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Opinion: चीन की शह के बावजूद मालदीव नहीं कर सकता भारत की अनदेखी, ड्रैगन की डेट-डिप्लोमैसी में चंगुल सकता है द्वीपीय देश

भारत और मालदीव के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. इसकी पृष्ठभूमि तो तभी बन गयी थी, जब वहां के वर्तमान राष्ट्रपति मोहम्मद मोइज्जु ने 'इंडिया आउट' के नारे के साथ अपने कैंपेन की शुरुआत की थी. राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने कुछ अप्रिय बयान तो दिए ही, भारत के लगभग 70-75 सैनिकों को भी मालदीव से हटने का अल्टीमेटम दे दिया. वे सैनिक भी नॉन-कॉम्बैट वाले हैं और वे बस वहां देखभाल और मेटिनेंस के लिए हैं. हद तब पार हुई, जब भारतीय प्रधानमंत्री को वहां के मंत्रियों ने अपशब्द कहे और भारतीय जनता को भी भला-बुरा कहा. भले ही मोइज्जु ने उन तीनों को हटा दिया, लेकिन अभी तुरंत चीन की यात्रा से लौटे मोइज्जु के सुर अभी तक बदले नहीं हैं. ऐसे में रस्साकशी और बढ़ ही रही है. 

मालदीव का भारत के साथ गहरा रिश्ता 

वर्तमान परिस्थिति को देखें तो कुछ पृष्ठभूमि भी इसके साथ जड़ी हुई है. भारत का मालदीव के साथ जो रिश्ता रहा है वो बहुत ही अच्छा रहा है. मालदीव के राष्ट्राध्यक्ष अब तक जब भी चुने गए हैं, उनका प्रथम आगमन भारत ही रहा है अमूमन और यह पहली बार ऐसा हुआ है कि मुहम्मद मोइज्जु जो कि फिलहाल प्रेसिडेंट बने हैं, उन्होंने पहली यात्रा तो तुर्किए की की और उसके बाद जब पूरा विवाद चल रहा था, तो वह चीन की यात्रा पर थे. चीन से लौटते ही उन्होंने कड़े बयान दिए और भारतीय सैनिकों की वापसी की तारीख भी तय कर दी. मोइज्जु ने अपने चुनाव अभिया की शुरुआत ही इंडिया आउट की पॉलिसी से किया और इनका ये कहना कि भारतीय सैनिकों को ये सत्ता में आने के बाद वापस भेजेंगे और उनके इस चुनाव में होने के तुरंत बाद इंडिया को ये बता भी दिया. अभी इनकी चीन के साथ मीटिंग हुई है, 15 मार्च का डेडलाइन भी दिया है भारत को. लेकिन एक बहुत ही रोमांचक तथ्य है कि इंडियन ट्रूप्स की बात कर रहे है, उसकी संख्या को देखे तो वे लगभग 75 से 80 के पास हैं. ये बहुत ही अजीब है कि बस एंटी इंडिया भावना को भड़काने के लिए इन शब्दों का प्रयोग किया गया. 

पुराना रहा है दोस्ती का इतिहास

अगर हम पीछे देखें तो 2009 के लगभग एक हेलिकॉप्टर एयरक्राफ्ट से कुछ डील्स हुई थी जो कि भारत के द्वारा मालदीव को दी गई थी. और उसी को संभालने के लिए इंडियन ट्रूप्स को वहां रखा गया था. ये थोड़ा अजीब है कि वो इस चीज पे इतना फोकस कर रहे है कि हमारे लैंड पर कोई भी इंडियन ट्रूप्स के द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा. भारतीय विदेश मंत्री की ओर से जो बयान सामने आया है कि यदि कोई देश भारत के साथ नहीं रहना चाहता तो भारत भी जोर नहीं डालेगा और ये भारत का एक क्लियर कट स्टैंड है. ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत से हमेशा से मालदीव को बिजनेस के लिए, टूरिज्म के लिए जरूरत चीजों के लिए ही जरूरत पड़ी है. इस बीच मुहम्मद मोइज्जु का चाइना के पीएम से मिलने आने का बाद जो देखा जा रहा है वो कहीं न कहीं यह दिखा रहा कि चाइना दृढ़ता से 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' की उसकी पॉलिसी पर काम कर रहा है, जबकि मालदीव से भारत ने कुछ उम्मीद नहीं रखी है.

पीएम की लक्षद्वीप यात्रा 

पीएम मोदी जबसे लक्षद्वीप गए हैं, उसको ऐसे देखा जा रहा कि भारत मालदीव के प्रति कट रहा है, जबकि ऐसा नहीं है. 2018 में नीति आयोग द्वारा एक कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई थी जिसमें कई बातें की गई थी. उसमें सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) में भारत को आइलैंड को डेवलप करने की भी बात रखी गई थी और इको टूरिज्म के लिए डेवलपमेंट की बात हुई थी. इसके लिए लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार इन सारे आइलैंडस को इको टूरिज्म के लिए उनके जनजातीय जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए विकसित करना था. ये विरोधाभास होता है कि जब हम विकास की बात करते हैं और जब पर्यावरण की बात करते हैं तो दोनों चीजें टकराव में खड़ी होती हैं. ये भारत की योजना थी कि इसे स्थायी तरीके से करना है. हम भारत को एक तरह से टूरिज्म का एक अच्छा डेस्टिनेशन बनाएंगे. ऐसा नहीं है कि भारत मालदीव के विरोध में या चाइना के जो बयान आ रहे हैं कि भारत ये सब उनके पास आने की वजह से ये सब कर रहा है. इन सब के बीच मालदीव का जो रिएक्शन आया भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति वो आपत्तिजनक था. मालदीव की सरकार यह समझ रही है कि इंडिया के बगैर काम नहीं तल सकता. भारत और मालदीव बेहद करीब है, मालदीव के किसी भी इमरजेंसी में उनकी सहायता कर सकते है. हम पीछे यह देख भी चुके भी है, चाहें वो ऑपरेशन पानी हो या कोविड के समय पर. भारत ने हमेशा पड़ोसी देश होने के नाते उनका साथ दिया है. 

चाइना की डेट-पॉलिसी, जिसके तहत श्रीलंका और पाकिस्तान को भुगतना पड़ा है, वह पूरी दुनिया जानती है. अभी फिलहाल 2018 में ही चाइना-मालदीव फ्रेंडशीप ब्रिज ओपन किया गया, जिसमें चीन ने 200 मिलियन डॉलर के करीब इंवेस्ट किया. मालदीव की जीडीपी को देखा जाए तो लगभग 5 बिलियन डॉलर है. हम चाइना के इस पॉलिसी को देख रहे है, चीन एक तरह से भारत से भयभीत है. अगर हम जी 20 की सफलता की बात करें तो हम विश्व पटल पर अपनी उपस्थित दर्ज कर रहे है, हमारा जो आगामी विकसित भारत लक्ष्य है, हम काफी अच्छे से विकास कर रहे हैं. मालदीव हमारे लिए चिंता का कारण नहीं, लेकिन मालदीव को अपनी चिंता जरूर करनी चाहिए. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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