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बिहार की राजनीति, नीतीश की सफ़ेद चादर और उस पर लगते दाग के बीच दांव पर लोकसभा चुनाव

रोजगार, जातिगत सर्वे और फिर 75 फीसदी आरक्षण जैसे बैक टू बैक मास्टरस्ट्रोक चल कर नीतीश कुमार ने बिहार में विपक्ष को एक तरह से मूर्छित अवस्था में पहुंचा दिया है. राजनैतिक रूप से इन चालों की काट सूझ नहीं रही हैं. ऐसे में उनके हाल के दो बयानों और कुछेक आपराधिक घटनाओं के कारण बिहार और नीतीश कुमार लगातार चर्चा में हैं या कहे कि गलत तरीके से चर्चा में बनाए रखने (राजनीतिक मजबूरीवश) की कोशिशें की जा रही हैं. लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार का समाज विपक्ष के इन झांसों में आ जाएगा याकि वह फिर रोजगार और आरक्षण जैसे मुद्दों पर नीतीश कुमार-तेजस्वी यादव के महागठबंधन के साथ और मजबूती से जुड़ेगा? 

बयानों का असर! 

मीडिया और मतदाताओं का एक मुखर किन्तु छोटा ही हिस्सा नीतीश कुमार के जनसंख्या नियंत्रण वाले बयान से इतना खुश हो गया, मानो उनके हाथ कुबेर का खजाना लग गया हो. बिहार में विपक्ष यह भूल गया कि उनके राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने “कांग्रेस की विधवा”, “50 करोड़ की गर्ल फ्रेंड” “ताड़का जैसा अट्टाहस” और “जेएनयू में कंडोम के ढेर” जैसे बयान देने के बाद भी स्पष्ट बहुमत पाते रहे हैं. यानी, जनता की नजर में, मतदाताओं की नजर में इन राष्ट्रीय नेताओं के राजनीतिक बयान से अधिक महत्व एजेंडे का रहा, मुद्दे का रहा, वादों का रहा, कामों का रहा, जो इन नेताओं या पार्टियों ने किए या करने के सपने दिखाए. तो फिर यही फार्म्यूला नीतीश कुमार के केस में क्यों नहीं लागू होगा?

क्यों नहीं बिहार की जनता बजाए उनके जनसंख्या नियंत्रण बयान पर ध्यान देने के इस बात पर ध्यान देगी कि कैसे वे लगातार लाखों सारकारी-स्थायी रोजगार का सृजन कर रहे हैं, कैसे वे सामाजिक न्याय को मजबूती से लागू करने के लिए 75 फीसदी आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध हैं? क्या पिछले दस सालों में क्या हिन्दुस्तान के किसी आम चुनाव या विधानसभा चुनाव में ऐसा हुआ है कि किन्हीं एक बयान के कारण परिणाम उलट गए हो? मुझे ऐसा कुछ याद नहीं आता. उलटे पिछले कुछ सालों के दौरान राजनीतिक भाषणों और शब्दों की गरिमाँ चहुँओर गिरी है. भाषाई मर्यादा तार-तार होती चली गयी हेयर उसके मुकाबले देखा जाए तो नीतीश कुमार तब भी एक जेंटल राजनेता नजर आते हैं, जो भाषाई मर्यादा आमतौर पर नहीं खोते. 

मांझी प्रकरण का असर! 

