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'बहुमंजिली इमारतों से करें परहेज़, भूकंप से कम हो नुकसान इसके लिए छतों के आकार पर दें ध्यान'

आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर ने दावा किया है कि भारत में भी तुर्किए-सीरिया जैसा भूकंप आ सकता. इस पर मैं कहना चाहता हूं कि भारत में ही नहीं दुनिया में कहीं भी कभी भी भूकंप आ सकते हैं.

जो भी देश समुद्री तटों पर हैं, छोट-छोटे टापू पर हैं, जैसे जापान का उदाहरण लीजिए. यहां पर हर रोज भूकंप के झटके आते हैं. लेकिन जो बड़े स्तर के भूकंप के झटके होते हैं जैसे कि अभी तुर्किए में हुआ है, उसमें भारी जान-माल का नुकसान हुआ है.

इस तरह के भूकंप में ये मायने रखता है कि ये धरती के कितने अंदर से आता है. दरअसल 12 बड़ी प्लेट और 20 छोटी प्लेट पृथ्वी के नीचे हैं, जो समुद्र में तैरते रहती हैं और जब ये आपस में टकराते हैं तो भूकंप आता है. ये जितना नीचे होगा उतना ही कम नुकसान होगा लेकिन जितना सतही होगा उतना ही ज्यादा नुकसान होगा.  जैसे तुर्किए में 7.8 रिक्टर स्केल का आया और भारी तबाही हुई. इससे पहले कई  5.2 और 5.4 रिक्टर स्केल के भूकंप आए. मायने ये रखता है कि वे धरती के कितने नीचे से आए और उनका एपिसेंटर कहां था.

ढांचागत विकास पर देना होगा ध्यान

भूकंप से नुकसान कम हो, इसके लिए हमें रणनीति बनानी होगी.  सबसे बड़ा मुद्दा है कि पृथ्वी के अंदर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है, लेकिन पृथ्वी के आवरण और पर्यावरण पर हमारा सीधा नियंत्रण है. हमारा ढांचागत विकास किस तरह से हो रहा है, इसको देखना होगा. दूसरी तरफ हम जापान से कितना उदाहरण ले रहे हैं, जहां रोज इस तरह के भूकंप आते रहते हैं. जापान की जो आधारभूत संरचना की तकनीक है, उससे उन्होंने अपने आप को बचा कर रखा है.हिमालयी क्षेत्र भूकंप के संदर्भ में बड़ा संवेदनशील माना जाता है. ये भी पता नहीं है कि भूकंप कब आ सकता है. भूकंप से होने वाले व्यापक नुकसान को ध्यान में रखकर यह जरूरी हो जाता है कि हम अपने ढांचागत विकास को ध्यान में रखें. हमारी दीवारें मजबूत हों. भूकंप में छतों को बहुत ज्यादा नुकसान होता है तो उसके बारे में सोचा जाए.

छतों के आकार पर ध्यान देना होगा

एक जरूरी बात यह भी समझ लेना चाहिए कि भूकंप एक लहर या करंट है और ये उन जगहों पर ज्यादा नुकसान पहुंचाता है जहां पर बड़े-बड़े ढांचागत इमारतें बनी होंगी. तो ऐसे में जिन भू-गर्भीय क्षेत्रों को संवेदनशील मानकर चला जा रहा है, उन जगहों पर इस बात का ज्यादा ख्याल रखने की आवश्यकता है. यही हमारे लिए शायद सबसे बड़ा सबक भी होगा. घर बनाने के संदर्भ में दो बातें हैं.  देखिए अब जो अगर घर बन चुके हैं, उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता. हमने सुना है कि जैसे ही भूकंप आए, तो दीवार के नीचे खड़े हो जाओ, छत के नीचे खड़े मत होइए. दरवाजों के नीचे खड़े हो जाइए. वहीं पर पिलर होता है, दरवाजा जहां होता है वो छतों के लिए एक सपोर्ट सिस्टम होता है तो उसके ऊपर छत नहीं गिरेगी. इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए कि ऐसा क्यों कहा जा रहा है. जो मकान बनने जा रहे हैं, उनमें इन बातों का ध्यान रखा जाए कि हमारी छतों का आकार कैसा हो. भूकंप में सबसे ज्यादा जीवन का नुकसान छतों की वजह से ही होता है.

बहुमंजिली इमारतों से परहेज़ करें

मैं समझता हूं कि बहुमंजिली इमारतें, चाहे वो पहाड़ हो या फिर मैदान, ज्यादा होनी ही नहीं चाहिए. 2001 में भुज में जो भूकंप आया था, वो तो मैदानी इलाका था. चाहे मैदानी हो या पहाड़ी इलाकें हों, हम बहुमंजिली इमारतों से जितना ज्यादा परहेज करेंगे, भूकंप से होने वाले नुकसान को उतना ही कम कर पाएंगे.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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