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'भारत के साथ दोस्ती का दबाव, मारना चाहते थे बाजवा...'. आखिर क्यों ऐसे बयान दे रहे पूर्व पाक PM इमरान खान

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ये कहना चाह रहे हैं कि वे खुद भारत के साथ संबंध अच्छा बनाना चाहते थे, मगर पूर्व सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा इसमें खलनायक थे और उनकी वजह से ये नहीं हो पाया. इमरान खान इस वजह से भी ये कहते हैं कि पाकिस्तान की आम जनता के लिए अब कश्मीर कोई मुद्दा नहीं रहा. वे लोग इस मुद्दे से त्रस्त हो चुके हैं. उनको लगता है कि इस मुद्दे से सिर्फ़ सेना को ही फायदा होता है और कोई फायदा नहीं होता है. भारत से कश्मीर लिया नहीं जा सकता.

दूसरी चीज ये भी है कि सेना को भी उस तरीके से अब पाकिस्तान के लोग पसंद नहीं करते. कारण ये है कि सेना का वहां की राजनीति में लगातार हस्तक्षेप हुआ है. जिस तरीके से नवाज शरीफ को हटाया गया और भेजा गया. उसके पहले बेनजीर भुट्टो की हत्या हुई . उसके पहले उनके पिता ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फौजी तानाशाह ज़िया-उल-हक़ ने फांसी की सज़ा दी.

पाकिस्तान की सेना ने हमेशा ये कहा कि वो इस्लामिक स्टेट का मुहाफ़िज़ यानी हिफ़ाज़त करनेवाला है. पाकिस्तान की जनता समझने लगी है कि ये कैसा इस्लामिक स्टेट बना रहे हैं, जिसमें लोकतंत्र और मानवाधिकार जैसी चीजें नज़र ही नहीं आ रही हैं. आजकल का यूथ काफी ग्लोबलाइज्ड हो चुका है. दूसरी तरफ पाकिस्तान की जनता ये भी देख रही है कि भारत में लोकतंत्र है, संविधान है, नियम-कायदे से शासन चलता है और वहां पर आर्मी और पॉलिटिक्स अलग-अलग है. सुप्रीम कोर्ट समेत सभी संवैधानिक संस्थाएं अलग-अलग हैं. यही कारण है कि भारत ने इतनी तरक्की की है.

पाकिस्तान के लोग चाहते हैं अब यहां राजनीति में सेना का दख़ल खत्म हो जाए. इमरान खान को ये बात अच्छी तरह से समझ आ गई है. इमरान खान वहीं बात अब कह रहे हैं, जो वहां की जनता चाहती है. जैसे अमेरिका के खिलाफ पब्लिक ओपिनियन है, तो वे अमेरिका के खिलाफ बात करते हैं. वो जो बार-बार सेना को टारगेट करते हैं, उससे जनता खुश होती है. इमरान खान ये भी दिखाना चाहते हैं कि वे भारत से दोस्ती करना चाहते थे, मगर उनके समय में जो आर्मी चीफ थे यानी कमर जावेद बाजवा ने ये नहीं होने दिया.

इसी कारण से इमरान खान को वहां की जनता का समर्थन भी हासिल हो रहा है. जब इमरान खान को गिरफ्तार करने की बात होती  है तो उनके लिए लोग सड़क पर आ जाते हैं. एक ही जगह नहीं, बल्कि कई शहरों में विरोध प्रदर्शन होता है. मेरा मानना है कि अगर पाकिस्तान में स्वतंत्र और निष्पक्ष  चुनाव होता है, तो इमरान खान को कोई नहीं हरा पाएगा.