हाँ, कहने वाले यह जरूर कह सकते है कि सदन के भीतर जिस तरह से नीतीश कुमार मांझी के बयानों पर अपना आप खो दिए और यहाँ तक कहा डाला कि मेरी मूर्खता के कारण मांझी को मैंने मुख्यमंत्री बना दिया. निश्चित तौर पर संसदीय गरिमा को देखते हुए उन्हें यह “सच” नहीं बोलना चाहिए था. हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए. राजनीति शास्त्र का नवांकुर भी जानता होगा कि नीतीश कुमार ने कोई गलत बात नहीं की थी लेकिन यह बयान पोलिटिकली करेक्ट नहीं था. और यही हुआ भी. विपक्ष ने तत्काल मांझी के आवास पर बैठक की और इसे महादलित के अपमान के तौर पर प्रचारित करने की कोशिशें शुरू कर दी. राजनीतिक रूप से ऐसा ही हना था, हो भी रहा है लेकिन क्या मांझी, जो खुद कई सीटों से चुनाव लड़ कर, बमुश्किल जीत पाते हैं, इतना दमखम रखते है कि अपनी जाति के वोट को जहां चाहे वहाँ ट्रांसफर करवा दे?

फिर नीतीश कुमार की पार्टी के महादलित नेताओं की हैसियत क्या रह जाएगी? फिर अशोक चौधरी और रत्नेश सदा जैसे नेताओं की क्या वकत रह जाएगी? और मांझी पर यह आरोप लगते रहे हैं, खुद भाजपा के लोग भी मानते है कि वे बिहार में राजनीति का इस्तेमाल अपने और अपने बेटे और रिश्तेदारों को “सेट” करने के लिए करते है. उनके बयान, उनके काम, उनकी मंशा कहीं से भी ऐसी नहीं दिखती कि वे अपने समुइदाय की गरीबी और जहालत से परेशान हो और उसे दूर करना चाहते हो. ऐसे में अकले मांझी बयान से नीतीश कुमार के रोजगार और आरक्षण सीमा बढाने जैसे मास्टरस्ट्रोक बेअसर हो जाएंगे, बिहार में विपक्ष के लिए ऐसा सोचना भी राजनीतिक रूप से खुशफहमी का शिकार बनने जैसा होगा. 

अपराध एक चुनौती! 

बेशक बिहार में अब भी अपराध गुड गवर्नेंस के लिए एक चुनौती हैं, इससे इनकार नहीं  किया जा सकता. मुख्यमंत्री या उप मुख्यमंत्री एनसीआरबी के डेटा का हवाला दे कर पल्ला नहीं झाड सकते. बिहार जैसे राज्य का जीडीपी ग्रोथ रेट भले अधिक हो लेकिन क्राइम को ले कर भी आमजन के बीच जो परसेप्शन बना है, वह चिंताजनक है और महागाथाबंधं सरकार को इसे ले कर सचेत और सतर्क रहना चाहिए. मसलन, बालू माफिया की अति-सक्रियता एक बेहद चिंताजनक विषय हैं. यह संगठित अपराधिक गिरोह की तरह चलता अहै. लैंड और लीकर(शराब) माफिया भी बदलते बिहार की राह के सबसे बड़े रोड़े हैं. हाल ही में एक पुलिस अधिकारी पर जिस तरह से बालू माफियाओं ने ट्रैक्टर चला कर उनकी ह्त्या कर दी, यह न सिर्फ अफसोसनाक है बल्कि सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती भी है. अब महागथबंधन सरकार को गंभीरता से इस पर फाइनल अटैक करने की जरूरत हैं.

अगर सरकार ऐसा नहीं करती है तो फिर रोजगार सृजन और आरक्षण के जरिये सामाजिक न्याय की लड़ाई से मिल रही प्रतिष्ठा पर धब्बा ही लगेगा. क्या नीतीश कुमार ऐसा चाहेंगे, क्या तेजस्वी यादव ऐसा चाहेंगे कि उनकी साख, उनकी मेहनत, उनके नेक इरादों पर ऐसे बालू माफिया, जमीन माफिया, शराब माफिया काला धब्बा लगा दें? शायद कभी नहीं. तो, मुझे लगता है कि जिस तरह से मौजूदा बिहार सरकार कई मोर्चों पर काम करते हुए एक समग्र सामाजिक बदलाव लाने की कोशिश में जुटी हुई है, इसी के साथ ही उसे अपराध को ले कर भी जीरो टोलरेंस नीति बनानी चाहिए?

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]

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