनी यानी उत्कर्ष के साथ जयघोष करने वाली संसार की प्राचीनतम नगरी जो अब उज्जैन है, वहीं, वास करने वाले तीनों लोक के स्वामी और कालों के काल "महाकाल लोक" का लोकार्पण करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश-दुनिया के शिव भक्तों को ऐसी सौगात दी है, जिसे 'न भूतो, न भविष्यति' ही कहा जायेगा. काशी विश्वनाथ का कॉरिडोर बनाने के बाद महाकाल लोक का सौंदर्यीकरण करने की ये एक ऐसी वैभव-गाथा है, जो हमारी धार्मिक धरोहरों को सहेजने-संवारने और उसे नयी पीढ़ी से अवगत कराने का ऐसा यज्ञ है, जिसके बारे में पिछली सरकारों ने कभी सोचा तक नहीं था.

सब जानते हैं कि सीएम और पीएम बनने से बहुत पहले से ही संघ के एक मामूली प्रचारक रहते हुए ही मोदी शिव के ऐसे भक्त बन चुके थे कि उन्होंने साल 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए पूरे गुजरात को छोड़कर बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी को चुना, लेकिन मंगलवार को भगवान महाकाल की शरण में जाकर उन्हें जिस अलौकिकता का अहसास हुआ, उसका बखान उन्होंने हजारों लोगों के सामने करते हुए कह दिया कि "इसी महाकाल के आशीर्वाद से अवसान से पुनर्जीवन मिलता है. अंत से अनंत की यात्रा शुरु होती है.

अहम बात ये है कि मोदी सरकार जिस तरीके से हिंदू धार्मिक स्थलों का पुनर्निर्माण कर रही है, वह सिर्फ उस केंद्र का विकास नहीं है, बल्कि पूरे शहर के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करने का एक बड़ा जरिया भी बन रहा है. उज्जैन के महाकाल मंदिर में साल भर में औसतन डेढ़ करोड़ श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं लेकिन 'महाकाल लोक' का लोकार्पण होने के बाद स्थानीय प्रशासन को उम्मीद है कि ये संख्या दोगुनी हो जायेगी. 
इसीलिये आज इस शहर का हर बाशिंदा खुश है, फिर भले ही वो ऑटो वाला हो, पोहा-जलेबी-चाय-चाय बेचने वाला छोटा दुकानदार हो या फिर होटल-गेस्ट हाउस चलाने वाले संचालक हो. उन्हें लगता है कि महाकाल लोक का बनना उनकी किस्मत को बदलने में सबसे ज्यादा अहम होगा. यानी, एक धार्मिक स्थल का कायाकल्प होने से पूरे शहर की आर्थिक सेहत में जो बदलाव आएगा, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

हालांकि पीएम मोदी ने भी अपने भाषण में महाकाल की महिमा का उल्लेख करते हुए लोगों की इस उत्सुकता को शांत करने की कोशिश की है, लेकिन फिर भी लोगों के दिमाग में ये सवाल जरुर उठता है कि आखिर महाकाल में ऐसा अनोखा क्या है? दरअसल, भगवान शिव के दुनिया में कुल 12 ज्योतिर्लिंग हैं, जिनमें से 11 भारत में और एक नेपाल में पशुपतिनाथ हैं, लेकिन महाकाल का शिवलिंग बाकियों से अलग इसलिये है कि यही इकलौता दक्षिणमुखी है, जो उन्हें कालों का काल यानी महाकाल बना देता है.

यही कारण है कि पीएम मोदी भी उनका उल्लेख करते हुए ये नहीं भूले कि जब महाकाल का आशीर्वाद मिलता है तो काल की रेखाएं मिट जाती हैं. समय की सीमाएं मिट जाती हैं और अंत से अनंत की यात्रा आरंभ हो जाती है. ये भी सच है कि उज्जैन अनादिकाल से ही ज्योतिषीय गणना का केंद्र रहा है और एक जमाने में काल की गणना भी यहीं से ही हुआ करती थी क्योंकि कर्क रेखा इसी प्राचीन नगरी के वायु क्षेत्र से गुजरती है. 

