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यूनान और भारत के पुराने संबंधों को 40 साल बाद किसी भारतीय पीएम की ग्रीस यात्रा से संवारने की कोशिश, 'यूरोप के गेटवे' से संबंध रखने होंगे घनिष्ठ

प्रधानमंत्री मोदी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेकर ग्रीस की यात्रा पर भी गए. पिछले 40 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का ये पहला ग्रीस दौरा है. इससे पहले इंदिरा गांधी ने 1983 में ग्रीस का दौरा किया था. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ग्रीस का सर्वश्रेष्ठ सम्मान भी दिया गया. ग्रीस की राष्ट्रपति कैटरीना एन सकेलारोपोउलू ने पीएम मोदी को 'ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ ऑनर' से सम्मानित किया. ग्रीस के साथ संबंधों की बेहतरी और निकटता के लिए मोदी का यह दौरा समय के लिहाज से अनुकूल भी है, खासकर जब पूरी दुनिया में अभी उतार का समय चल रहा है और भारत अपने चढ़ाव पर है. 

ग्रीस का साहस अतुलनीय 

प्रधानमंत्री की यह ग्रीस यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है. यह भारत की विदेश नीति में जो बहुत ही सकारात्मक बदलाव आए हैं, उनका भी सूचक है. इसे समझने के लिए किसी भी देश की आदर्श विदेश नीति पर गौर किया जाना चाहिए. यह सिखाता है कि आपकी सीमाएं सुरक्षित हैं, अगर बड़े देशों के साथ आपके संबंध ठीक हैं. प्रधानमंत्री मोदी की नीति उन देशों से भी संबंध मधुर करने की रही है, जो जनसंख्या के लिहाज से भले छोटे हों, लेकिन महत्व के तौर पर सारे ही देश अहम हैं, उसमें भी ग्रीस तो अहमतरीन है. ग्रीस के साथ भारत के संबंध बहुत पुराने भी हैं. हमने सिकंदर की कहानी सुनी है, पढ़ी है, फिलॉसफी में हम ग्रीक दार्शनिकों को, राजनीतिशास्त्र में यूनान के अरस्तू और सुकरात को पढ़ते आए हैं, गणित में पाइथागोरस को पढ़ा है. ये नाम हमारे लिए पहचान के हैं और हमारे स्कूल की शिक्षा से लेकर बड़े होने तक ये बड़े काम के हैं. इसके अलावा ग्रीस ने और क्या दिखाया है? वह 2008 में दिवालिया हुआ था, तब आइएमएफ और वर्ल्ड बैंक ने बेलआउट पैकेज देकर उबारा, फिर कोविड की महामारी, उसके बाद यूरोप में ऊर्जा-संकट और इन सबके बावजूद उसने सालाना 8-9 फीसदी की ग्रोथ को पाया है. यह ग्रीस के 'रिजिलियन्स' का भी द्योतक है. 

भारत की विदेशनीति बदली

विदेशनीति तो पूरी तरह बदल गयी है. कैसे बदल गयी है, इसे समझना चाहिए. यह अब बहुआयामी (मल्टी डायमेंशनल) और बहुदिशात्मक (मल्टी डायरेक्शनल) हो गयी है. यह बहु-क्षेत्रीय (मल्टी-सेक्टोरल) भी हो गयी है. हम गुटनिरपक्षे-आंदोनल के प्रणेताओं में थे, हालांकि उस वक्त भी पूर्व सोवियत संघ की तरफ हमारा झुकाव था. फिर जब उदारीकरण आया, नयी आर्थिक नीतियां लागू हुईं, तो भारत ने तीन दशकों में और पिछले एक दशक में खासकर, अपनी विदेश नीति के मूल में ये तो रखा ही है कि हमारे हित सर्वोपरि हैं, लेकिन भारत की नीति के मूल में स्वहित के साथ ही मूल्य भी शामिल हैं. ऐसा हमारे विदेश मंत्री जयशंकर भी कह चुके हैं. भारत एक ऐसा देश है, जिसकी विदेशनीति में सिद्धांत और मूल्य सबसे ऊपर का स्थान रखते हैं. ग्रीस के साथ विदेशनीति के मूल में यही बात है और हमारे द्विपक्षीय संबंध भी अच्छे हैं, किसी वैश्विक मंच पर भी वैसे ही हैं और संगठनों के मंच पर भी गर्मजोशी से भरे हैं. भारत की छवि विश्वसनीय है और देश इस पर भरोसा करते हैं. यहां चीन का जिक्र जरूर किया जाना चाहिए. उसकी तरह आक्रामक हमारी विदेशनीति नहीं है. जो चीन की चेकबुक डिप्लोमैसी है, कर्ज में लाद दिया, उसके बाद देशों की संप्रभुता पर हमले करने लगे. ऐसा भारत के साथ नहीं है. भारत अपनी इंटिग्रिटी, मैत्रीपूर्ण व्यवहार और अनावश्यक हस्तक्षेप की नीति के लिए जाना जाता है. वह दूसरे देशों के आंतरिक मुद्दों पर तवज्जो नहीं देेता. 

