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दिल्ली की जंग: कौन जाने ये ऊँट ‘अवैध’ करवट बैठेगा या ‘मुफ़्त’!

रोज़मर्रा की महत्वपूर्ण चीज़ों को मुफ़्त देने वाली पार्टी को या दशकों पुरानी फ़रमाइश को सशुल्क पूरी करने वाली पार्टी को. दोनों पार्टियां जनता का पैसा ही ख़र्च करेंगी.

नई दिल्लीः विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ी दिल्ली में फ़िलहाल जनता को लुभाने की होड़ लगी है. केजरीवाल की मुफ़्तबाज़ी का मुक़ाबला करने के लिए 20 साल से दिल्ली को वापस पाने के तरस रही मोदी सरकार ने भी ज़बरदस्त मास्टर स्ट्रोक का ऐलान किया है. राजधानी की 1,800 अवैध कॉलोनियों के 40-50 लाख लोगों को ख़ुश करने के लिए बीजेपी ने एक लॉलीपॉप ढूंढ़ लिया है. केजरीवाल दिन-रात इसी उधेड़-बुन में रहते हैं कि दिल्ली को और क्या-क्या मुफ़्त दे दिया जाए!

केजरीवाल ने मुफ़्त पानी, मुफ़्त बिजली, महिलाओं की मुफ़्त बस यात्रा, मुफ़्त सीवर कनेक्शन और सेफ़्टी टैंक की मुफ़्त सफ़ाई जैसी पॉलिसी का ऐलान बीजेपी को ऐसा ललकारा कि उसने क़ानून बनाकर राजधानी की 1,800 अवैध कॉलोनियों को वैध बनाने का ऐलान कर दिया. इसके विधेयक को केंद्रीय कैबिनेट ने हरी झंडी दिखा दी. उम्मीद है कि संसद में मौजूदा सत्र में दशकों पुरानी मांग को पूरा कर दिया जाएगा. अवैध को वैध बनाना अनुचित भले लगे, लेकिन ये जितना विकराल और व्यापक है, उसे देखते हुए और कोई चारा भी नहीं हो सकता. बीजेपी जानती है कि आर्टिकल 370 और राम मंदिर की तरह कोई राजनीतिक दल अवैध का विरोध नहीं कर पाएगा.

ज़मीन केंद्र सरकार की मुट्ठी में

यदि बीजेपी के इस मास्टर स्ट्रोक से दिल्लीवासी ख़ुश हो गये तो शायद जनवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन सुधार जाए. संविधान ने ज़मीन संबंधी अधिकार राज्य सरकार को दिया है. लेकिन पूर्ण राज्य नहीं होने की वजह से इस केन्द्र शासित प्रदेश की ज़मीन केन्द्र सरकार की मुट्ठी में है. विधानसभा में चमत्कार करने वालों का लोकसभा में फ़िस्सडी साबित होना ही केजरीवाल की ‘मुफ़्त’ अभियान की वजह है.

माना जाता है कि दिल्ली के कमज़ोर और मेहनतकश तबकों पर केजरीवाल की अच्छी पकड़ है. यही तबका उनकी ‘मुफ़्त’ वाली योजनाओं का सबसे बड़ा लाभार्थी है और प्रशंसक भी. दूसरी ओर, अवैध कॉलोनियों के नियमित होने से सारी सहूलियत भी इसी तबके को मिलेगी. अब सवाल ये है कि जब अवैध कॉलोनियों में सड़कें और नालियां बनाने, सीवर लाइन बिछाने सेफ़्टी टैंक की सफाई होगी, वहां रहने वाली महिलाएं बसों में मुफ़्त यात्रा करेंगी और रियायती राशन पाएंगी तो क्या केजरीवाल सरकार को वोट नहीं देंगी? इन्हीं कॉलोनियों के लोग उन सरकारी स्कूल-कॉलेजों के कायाकल्प के सबसे बड़े लाभार्थी हैं, जहां इनके बच्चे पढ़ते हैं.

किस पार्टी के प्रति जताएं आभार?

