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कर्नाटक चुनाव से पहले 'टीपू सुल्तान वर्सेज हनुमान', हिन्दुत्व पर ही आगे बढ़ेगी बीजेपी

टीपू सुल्तान तो एक बहाना है. बीजेपी अपने कोर एजेंडा या कहे कि एग्रेसिव राष्ट्रवाद, हिंदुत्व के ईर्द-गिर्द कर्नाटक में चुनाव लड़ना चाह रही है. क्योंकि कर्नाटक का चुनाव 2023 में अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों का ऐजेंडा सेट करने वाला है. कर्नाटक का चुनाव पहला बड़ा चुनाव है इस साल का, अभी तो नॉर्थ ईस्ट में चुनवा चल रहा है, लेकिन साल के अंत में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान समेत पांच राज्यों के चुनाव होने हैं. लेकिन कर्नाटक का चुनाव सबसे बड़ा और ट्रेंड सेट करने वाला होगा. 

चूंकि कर्नाटक में ऐसा माना जा रहा है कि बीजेपी की स्थिति उतनी मजबूत नहीं हैं और कांग्रेस एक अपस्विंग पर है, तो लिहाजा चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है. बीजेपी अपना जो एजेंडा है हिंदुत्व का वो चाहती है. वैसे भी केरल से जुड़ने वाले जिले जैसे यूडीपी में बीजेपी इस मुद्दे पर स्ट्रोंग है...बोमई सरकार  के सबसे लोकप्रिय नेता येदियुरप्पा राजनीतिक तौर पर हासिए पर हैं तो बीजेपी को कर्नाटक में एक चेहरा और मुद्दा दोनों की तलाश है. प्रधानमंत्री मोदी एक चेहरा रहेंगे वहां के चुनाव में, हालांकि पीएम का चेहरा विधानसभा के चुनाव में उतना प्रभाव नहीं छोड़ पाता है जिस तरह से वे लोकसभा के चुनाव में सीटें डिलीवर कर पाते हैं तो वे हिंदुत्व पर लौट रहे हैं. मुकाबला बड़ा है और इससे आसान बात और क्या हो सकती है कि आप टीपू सुल्तान और हैदर अली के मुद्दे निकाले और फिर हिन्दू बनाम मुस्लिम का कुछ करने का प्रयास करें तो इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है.

क्या हिन्दू एजेंडा ही शूट करता है?

इसमें ऐसी कोई बात नहीं है जिसे भूतो न भविष्यति वाली बात कह सकते हैं. अमूमन हमने ये देखा है कि भारत में चुनाव मोटे इश्यूज पर होते हैं और वो भावनात्मक बन जाते हैं. यही चीज कर्नाटक में बीजेपी का करने का प्रयास है. वास्तव में अमित शाह जी ने तो ये भी कहा था कि देखिए केरल केरल से बचने का और केरल से मुकाबला करने का कर्नाटक में बीजेपी ही सबसे सक्षम है.. 

हम ऐसे भी कह सकते हैं कि केरल में एक किस्म का पोलराइजेशन है.. रेडिकलाइजेशन की बातें होती हैं, पीएफआई जैसी संस्थाओं की जड़े वहां पर मजबूत हैं और जिस तरह से आरएसएस और हार्ड कोर और दूसरे पक्षों के बीच जिस तरह से वहां पर हिंसा देखने को मिलती है तो ये भी एक तरह से हिंदुत्व को भुनाने का प्रयास है.. दूसरा जो कुछ बाउंड्री डिस्प्यूट है, उस मुद्दे के संदर्भ में तोड़ मरोड़ सकते हैं..कि देखिये हम तो उस सदर्भ में कह रहे थे. 

कर्नाटक का बहुत ज्यादा महत्व

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि न सिर्फ कर्नाटक ज्यादातर चुनावों में बीजेपी का मुद्दा जो उनका एक कोर मुद्दा रहा है पिछले एक दो दशक में और मोदी जी के आने के बाद ये और भी मुखर हो गया है वो एक हिंदुत्व का मुद्दा है और उसको वो सामने लाएंगे. वो हर जगह लाते हैं चाहे कोई भी राज्य हो. कर्नाटक उसमें अपवाद नहीं हो सकता है...और कर्नाटक का महत्व बहुत है क्योंकि इस साल के अंत में होने वाले चुनावों का एक रूप तय करेंगे. और कर्नाटक संसाधनों के मामले में बहुत ही संपन्न राज्य है जो भी यहां जीतेगा वह साधनों के स्तर पर मजबूत होगा इसलिए यह एक हाईटेक चुनाव है. कर्नाटक में कहे तो सारे फुल स्टॉप हटा दिए जाएंगे और यहां जबरदस्त संघर्ष होगा..

