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'मोदी मित्र' की रणनीति के जरिये मुस्लिमों को किस हद तक साध पायेगी बीजेपी?

देश की 14 फीसदी मुस्लिम आबादी को विपक्षी पार्टियों का सबसे मजबूत वोट बैंक माना जाता है लेकिन अब बीजेपी ने इसमें भी सेंध लगाने के लिए अनूठी रणनीति तैयार की है. अगले लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी ने ऐसी 65 सीटें तलाशी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी या उससे अधिक है. वहां "मोदी मित्र" के जरिए बीजेपी हर मुसलमान के घर तक मोदी सरकार की नीतियों का संदेश पहुंचाएगी. मोदी का ये पैगाम ले जाने वाले पार्टी के कार्यकर्ता नहीं बल्कि मुस्लिम तबके के ही प्रभावशाली लोग होंगे. ऐसी हर सीट पर 5 हजार मुस्लिमों को तलाशने की मुहिम शुरु हो चुकी है,जिन्हें "मोदी मित्र" का नाम दिया गया है.

समाज के हर वर्ग से मसलन डॉक्टर, प्रोफेसर, वकील, पत्रकार कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसमें जोड़ा जाएगा, जो मोदी सरकार की नीतियों से प्रभावित हैं. बेशक ये गैर राजनीतिक लोग ही होंगे लेकिन पीएम मोदी की सोच है कि समाज में इनकी बात का अपना अलग वजन व महत्व होता है, इसलिए आम मुस्लिम मतदाता के बीच इनके संदेश का असर किसी भी नेता के मुकाबले ज्यादा होगा, लेकिन बड़ा सवाल है कि सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में बीजेपी की कट्टर हिंदुत्व वाली छवि को लेकर आम मुसलमान में जो डर का माहौल है, क्या उसे "मोदी मित्र" दूर कर पाएंगे? मुसलमानों को रिझाने के लिए "मोदी मित्र" बनाने की इस रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में ही सबसे ज्यादा यानी 13-13 मुस्लिम बहुल जिले शामिल हैं. उसके बाद असम और केरल का नंबर है, जहां ऐसी 6-6 सीटें है. जम्मू-कश्मीर में पांच, बिहार में चार, मध्य प्रदेश में तीन, तेलंगाना और हरियाणा से दो-दो और महाराष्ट्र तथा लक्षद्वीप में ऐसी एक-एक सीट शामिल है.  फिलहाल इन सीटों पर बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चा के साथ-साथ आरएसएस से जुड़े 'राष्ट्रीय मुस्लिम मंच' के सदस्य भी मुसलमानों के साथ 'संवाद और संपर्क' करने में जुटे हैं.

वैसे यूपी के मुस्लिमों के बड़े तबके को समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत वोट बैंक माना जाता है, जबकि बंगाल में वे ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के सबसे बड़े समर्थक हैं. जाहिर है कि बीजेपी अपनी इस रणनीति के जरिए सपा और टीएमसी के इस मजबूत क़िले को भेदना चाहती है. बीजेपी की कोशिश है कि इन सीटों पर अगर उसे कुछ फीसदी मुस्लिम वोट भी मिल गए,तो वे बड़ा उलटफेर कर सकते हैं. हालांकि लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 80 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से अधिक है जबकि 65 सीटों पर 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम हैं. आंकड़ों के मुताबिक साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 20 फीसदी से ज्यादा वाली कुल 80 सीटों में से 58 सीटों पर जीत हासिल की थी,जबकि 22 सीटों पर उसे हार का मुंह देखना पड़ा था.अब बीजेपी की निगाह उन्हीं 22 सीटों पर सबसे अधिक है कि इन्हें भी कैसे अपनी झोली में लाया जाये. इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि बीजेपी को मुस्लिम बहुल सीटों पर साल 2014 के चुनाव से ही जीत मिलनी शुरू हुई है,जिसका श्रेय मोदी के चेहरे और अमित शाह की रणनीति को दिया जाता है.

"मोदी मित्र"योजना की शुरुआत 25 अप्रैल से शुरू होगी जो अगले साल लोकसभा चुनाव तक चलेगी.वैसे बीजेपी ने 15 मार्च से ही 'सूफी संवाद महाअभियान' की भी शुरुआत की है, जिसका मकसद सूफी समुदाय के लोगों को बीजेपी से जोड़ना है.बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी के कल्याणकारी विकास कार्यों के कारण समाज के सभी वर्गों में उनके प्रति आकर्षण बढ़ रहा है और मुस्लिम समुदाय भी इससे अछूता नहीं है. यूपी के रामपुर जैसे मुस्लिम बहुल लोकसभा क्षेत्र में बीजेपी को मिली जीत यह सुनिश्चित करती है कि मुस्लिम मतदाताओं में अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के प्रति सोच में बदलाव आ रहा है. हम मुस्लिम मतदाताओं के बीच पहुंचकर उन्हें केंद्र सरकार की योजनाओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के संदेश उन तक पहुंचाना चाहते हैं,इसलिये मुस्लिम समाज से ही हर वर्ग के लोगों को इसमें जोड़ा जा रहा है. उनके अनुसार प्रधानमंत्री मोदी स्वयं यह कह चुके हैं कि जो बीजेपी को वोट न देता हो, उस मतदाता के घर भी पहुंचना है.हम कोशिश करेंगे कि इन 65 जिलों के साथ-साथ पूरे देश में कोई घर हमारी पहुंच से दूर न रहे. हर मुस्लिम बहुल लोकसभा क्षेत्र में जिला और ब्लॉक स्तर पर कार्यकर्ता बनाएंगे. इनमें हर कार्यकर्ता से केवल दस वोट भाजपा से जोड़ने की उम्मीद की जाएगी. यूपी विधानसभा चुनाव में इसी तरह की कोशिश कामयाब रही थी.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

 

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