ग्रीस से है पुराना रिश्ता

ग्रीस बहुत पुराने समय, यानी 1952 से ही नाटो का सदस्य है. नाटो और रूस की बिल्कुल आमने-सामने की परिस्थिति है. चाहें तो इसे शीतयुद्ध-2 भी कह सकते हैं. हालांकि, यूक्रेन-रूस युद्ध का सबसे अधिक प्रभाव तो यूरोप पर पड़ा है. ग्रीस ने इस आफत से भी खुद को निकाला, यह प्रशंसनीय है. नाटो की एक बात तो खुला रहस्य है कि अमेरिकी हितों का सर्वाधिक खयाल ये संगठन रखता है. यूरोप चूंकि नॉन-मिलिटरी पावर है, तो वह सुरक्षा के लिए उस पर निर्भर है. ग्रीस अपने बजट का 2 प्रतिशत नाटो के लिए रखता है. भारत ने जैसे रणनीतिक समझदारी से रूस-यूक्रेन युद्ध में बिना किसी का पक्ष लिए अपनी बात रखी है, वैसे ही अधिकांश देश ऐसा ही कर रहे हैं. ग्रीस भी ऐसा ही संतुलन अपना रहा है. प्राथमिक तौर पर वे भले वेस्टर्न क्लब के मेंबर हों, पर बाकी देशों से भी अपना हित ही साधेंगे. इससे भारत की जो तटस्थता है, नाटो से भी और रूस से भी समान दूरी, वहां पर असर नहीं पड़ेगा. भारत की स्थिर राजनीति-आर्थिक अवस्था और विकास को देखकर सभी देश इससे अपना हित बनाकर रखने की सोचेंगे. भारत एक ग्लोबल एक्टर है अब, हमारा ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा है, तो इसीलिए कोई भी देश अपने द्विपक्षीय संबंधों की परछाईं बहुपक्षीय संबंधों पर नहीं पड़ने देगा. 

बहुत कुछ देगा एक-दूसरे का साथ

क्षेत्रीय विवादों के मद्देनजर भारत की अपनी स्थापित विदेशनीति है. कश्मीर के मसले को जिस तरह हम द्विपक्षीय मानते हैं और तीसरे पक्ष की संलग्नता नहीं चाहते, वैसे ही दूसरे मुल्कों के साथ भी है. ग्रीस इस मसले पर हमारे साथ है. पोखरण परमाणु परीक्षण के समय भी ग्रीस हमारे साथ था. यह विश्वसनीयता हमारे आगे बहुत काम आएंगी. ग्रीस तकरीबन 6000 द्वीपों में फैला देश है. इसकी ओशनोलॉजी, मरीन पावर, ब्लू इकोनॉमी, बायो-टेकेनोलॉजी और तकनीकी कुशलता बहुत महत्वपूर्ण हैं, इससे भारत को फायदा होगा. यूरोपियन यूनियन के सारे सदस्य देश एनर्जी ट्रांजिशन, एसडीजी गोल्स की ओर चल रहे हैं. हमारे जितने भी फ्लैगशिप कार्यक्रम हैं, वहां हमारे लिए मौका है कि हम मिल-जुलकर काम करें. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.] 

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