हालांकि अगर इमरान खान सत्ता में आ भी जाते हैं तो वे कहां तक कामयाब होंगे, जिस तरह से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था तबाह हुई है, उसमें ये कहना मुश्किल है. राजनीतिक अस्थिरता को तो किसी हद तक संभाला जा सकता है, लेकिन आर्थिक हालात को दोबारा से पटरी पर लाना मुश्किल है. उसमें भी एक तरफ महामारी की मार का असर है, दूसरी तरफ यूक्रेन युद्ध की वजह से जरूरी चीजों की कीमतें आसमान पर पहुंच गई हैं.

पाकिस्तान की छवि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में काफी बिगड़ चुकी है. पाकिस्तान के दोस्त मुल्क भी अब उससे दूर होने लगे हैं. उनका भी कहना है कि पाकिस्तान को कर्ज लेने की आदत पड़ चुकी है, वो हर वक्त कर्ज मांगते रहता है. अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए उसने कभी भी अपनी कोई रणनीति नहीं अपनाई. पहले अमेरिका से काफी पैसा मिल जाता था, अब उतने अच्छे संबंध नहीं है.

कोई भी नेता होता है, वो अपना फायदा उठाने की कोशिश करता है. लेकिन फिलहाल ऐसा लगता है कि इमरान खान का संबंध वहां की सेना के साथ इतने बिगड़ चुके हैं, कि पाकिस्तान की सेना उनको स्वीकार नहीं करेगी. सेना से इमरान खान समझौता कर लें, तो बात दूसरी है. फिर जनता से अलग हो जाएंगे. पाकिस्तान में ये एक विरोधाभास है.

दूसरी बात ये है कि इमरान खान के पास कोई टीम भी अच्छी नहीं है. अमेरिका का भी बहुत दबाव है कि पाकिस्तान अमेरिकी हितों को उस रीजन में आगे बढ़ाए. पाकिस्तानी चीन से भी और रूस से भी दोस्ती की बात करते हैं. ये सब जब तक चलता रहेगा, मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान को आईएमएफ या वर्ल्ड बैंक से  कर्ज मिलने की कोई संभावना बनेगी.

सेना इमरान खान को मानने को तैयार नहीं है और सेना के पास कोई दूसरा लीडर नहीं है. इस वक्त वहां हालात ऐसे हैं कि सेना पाकिस्तान में दोबारा हस्तक्षेप कर सकती है. लेकिन अगर सेना हस्तक्षेप करेगी तो, अमेरिकी प्रतिबंध लग जाएंगे. तब इनके लिए और मुश्किल बढ़ जाएगी. अगर सेना को ऐसा कुछ करना है तो अमेरिका को पूरी तरह से भरोसे में लेना होगा. पाकिस्तान इस वक्त बहुत ही विचित्र स्थिति में है. चीन ने फिर लोन दे दिया है, लेकिन सवाल है कि चीन कब तक मदद करेगा. चीन उतनी ही मदद करता है, जिससे पाकिस्तान की सांस चलती रहे.

ये स्थिति अगर बहुत दिनों तक चल जाती है तो डर इस बात का है कि अराजकता फैल जाए. बेरोजगारी चरम पर है, महंगाई की कोई सीमा नहीं है. खाने के सामान को लोग ट्रकों से लूट ले रहे हैं. कई शहरों में खाने का सामान जब पहुंचता है, तो वहां इतने लोग जमा होते जाते हैं कि भगदड़ मच जाती है. दूसरी तरफ पाकिस्तान में कई आतंकवादी संगठन हैं, जिनके पास बहुत हथियार है. पहले से ही तहरीक-ए-तालिबान के लोग काफी सक्रिय हैं. उनका बकायदा मानना है कि पाकिस्तान की सेना और पाकिस्तान सही तरीके से इस्लामिक देश नहीं बना है. उनका मानना है कि पाकिस्तान सही मायने में इस्लामिक देश बनना चाहिए, जैसे पहले तालिबान ने अफगानिस्तान को बनाया था. इन परिस्थितियों में पाकिस्तान का भविष्य बहुत अच्छा नहीं है.

(ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है.)

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