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धराली त्रासदी और हिमालय की चेतावनी: लालच, लापरवाही और भविष्य का रास्ता

उत्तरकाशी के धराली में आई आपदा ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को झकझोर दिया है. खीर गंगा गाड़ के किनारे बसे इस शांत गांव में अचानक आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने सब कुछ तबाह कर दिया. भागीरथी और खीर गंगा के संगम पर स्थित कल्प केदार मंदिर अब इतिहास बन गया है. घर बह गए, खेत मिट गए और कई ज़िंदगियां हमेशा के लिए खो गईं. लेकिन हर आपदा के बाद मन में एक ही सवाल उठता है, क्या हम इन आपदाओं से कभी सीखेंगे?

2013 की केदारनाथ आपदा ने पूरे देश को हिला दिया था. तब लगा था कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास और निर्माण में सावधानी बरती जाएगी. सोचा गया था कि भू-वैज्ञानिक और पर्यावरणीय अध्ययन को प्राथमिकता मिलेगी. लेकिन आज धराली की तबाही देखकर लगता है कि हमने अपने लालच के सामने प्रकृति की चेतावनियों को सुनना ही बंद कर दिया है.

हम पहाड़ को समझने के बजाय उसे जीतने की कोशिश कर रहे हैं. हम नदी की रेत पर निर्माण कर रहे हैं, जबकि यही रेत और खुला बहाव नदी का सुरक्षा कवच है. जब हम उसका रास्ता रोकते हैं तो अगली बारिश या क्लाउडबर्स्ट में वही नदी अपना रास्ता छीनकर ले लेती है और इससे भारी तबाही होती है.

हमारे बुज़ुर्ग बिना किसी डिग्री के भी हिमालय की भाषा समझते थे. वे जानते थे कि कौन सा नाला बरसात में कैसे भरता है, किस धारा के आसपास घर नहीं बनाना चाहिए, और किस ढलान को खाली छोड़ना ही बेहतर है. आज हमने उस लोक‑ज्ञान को छोड़कर अंधाधुंध विकास के नाम पर सिर्फ़ मशीन और लोहे की ताकत पर भरोसा कर लिया है, और नतीजा हमारे सामने है.

पिछले कई वक्त से भू-वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं. डॉ. एस.पी. सती जैसे विशेषज्ञ बार‑बार कहते आए हैं कि हिमालय एक युवा और अस्थिर पर्वत श्रृंखला है. इसकी चट्टानें पुरानी भूस्खलन पट्टियों और फॉल्ट लाइनों पर टिकी हैं. क्लाउडबर्स्ट, लोकलाइज़्ड हेवी रेनफॉल और ग्लेशियर झील का फटना अब आम घटनाएँ हो चुकी हैं.

ऐसे में नदियों की रेत पर निर्माण, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई और सुरंगें बनाना प्रकृति के खिलाफ़ सीधी जंग है. और इस जंग का नतीजा हमेशा ऐसी आपदाएँ होती हैं.

अब समय आ गया है कि हम हिमालयी विकास के लिए एक स्थायी और वैज्ञानिक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाएं. इस SOP में यह तय होना चाहिए कि हिमालयी इलाकों में किस प्रकार से विकास कार्य किए जाएंगे और उसकी सीमा क्या होगी. इसको बनाने का आधार केवल प्रशासकीय कागज़ न हो, बल्कि लोक ज्ञान, भू-वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और पारिस्थितिक अध्ययन होना चाहिए. सड़क, पुल, टनल, होटल या हाइड्रो प्रोजेक्ट – हर निर्माण तभी हो जब वह SOP की सीमा के भीतर फिट बैठता हो.

सिर्फ़ SOP बनाना ही काफी नहीं है. इसे तुरंत लागू करना और सख्ती से पालन करवाना ज़रूरी है. प्रशासन, स्थानीय निकाय और निर्माण एजेंसियाँ, सभी इसके दायरे में आएँ. साथ ही, स्थानीय लोगों और पर्यटकों को आपदा, निर्माण जोखिम और पर्यावरणीय नियमों के बारे में जागरूक करना भी उतना ही अहम है. अगर नागरिक खुद सचेत होंगे, तो लापरवाह निर्माण और अतिक्रमण पर भी समाज का दबाव बनेगा.

धराली की त्रासदी हमें फिर याद दिलाती है कि हिमालय की चेतावनी हर साल और तेज हो रही है. अब व्यापक नीतिगत बदलाव और सामाजिक चेतना को जगाने की ज़रूरत है. आपदा में जान गंवाने वाले लोगों को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम अपने विकास को प्रकृति के हिसाब से ढालें, न कि अपने लोभ और जल्दबाज़ी से. वरना अगली आपदा सिर्फ़ समय की बात है.

(डॉ. मुकेश बोरा, उत्तराखंड के हिमालयी मुद्दों पर डेवलपमेंट कम्युनिकेशन में पीएच.डी)

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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