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इजरायल-हमास जंग से अरब देशों का बदल सकता है भूगोल, ईरान को सबसे ज़्यादा ख़तरा, एक्सपर्ट से समझें 

हमास ने जो ग़लती की है, जो टेरर किया है, उससे इजरायल को जवाबी कार्रवाई करने का पूरा अधिकार मिल गया है. इजरायल का पहले भी प्लान का की गाजा पट्टी को एनेक्स करना है. उनके वित्त मंत्री ने कहा भी था कि वेस्ट बैंक को भी एनेक्स कर लेंगे, साथ में वहां की जनता को भी कर लेंगे. जनता को लगने लगा कि अभी तो लेबर की तरह व्यवहार करते हैं. कहीं हम लोग स्लेव लेबर न बन जाये.

ग्रेटर इजरायइल का उनका प्रोजेक्ट चल रहा था. हमास के इस हमले ने इजरायल को ये पूरी छूट दे दी कि वो जो चाहे, करे. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तो कहा है कि उन्होंने शुरू किया और ख़त्म हम करेंगे. यह ख़त्म कहाँ पर होगी, फ़िलहाल यह कहना मुश्किल है. देखना यह है कि ईरान तक यह न चला जाये.

इजरायइल को मिल गया है मौक़ा

नेतन्याहू काफ़ी समय से कह रहे थे कि ईरान ने हमको चारों तरफ़ से घेर लिया है. इजरायल के चारों तरफ जो रिंग ऑफ फायर जो बना दिया है, उसका लिंक ईरान से जुड़ा हुआ है और उसका हेड ईरान में है. नेतन्याहू बार-बार यह भी कहते हैं कि ईरान का जो न्यूक्लियर पावर प्रोग्राम है, उसको ध्वस्त करेंगे. अमेरिका भी कहने लगा है कि इस समय ईरान 15 दिन के अंदर परमाणु बम बना सकता है.

इसमें दो बातें है. एक तरफ़ को इजरायल का ग्रेटर इजरायल का प्लान है और दूसरी तरफ़ अमेरिका भी इससे जुड़ा है. पिछले कुछ समय से देखा होगा कि अमेरिका ने अपनी सेना की शक्ति वहाँ पर काफ़ी बढ़ा दिया है. उनका जो सेंट्रल कमांड है, उसका एयर हेडक्वार्टर कतर में है. उसके अलावा जो ग्राउंड सेना है, उसका हेडक्वार्टर बहरीन में है. नौसेना की मौज़ूदगी भी अमेरिका ने बढ़ा दिया है. 

सऊदी अरब या कतर इन देशों की कोई मिलिट्री कैपेबिलिटी नहीं है. इनकी बारगेनिंग कैपेसिटी भी शून्य है. ये लोग अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं. फिलिस्तीन की मदद के लिए तो कोई अरब देश नहीं आयेगा. ये आपस में ही बहुत बंटे हुए हैं. इनका कुछ पता ही नहीं चलता. मुझे नहीं लगता है कि फ़िलहाल कोई अरब देश फिलिस्तीन की मदद के बारे में सोचेगा.

ईरान के लिए बढ़ गया है ख़तरा

ईरान ज़रूर वहां आतंकी गुट को समर्थन करता था, मगर हमास को सपोर्ट करना बहुत मुश्किल है क्योंकि वहां 15 साल से ब्लॉकेज़ चल रहा था. गाजा पट्टी में कोई भी सामान आना-जाना इजरायल  के ज़रिये ही होता था. एक साइड मिस्र से है तो उसने भी बंद कर रखा था. मिस्र को भी हमास नहीं पसंद है क्योंकि हमास मुस्लिम ब्रदरहुड  विचारधारा का है.

यह बहुत ही जटिल समस्या है. अमेरिका को लगता है कि उसका प्रभाव उस एरिया में कम रहा है. सऊदी अरब चीन से डील कर रहा है. सऊदी अरब कह रहा है कि स्वतंत्र विदेश नीति रखेंगे. यह अमेरिका के ख़िलाफ़ तो नहीं है, लेकिन स्वतंत्र विदेश नीति के तहत चीन से भी दोस्ती करेंगे, रूस से भी करेंगे. इन लोगों ने रूस की वज्ह से यूक्रेन युद्ध की भी निंदा नहीं की.

अमेरिका अपना प्रभाव बढ़ाना चाह रहा है

इस पूरे क्षेत्र में अपनी स्थिति दोबारा से मज़बूत करने के लिए अमेरिका कोशिश कर रहा है. यह तभी संभव होगा, जब ईरान पर नियंत्रण कर लिया जाये. ईरान इस बीच बहुत तरक्की कर गया है,वो पाबंदियों से नियंत्रण में नहीं आने वाला है. सैन्य के साथ-साथ बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर भी बहुत तरक्की कर गया है.

अमेरिका का मानना यह है कि 21वीं सदी अमेरिकन सेंचुरी है. इसको मेंटेन करने के लिए उसको ऑयल रिसोर्स पर ग्रेटर कंट्रोल चाहिए. इसी के लिए अमेरिका ने इराक,अफगानिस्तान में इतनी लड़ाइयां लड़ी. ईरान में उसकी कोशिश थी कि सत्ता बदल जाये, लेकिन अभी तक ऐसा हो नहीं पाया है.

