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बच्चों की हरेक स्तर पर टेस्टिंग और काउंसिलिंग जरूरी वरना होती रहेंगी 'वेलकम' जैसी घटनाएं

राजधानी दिल्ली के वेलकम में एक नाबालिग लड़के ने दूसरे लड़के की हत्या कर दी. वह भी मात्र 350 रुपए की बिरयानी के लिए. वह भी एक-दो बार नहीं, पूरे 60 बार चाकू मार कर. इतने से जी नहीं भरा तो उसकी लाश के पास खड़े होकर डांस भी किया. उस लाश के सिर में ठोकर मारी. इस घटना ने दिल्ली ही नहीं, पूरे देश को हिला दिया है. राजधानी में नाबालिगों के अपराध में लिप्त होने के समाचार लगातार आ रहे हैं. हैरान करनेवाली बात यह है कि ऐसी घटनाएं अब एक निश्चित समय पर लगातार घट रही हैं. वेलकम की घटना का आरोपित जुवेनाइल पहले भी एकाधिक अपराधों में लिप्त रहा है. यह हमारे पूरे समाज प्रबंधन पर एक सवालिया निशान है.  

बच्चों की हिंसा दुखद और अस्वीकार्य 

वेलकम जैसी घटनाओं को देख-सुनकर बहुत कष्ट होता है कि मनोविज्ञान को कोई समझता नहीं है. हर व्यक्ति का अगर टेस्ट किया जाए तो बहुतेरे ऐसे मिलेंगे जिनमें दुख ज्यादा है, क्रोध ज्यादा है और कई में क्रोध के साथ हिंसा भी ज्यादा है. ऐसे बच्चों की अगर पहचान हो जाए तो उनकी काउंसिलिंग हो सकती है, उनके पैरेंट्स की काउंसिलिंग हो सकती है कि वे अपने बच्चे से कैसा और कब, किस तरह का व्यवहार करें. अगर इस बच्चे का पहले टेस्ट हुआ होता तो मां-बाप भी सतर्क होते और अगर स्कूल जाने लायक है तो शिक्षक भी सतर्क होते. वह कहां घूमता है, क्या करता है, किन लोगों के साथ रहता है, ये सब पता चल जाता.

जहां तक दिल्ली में नाबालिगों के लगातार अपराध में लिप्त रहने या दिल्ली के वैसे 19 शहरों में पहले स्थान पर आने का सवाल है, जहां जुवेनाइल क्राइम अधिक होते हैं, तो देखना होगा कि हमारे समाज में आर्थिक तौर पर कितनी भिन्नता है? जो बच्चे ये देखते हैं कि दूसरे बच्चे आराम और विलास की जिंदगी जी रहे हैं, उनमें क्रोध अधिक होता है. एक बात यह भी देखनी होगी कि जो बच्चे जुवेनाइल कोर्ट से सजा पाकर जुवेनाइल होम जाते हैं (यानी जो 18 से कम उम्र के हैं) क्या उनकी काउंसिलिंग होती है, क्या उनको ढंग से ट्रीट किया जाता है, या फिर केवल उनसे काम लिया जाता है, उनको वैसे ही ट्रीट किया जाता है, जैसा बड़े अपराधियों को? जुवेनाइल को रिफॉर्म करने की, सुधारने की जरूरत है. 

बच्चों के लिए करना होगा बहुत कुछ 

वैसे, जिन जुवेनाइल में बहुत अधिक क्रोध है, जो काटा-पीटी, मारापीटी में रहते हैं, उनका अगर डीएनए देखें तो पाएंगे कि परिवार में उनके क्रोध की परंपरा है. क्रोध तो एक सामान्य मानवीय व्यापार है, लेकिन इतना क्रोध आ जाए कि किसी को लहूलुहान कर दें, मार दें, वह गुस्सा तो हमलोगों में नहीं आएगा. साथ ही, यह भी देखना होगा कि धनी परिवारों के लड़के भी क्रोधी हो सकते हैं. इसका पृष्ठभूमि से, धन से कोई लेनादेना नहीं है. तो, 18 से कम उम्र के बच्चे को जो भी सजा दें, वह रिफॉर्म करने की हो, कंडेम करने की हो. दिल्ली में सबसे पहले देखिए कि यह कितनी बड़ी है. कितना जनदबाव है, आर्थिक फर्क कितना है, हमारे घरों में ही जो काम करते हैं, वे भी तो तुलना करते हैं.

