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किस्सा-ऐ-कश्मीर: वो यूं अचानक बच्चों का खो जाना

ऐसा नहीं है कि कश्मीर में गुजरे एक हफ्ते में हम मौज में ही रहे. इन सात दिनों में एक दिन ऐसा आया जब हमारे होश उड़ गए और हम सोचने को मजबूर हुए कि कहीं कश्मीर आकर गलत तो नहीं किया? चलिए पहेलियां ना बुझा कर सीधे किस्से पर आता हूं जो इस कश्मीर के किस्से की आखिरी कड़ी होगा.

श्रीनगर से चले तो हम सुबह ही थे मगर शाम होते-होते गुरेज घाटी पहुंचे. रास्ता तो सिर्फ 123 किलोमीटर का ही था मगर पूरे रास्ते का नजारा इतना मनोरम कि हर थोड़ी दूर पर हम साथ चल रही वादियों और बह रहे झरनों में उतर जाते. गुरेज घाटी के डाबर कस्बे में आते- आते करीब छह बजे होंगे मगर पूरा कस्बा रोशनी से भरा हुआ. पहले सड़क किनारे कुछ ऊंघते छोटे-छोटे से लकड़ियों से बने घर और फिर बाजार. बाजार भी ऐसा यानि कि घरों में बनी ही छोटी दुकानें वो भी फल, सब्जी, हेयर कट, खाने और खेल के सामानों की. जहां ये दुकानें खत्म होती हैं वहीं पर आपको दिखता है लाग हट कैफे. 

छोटे कश्मीरी कस्बे में किसी शहरी को कैफे दिख जाए तो क्या कहना. सबने जिद पकड़ी कि पहले कैफे को ही निपटाया जाए मगर सोचा गया कि पहले जहां रुकना था वहां कमरों पर कब्जा करें फिर तरोताजा हो कर कैफे आया जाए. सुकून इस बात का भी कि किशन गंगा नदी के पुल को पार करते ही हमारे फोन बंद हो चुके थे. करीब एक घंटे बाद जब हम सब लाग हट कैफे पहुंचे तो आंखें चौड़ी हो गईं. ये कैफे किसी भी शहर के बेहतरीन कैफे से कम नहीं था. लकड़ी के सुंदर इंटीरियर से लेकर खाने पीने की चीजों के स्वाद तक. इसे आर्मी ने खोला है मगर काम करने वाले स्थानीय लोग हैं जिनको आर्मी स्टाफ ने ही ट्रेंनिंग दी है. 


किस्सा-ऐ-कश्मीर: वो यूं अचानक बच्चों का खो जाना

मकसद यहां लोग कैफे कल्चर को जाने और पर्यटकों और टैकर्स को एक ठिकाना मिल जाये चाय काफी चाऊमीन के साथ बैठकर गपियाने का. बस फिर क्या था हम तीन परिवारों ने कश्मीर के इस ट्रिप में जो कुछ अच्छे से नहीं मिल पा रहा था जमकर खाया पिया. बाहर निकलते निकलते शाम होने को थी हम अपने होटल्स की तरफ चलने लगे तो अचानक बेटू ने कहा कि मैं बाजार से केले लेकर आता हूं इस सबसे मेरा पेट नहीं भरता, रजनी की सहमति मिलते ही बुलबुल भी साथ जाने लगी. दोनों हमारे होटल के ठीक विपरीत दिशा में बाजार की ओर चल पड़े. इधर हम जब पैदल होटल की ओर बढ़ रहे थे तो देखा अंधेरा गहरा गया. ऐसा लगा पहाड़ी से उतरकर अचानक अंधेरे ने गांव में डेरा डाल लिया था. तभी मेरे मन में आया कि बच्चों को अकेले बाजार नहीं भेजना चाहिये. आखिर है तो ये कश्मीर ही. जिसके बारे में इतना सुना है. मैंने चेहरे पर बिना चिंता का इजहार किये रजनी से कहा तुम होटल चलो मैं बच्चो को लेकर आता हूं और बिना जबाव का इंतजार किये चल पड़ा.