ज़मीन से तो नहीं, लेकिन अमेरिका, इजरायल की ओर से एयर पावर से ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर को ध्वस्त करने की संभावना है. घेराबंदी हो रही है, सेना की तैनाती बढ़ रही है. अमेरिका राष्ट्रपति  जो बाइडेन ने भी कह दिया है कि ईरान 15 दिन के भीतर परमाणु बम बना सकता है. ऐसे में हर तरह की संभावना बन सकती है. भविष्य में क्या होगा, यह कहना मुश्किल है. हमास के हमले ने इजरायल-अमेरिका के पक्ष में माहौल बना दिया कि वे इन इलाकों में जो मन हो, वो कर सकें.

आगे क्या होगा, कहना मुश्किल है. जैसा माहौल दिख रहा है, ऐसा लग रहा है कि गाजा पट्टी को पूरा लेवल कर देंगे और वहाँ के लोगों को जगह छोड़नी पड़ेगी. गाजा पट्टी में रहने लायक कुछ बचेगा नहीं. पॉपुलेटेड मोहल्लों को ढाह दिया गया है. कितने लोग मर चुके है, कितने दबे हुए हैं, अभी तो वास्तविक संख्या पता ही नहीं है. इजरायल के 13 सौ लोग मरे हैं, वो भी अफसोस की बात है.उनके 500 लोगों को बंदी भी बना लिया गया है. युद्ध से कभी किसी का लाभ नहीं हुआ है, हमेशा ही नुक़सान ही हुआ है.

हमास के हमले से फिलिस्तीन को फ़ाइदा नहीं

हमास के हमले से फिलिस्तीन को कोई फ़ाइदा नहीं होने वाला है.आना वाला समय मुश्किल है.एक तरफ़ से संघर्ष में अमेरिका सीधे शामिल होता है और दूसरी तरफ़ से हिज़्बुल्लाह शामिल होता है, तो मामला और भी बिगड़ जायेगा. अमेरिका हर तरह से इजरायल की मदद करने को तैयार है. इजरायल उस रीजन में अमेरिका के हितों को प्रोटेक्ट करता है. जर्मनी, फ्रांस, इटली ये सारे पश्चिम के देश इजरायल की मदद को तैयार हैं.

अब देखना ये है कि ईरान क्या करता है, सरेंडर करता है या उसको बर्बाद करने के लिए अमेरिका समेत पश्चिमी देश कार्रवाई करते हैं. अमेरिका और उसके सहयोगियों का ये बड़ा जाल है, बड़ा प्लान है. रूस की बढ़ती हुई ताक़त को यूक्रेन युद्ध में उलझा दिया. चीन, ताइवान में फंसता चला जा रहा है. अमेरिका नहीं चाहता कि अरब देशों में रूस या चीन का प्रभाव बढ़े. ईरान अगर कमज़ोर होता है, तो वो रूस की जो मदद करता है, वो भी नहीं कर पायेगा. इसका हर चीज़ पर असर पड़ेगा. ये लड़ाई काफ़ी देर तक चलेगी.

हिज़्बुल्लाह के आने से समस्या बढ़ जायेगी

अगर हिज़्बुल्लाह फिलिस्तीन की मदद के लिए आ जाता है, तो इससे अमेरिका बहुत खुश होगा. उसको खुलकर इजरायल की ओर से लड़ने का मौक़ा मिल जायेगा. हिज़्बुल्लाह शामिल न हो, यह पूरे इलाके के लिए बेहतर होगा. लेबनान के लिए भी बेहतर होगा. इस बार अगर ईरान न्यूट्रलाइज हो जाता है, लेबनान, सीरिया, इराक सब ख़त्म हो जायेगा. उस स्थिति में ईरान भी ख़ामोश हो जायेगा.

इजरायल भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो स्टैंड लिया है, वो आतंकवाद के ख़िलाफ़ से जुड़ा स्टैंड है. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि आतंकवाद का विनाश होना चाहिए. भारत के फिलिस्तीन से भी रिश्ते हैं. पीएम मोदी स्वयं वहां जा चुके हैं. रामल्ला में वहां के राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मिलकर आये थे. फिलिस्तीन की सरकार को भारत का सपोर्ट हासिल है. वहां भारत की मदद से बहुत सारे प्रोजेक्ट चल रहे हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत फिलिस्तीनी अथॉरिटी को रिकॉग्नाइज करता है, हमास या इस्लामी जिहाद से जुड़े टेरर ग्रुप को नहीं. भारत टू स्टेट समाधान में अभी तक विश्वास करता है. इजरायल के साथ हमारा बहुत घनिष्ठ संबंध है. हमारा सामरिक पार्टनर है. सैन्य सहयोग के साथ इंटेलिजेंस शेयरिंग भी है. मिलकर डिफेंस प्रोडक्शन भी करते हैं. इस नज़र से इजरायल भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]

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