अब बिना घरों के बच्चे हैं, स्कूलों के बच्चे हैं, घरों के हैं, वे इधर-उधर डोलते रहते हैं. उनकी जांच नहीं होती, जो मैं बार-बार कह रही हूं. काउंसिलर और करते क्या हैं, वे बच्चों की पहचान ही तो करते हैं.  फिर, सवाल है कि हमारी सरकार बच्चों के लिए क्या कर रही है? हम लोग पढ़ने-लिखने की बात करते हैं, क्रिएटिव आर्ट्स, पेंटिंग, संगीत आदि की बात ही नहीं करते. ये सब तो क्रोध को कम कर सकते हैं, इसके जरिए वे खुद को अभिव्यक्त कर सकते हैं, लेकिन सही रूट न मिलने के कारण बच्चे कुंठित हैं औऱ वो अपनी कुंठा कहीं और निकालते हैं. मानसिक रोग का मतलब केवल पागलपन नहीं होता है, बल्कि जब आप खुद पर नियंत्रण न रख सकें, क्रोध में बिल्कुल विक्षिप्त हो जाएं, तो भी मानसिक रोग ही है. 

हरेक बच्चे की जांच जरूरी

अगर आप एक अभियान शुरू करें कि आज इस स्कूल में 8वीं, 9वीं या 10 वीं के बच्चों का टेस्ट करेंगे, तो उस जांच के बाद, पर्सनैलिटी टेस्ट के बाद खुद ही पता चल जाएगा कि क्रोध का स्रोत क्या है, वॉयलेंस आखिर उपज कहां से रहा है? ऐसे बच्चों को पहचान कर अगर हम उनके लिए काउंसिलिंग करें तो यह बहुत अच्छा काम होगा. बाहर के देशों में भी देखिए. जब वहां इसमें कमी आती है, तो फायरिंग शुरू हो जाती है, वॉयलेंस की घटनाओं की रिपोर्ट आती है. अमेरिका में भी ऐसी हत्याएं हुई हैं. ये नॉर्मल बच्चों का काम नहीं है, ये तो उन बच्चों का काम है, जिनका अपने क्रोध पर नियंत्रण नहीं है. तो, प्रिवेंटिव मेजर लेना आसान है, ना कि क्योरेटिव मेजर लेना. यह बहुत बड़ा काम भी नहीं है.

आप उन लोगों से शुरू करेंगे जिनका स्कोर बहुत हाई आएगा. आप सारे क्लास की काउंसिलिंग नहीं करेंगे न. आजकल टेलीविजन तो गरीबों के घर में भी है. तो, जब हमारे सांसद कुर्सियां फेंकेंगे, गाली देंगे तो बच्चे भी उनकी ही नकल करेंगे. आप देखिए कि हम अपने बच्चों के लिए रोलमॉडल हैं. आप चैनल्स देखिए, ओटीटी देखिए, कितना क्रोध, कितनी तोड़फोड़ ..तो बच्चे कहां जाएंगे? वे तो यह सोचते हैं कि किसी को मारना ही अंतिम उपाय है, जबकि भारत का तो हमेशा से लक्ष्य क्रोध को हटाने का रहा है. इसका मतलब ये नहीं कि आप भगवा कपड़े धारण कर लें, लेकिन इसका अर्थ यह है कि आप क्रोध और लालसा पर काबू रखें. 

बच्चों को सजा भी मिले, दवा भी

वेलकम वाली जो घटना है, ठीक है कि उसका आपराधिक इतिहास है, आप उसके परिवार का इतिहास देखिए. आपको पता चल जाएगा कि यह उसके जीन्स और क्रोमोजोम्स में है. यह पार्टली बाइ लर्निंग है, लेकिन बाकी तो जीन में है. हम आखिर इंतजार क्यों करते हैं, ऐसे बच्चों का तो पहले ही इलाज करवाना चाहिए. हम सोचते हैं कि समझा देंगे, फिर देखा जाएगा. इसमें केवल समझाने से काम नहीं चलता, कई बार दवाइयां भी देनी होती हैं. थेरेपी भी चलेगी, दवा भी होगी. उसकी पर्सनालिटी से क्रोध कैसे हटाया जाए, इस पर विचार करना होगा. उसे किसी ऐसी क्रिया में डाला जाए, जिससे उसका कल्याण हो सके. मनोचिकित्सक से ट्रीटमेंट लेना अनिवार्य है, लेकिन उसको लाइटली भी नहीं लेना चाहिए कि बच्चा है. उसकी नींव में दरार है और उसे भरना पड़ेगा. उस पर नजर रखनी होगी. दवा देनी होगी. उसके मित्रों-दोस्तों पर ध्यान रखना होगा. स्कूल के टीचर्स और दोस्तों का भी काफी योगदान है. शिक्षक और बच्चों का अनुपात भी सही होना चाहिए, ताकि वह सभी बच्चों पर ध्यान दे. इस क्षेत्र में बहुत काम करने की जरूरत है. सजा इनको मिलती है, लेकिन साथ में थेरेपी और दवा भी दी जाती है.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]

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