उधर चहल पहल वाले बाजार में अब सन्नाटा होने को था. कुछ दुकानें खुली तो कुछ बंद हो चुकीं थीं. मेरी निगाहें बच्चों का तलाश रहीं थी. बेटू बुलबुल कही से दिख जाए बस. चलते-चलते मैं ये छोटा सा बाजार पार कर चुका था. जहां से फिर डाबर के घर और उनके बगल से अंदर जाने वाली संकरी अंधेरी गलियां शुरू होती थी. गलियों में सन्नाटा था गली के छोर पर कहवा कबाब के ठेलों पर खड़े नवयुवक थे जो मुझे हैरत से देख रहे थे. कुछ बुजुर्ग लोग भी थे जो फिरौन पहने घरों को लौट रहे थे. मेरा मन अब बैचेन होने लगा. मैं गांव के छोर तक आ गया था और दोनों कहीं नहीं दिख रहे थे. हमारे फोन तो गुरेज आते ही बंद हो गये चुके थे इसलिए फोन कर पूछने का आसान रास्ता नहीं था. मैं घबराया और अंधेरी गलियों को देखते हुए वापस लौटने लगा. रास्ते में मैने फल की दुकान वाले से पूछा कोई लड़का केला लेने आया था. उसने कहा जी थोड़ी देर पहले आया था मगर वो लौट गया. मुझे थोड़ी तसल्ली हुई. किस्सा-ऐ-कश्मीर: वो यूं अचानक बच्चों का खो जाना

तकरीबन भागते हुए मैं होटल के रास्ते पर था और ये भगवान को मना रहा था कि बच्चे घर तो पहुंच ही गए होंगे. यदि नहीं पहुंचे तो क्या होगा. कश्मीर में आतंकवाद और अपहरण की रोजा जैसी जाने कितनी फिल्में देखी हैं सब दिमाग में चलने लगीं. लड़का है उसके पास महंगा मोबाइल, घड़ी सब तो है किसी की नजर फिर जाये तो क्या छोटी बच्ची भी है साथ में फोन चल नहीं रहे किसको फोन लगाउंगा. होटल में बदहवासी में घुसते ही देखा एक कमरे से हंसी ठहाकां की आवाज आ रही है मन को तसल्ली हुई कि बच्चे आ गये. मगर ये क्या यहां तो रजनी हमारे साथियों के साथ अकेली थी. मैंने पूछा बेटू कहां है उसने कहा तुम तो लेने गये थे नहीं मिले क्या. बस ये कहना ही था कि सबके चेहरे का रंग एक झटके में उतर गया और कमरे में तनाव पसर गया. तुरंत अभिषेक उठा भईया आप जरा भी चिंता नहीं करो एक बार फिर चलिए यहीं कहीं होगे मिल जायेंगे. 

हमने आनन फानन में गाड़ी वाले को बुलाया तो एक गाड़ी में हमारी दोनों गाड़ी के ड्राइवर आ गए. क्या हुआ पता लगते ही सबसे पहले शब्बीर बोला आप चिंता नहीं करो सर यहां ऐसा कुछ नहीं होता जैसा आप सोच रहे हैं. अभी सब मिल जाएंगे, अंधेरे में रास्ता भटक गए हांगे. गाड़ी अंधेरे रास्ते में फिर बाजार की ओर चलने लगी. तभी अब तक चुप यासीन ने मेरे कंधे पर हाथ रखा सर कुछ सोचिये नहीं अपना सर कटा लूंगा मगर आपके बच्चों को कुछ होने नही दूंगा. मगर मेरा मन तो तमाम आशंकाओं कुशंकाओं के बीच झूल रहा था. जब बाजार से होटल तक एक ही रास्ता है तो बच्चे आखिर गए कहां. मेरे चेहरे पर तनाव दिखने लगा था और अचानक अभिषेक बोल उठा ये तो आ रहे हैं सामने. चेहरे पर गाड़ी की लाइट पड़ते ही बेटू और बुलबुल सामने थे. दोनों दौड़ कर गाड़ी तक आये. कहां थे दोनों. कहीं नहीं इस कैफे में बैठे थे. क्या हुआ आप सबको. मैंने कहा तुमको मालुम नहीं तुम्हारी इस हरकत ने हमें कितनी चिंता में डाल दिया. चलो घर. 

दरअसल ये केले लेकर यहां बैठ गये और मैं उनको बाजार में तलाश रहा था. उफ क्या रिलीफ थी. अब भी सोचता हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. इस वाकये के बाद कश्मीर के लोगों को मैंने दूसरे नजरिये से देखा और जाना कि कश्मीर में सीमा पार से पाले जा रहे आतंकवाद को छोड़ दें तो अपराध शराबखोरी लूटमार और लड़कियों से छेड़खानी एकदम कम हैं.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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