अवैध कॉलोनियों में बसने वाले ही दिल्ली सरकार की मुफ़्त इलाज़ योजना, दुर्घटना की दशा में मुफ़्त और असीमित इलाज़ योजना के लाभार्थी हैं. सरकारी अस्पतालों और मोहल्ला क्लिनिक जैसी डिस्पेंसरियों, वहां से करवायी जाने वाली मुफ़्त पैथोलॉज़िकल और रेडियोलॉज़िकल जांच वग़ैरह का फ़ायदा मुख्य रूप से इन्हीं अवैध कॉलोनियों के निवासियों के हिस्से में आता है. लिहाज़ा, अवैध कॉलोनियों के निवासियों के लिए ये तय करना बेहद मुश्किल होगा कि अपने वोट के ज़रिये किस पार्टी के प्रति आभार और विश्वास जताएं?

रोज़मर्रा की महत्वपूर्ण चीज़ों को मुफ़्त देने वाली पार्टी को या दशकों पुरानी फ़रमाइश को सशुल्क पूरी करने वाली पार्टी को. दोनों पार्टियां जनता का पैसा ही ख़र्च करेंगी. कोई अपनी जेब से नहीं लगाता. उल्टा अवैध कॉलोनियों के नियमितीकरण से दिल्ली सरकार को भारी राजस्व मिलेगा, क्योंकि ज़मीन की रज़िस्ट्री के वक़्त लगने वाली स्टैम्प ड्यूटी का बहुत बड़ा हिस्सा भी घूम-फिरकर दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के ज़रिये या तो दिल्ली राज्य में ही ख़र्च होता है.

नगर निगम पर बीजेपी की राज

अवैध के वैध होते ही दिल्ली नगर निगम को सम्पत्ति-कर वसूलने का अधिकार मिल जाएगा. दशकों से राजधानी के नगर निगमों पर बीजेपी का एकछत्र राज है. हालांकि, शायद ही कोई दिल्लीवासी ऐसा हो, जो इसके कर्मचारियों को, इसकी कार्य-संस्कृति को नेक, ईमानदार, निष्ठावान और जन-समस्याओं के प्रति संवेदनशील समझता हो. इसके बावजूद दिल्ली वाले दशकों से निगर निगम में बीजेपी की पौ-बारह करते रहे हैं.

केजरीवाल की दिल्ली सरकार में भी चप्पे-चप्पे पर भ्रष्टाचार का डंका वैसे ही बज रहा है जैसा कांग्रेस और बीजेपी की सरकारों के दौर में था. रिश्वतख़ोरी रूपी नदी के प्रवाह में शायद ही कोई कमी आयी हो. सरकारी बाबुओं की मनमानी बदस्तूर क़ायम है. वो हमेशा की तरह बेईमान और मक्कार बने हुए हैं. सरकारी दामाद वाला उनका स्टेटस तो कभी बदला नहीं.

डिजिटल विस्तार से सुधरी हैं चीजें

डिज़ीटल विस्तार से काफ़ी चीज़ें सुधरी भी हैं. फिर भी ये देखना दिलचस्प होगा कि विधानसभा चुनाव में दिल्लीवासी किस लॉलीपॉप पर अपना वोट न्यौछावर करेंगे? बाज़ार में मुफ़्तख़ोरी कैसे-कैसे ग़ुल खिलाती है- इसकी सबसे बड़ी मिसाल है जियो का मुफ़्त डाटा प्लॉन.

इसकी बदौलत आज टेलीकॉम सेक्टर में हाहाकर है? कमज़ोर तबकों की मदद करना किसी भी कल्याणकारी सरकार का बुनियादी धर्म है. लोकतंत्र में मुफ़्त की रेवड़ियां बांटना पूरी तरह से नैतिक और जायज़ है. लिहाज़ा, इसमें मीन-मेख निकालना फ़िज़ूल है. बीते वर्षों का अनुभव बताता है कि अच्छी उपलब्धियों वाली सरकारें भी चुनाव हार सकती हैं और फ़र्ज़ी ढोल पीटने वाले भी सत्तानशीं हो सकते हैं. असाधारण नाकामियों के बावजूद बीजेपी फ़ैलाव इतना तो बताता ही है कि गया ज़माना जब जनता काम-काज और विचारधारा को परखकर सरकार चुनती थी.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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