तमाम धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का जिक्र करते हुए पीएम मोदी इस ऐतिहासिक तथ्य को बताना नहीं भूले कि महाकाल की नगरी उज्जैन के बारे में हमारे यहां कहा गया है कि " प्रलयो न बाधते, तत्र महाकाल पुरी..." अर्थात.. महाकाल की नगरी प्रलय के प्रहार से भी मुक्त है. हजारों वर्ष पूर्व जब भारत का भौगोलिक स्वरूप आज से अलग रहा होगा, तब से यह माना जाता रहा है कि उज्जैन भारत के केंद्र में है. एक तरह से ज्योतिषीय गणनाओं में उज्जैन न केवल भारत का केंद्र रहा है, बल्कि यह भारत की आत्मा का भी केंद्र रहा है, जिसने सभ्यता व संस्कृति का नेतृत्व किया है.
             
वैसे कहते भी हैं कि "अकाल मृत्यु वो मरे, जो काम करे चांडाल का. काल उसका क्या बिगाड़ेगा, जो भक्त हो महाकाल का." यानी, जो महाकाल का भक्त है, उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता. महाकाल के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि यह पृथ्वी का एक मात्र मान्य शिवलिंग है. शास्त्रों में महाकाल की महिमा का वर्णन इस प्रकार से भी किया गया है -

"आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् ।
भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते ॥"

इसका तात्पर्य यह है कि आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है. महाकाल को काल का अधिपति माना गया है और ऐसी मान्यता है कि भगवान शंकर का पूजन करने से मृत्यु का भय दूर हो जाता है और सच्चे मन से की गई पूजा से मृत्यु के बाद यमराज द्वारा दी गई यातनाओ से भी मुक्ति मिल जाती है. हर सुबह चार बजे होने वाली महाकाल की भस्मारती पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, जिसमें हर भक्त जरूर शामिल होना चाहता है. 

भस्मारती का विशेष धार्मिक महत्व है, इसलिये पौराणिक मान्यता है कि उज्जैन में ऐसा कोई दिन खाली नहीं जाता, जब किसी एक इंसान की मृत्यु न हो क्योंकि श्मशान की उस भस्म का अंश भी महाकाल की इस भस्मराती में शामिल रहता है. इसलिये शिव अन्य देवताओं के मुकाबले सबसे अलग हैं क्योंकि वे खुद भस्म को धारण करने वाले नश्वर और अविनाशी है.

हर 12 साल में उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ लगता है. साल 2016 में लगे सिंहस्थ पर्व के एक महीने में देश-विदेश से आये करीब 7 करोड़ श्रद्धालुओं ने यहां बहने वाली मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई थी. महाकाल लोक बन जाने के बाद अब प्रशासन को उम्मीद है कि साल 2028 के सिंहस्थ में ये संख्या दोगुनी हो जाएगी.

लेकिन उज्जैन की पहचान सिर्फ सिंहस्थ पर्व ही नहीं है बल्कि अवंतिका, विशाला, अमरावती, सुवर्णश्रृंगा, कुशस्थली और कनकश्रृंगा जैसे नामों से ग्रंथों और इतिहास के पन्नों में चमकती यह प्राचीन नगरी वही है जहां राजा हरिश्चंद्र ने मोक्ष की सिद्धि की थी. जहां सप्तर्षियों ने मुक्ति प्राप्त की थी और जो भगवान श्रीकृष्ण की पाठशाला थी, भर्तृहरि की योग भूमि थी. जहां कालिदास ने ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ और मेघदूत जैसे महाकाव्य रचे.राजा विक्रमादित्य ने अपना न्याय क्षेत्र बनाया. बाणभट्ट, संदीपन, शंकराचार्य, वल्लभाचार्य जैसे संत विद्वानों ने साधना की और न जाने कितनी महान आत्माओं की यह कर्म और तपस्थली बनी.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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