2019 जैसा परफॉर्मेंस दोहराने में शक

कर्नाटक बहुत ही साधन व संसाधन संपन्न राज्य है..उसका एक आईटी हब है मतलब एक किस्म का भारत का प्रतिक भी है एक उज्ज्वल आईटी हब और हाईटेक की दुनिया का और मुझे नहीं लगता है कि बीजेपी अपने 2019 के लोकसभा के परफॉर्मेंस को कर्नाटक में लोकसभा में भी रिपिट कर पाएगी. ये तो तब हुआ जब येद्दुरप्पा थे, एक माहौल था.

उत्तर में तो इतना नुकसान नहीं हो रहा है, जैसे मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के बारे में इतना कुछ भी नहीं कहा जा सकता है. बिहार और दिल्ली महत्वूपर्ण राज्य हैं, जहां सभी समीकरण बदले हैं 2019 के मुकाबले नीतीश कुमार के इधर आ जाने से. महाराष्ट्र एक महत्वपूर्ण राज्य है जहां यह देखना होगा कि जनता महाविकास अघाड़ी को देती है कि उद्धव या सिंदे के साथ जाती है और बंगाल एक महत्वपूर्ण राज्य होगी. 

बंगाल में हुए पिछले चुनाव में बीजेपी की परफॉर्मेंस अच्छी थी और वो इसलिए थी कि लोगों का उस समय मत था बीजेपी ममता बनर्जी को उखाड़ फेंकने में सक्षम है..हालांकि उसके बाद के विधानसभा चुनाव ने इस बात को गलत साबित कर दिया. तो मैं बिहार, महाराष्ट्र और बंगाल इन तीनों राज्यों को 2024 के लिए मेन बैटलग्राउंड मानता हूं. कर्नाटक में तो बीजेपी की क्षति होनी है बढ़त के मुकाबले. तो इन सबका वे कहां भरपाई करेंगे. इस मामले में तो बीजेपी वाले अपने चुनावी रणनीति बनाने में बहुत एक्सपर्ट हैं. उनके दिमाग में वो सारी बिसातें बिछ गई होंगी लेकिन अभी समय है बीच में एक साल में कई राज्यों के चुनाव सामने हैं. कई नए समीकरण निकल सकते हैं.

येदियुरप्पा के करश्मा की खलेगी कमी 

येद्दुरप्पा अपने आप में एक बड़े नेता थे. इन फैक्ट अगर आप थोड़ा पीछे मुड़ कर देखें तो साउथ इंडिया में बीजेपी की जो पहले पदचाप पड़े वो येद्दुरप्पा के कारण ही कर्नाटक में उनकी इंट्री हुई थी. येद्दुरप्पा स्वयं एक बड़े जनाधार वाले नेता हैं. वहां का सबसे बड़ा समुदाय जो लिंगायत है वे उसके नेता हैं और दूसरी बड़ी कम्युनिटी है. वोकालिंगा, जिसके बड़े नेता देवगौड़ा हैं, तीसरे बड़े समुदाय का प्रतिनिधित्व सिद्धारमैया करते हैं. तो येद्दुरप्पा जो एक बैकग्राउंड में चले गए हैं तो उसका विकल्प वहां पर भाजपा अभी तक नहीं खोज पाई है. इसलिए या तो उनके पास कोई विकल्प होगा या फिर वे इस तरह के इमोटिव मुद्दों को उठाएं या फिर मोदी जी की लोकप्रियता और उनके भाषणों या रैली पर निर्भर करें. 

लेकिन राज्य की जनता वहां मुख्यमंत्री और वहां के मुद्दों के बारे में सोच रही होती है तो मोदी जी का असर पड़ता तो है लेकिन वो लोकसभा के चुनाव में ज्यादा दिखता है जब जनता प्रधानमंत्री और सांसद चुन रही होती है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. ये आर्टिकल संजीव श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित है.)

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