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अलग-अलग राहों पर बिहार में चल पड़े राजद और कांग्रेस!

कांग्रेस ने बिहार में अपना चुनाव प्रभारी कृष्णा अल्लावरू को चुना है और पिछले पंद्रह-बीस दिनों में वो बिहार के दो दौरे तो कर चुके हैं. ये खबर इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि बिहार में कांग्रेस को करीब-करीब मृत पार्टी मान लिया जाता है. लालू यादव ने जब नब्बे के दशक में कांग्रेस से सत्ता छीनी थी, उस समय वो जनता दल के नेता हुआ करते थे. बाद में उनकी अलग पार्टी राष्ट्रीय जनता दल भी अस्तित्व में आई तो उसने कांग्रेस के लिए कोई जमीन नहीं छोड़ी.

समय बदलने के साथ जबतक नीतीश कुमार के जद (यू) का दौर आया, तबतक कांग्रेस बिहार में केवल राजद की पिछलग्गू की सी भूमिका में आ गयी थी. आज की बिहार कांग्रेस के पांच बड़े नेताओं का नाम भी बिहार के किसी मतदाता से पूछ लिया जाए, तो नाम गिनाने उसके लिए कठिन ही होंगे. ऐसे दौर में लगातार दौरों के जरिये कांग्रेस अगर बिहार में अपनी पार्टी में फिर से प्राण फूंकना चाहती है, तो इसे महत्वाकांक्षी कदम माना जाना चाहिए. ऐसा भी नहीं है कि ये कदम कृष्णा अल्लावरु के दौरों पर शुरू हुए हैं.

कांग्रेस की चाहत, टीम ए बनने की

दिल्ली चुनावों के बीच जब राहुल गाँधी बिहार का रुख करने लगे थे, तभी से राजनैतिक बदलावों पर कड़ी नजर बनाए रखने वालों को ये दिखाई देने लगा था. अकेली बड़ी पार्टी के रूप में चुनावों में उतरने के फायदे हिमाचल चुनावों के बाद से कांग्रेस महसूस करने लगी होगी. किसी और के पीछे छुपने के बदले महाराष्ट्र और हरियाणा में खुलकर सामने आने के फायदे उसे दिखे होंगे, तभी दिल्ली के चुनाव में वो इंडी गठबंधन के ही साथी केजरीवाल के खिलाफ खुलकर उतरी और सभी सीटें हारने के बाद भी अपने पूर्व सहयोगी की हार पर कांग्रेसी नाचते दिखाई दिए. बिहार में भी राहुल गांधी सीधे सीधे राजद के एक बड़े चुनावी मुद्दे “जातिगत जनगणना” को फर्जी घोषित कर चुके हैं. असल में नवम्बर 2024 के उपचुनावों में ही कांग्रेस को साफ समझ में आ गया था कि बिहार में एमवाय समीकरण (यानि मुस्लिम+यादव वोटर) पर राजद की पकड़ वैसी नहीं जैसे दावे वो ठोकती दिखाई देती है. इंडी गठबंधन दल के लोग बिहार में जो महागठबंधन चलाते हैं, वो उपचुनावों में सभी चार की चार सीटें हार गयी थी.

राजद से मुस्लिम वोट छिटकाने को तैयार कांग्रेस

राजद पर मुस्लिम लोगों से वोट लेकर उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व न देने का इल्जाम भी लगता रहा है और इसी वजह से 2020 के विधानसभा चुनावों में ओवैसी की एआईएमआईएम के पांच उम्मीदवार राजद के मुस्लिम उम्मीदवारों को हराकर आये थे. बाद में राजद ने एआईएमआईएम के कुछ विधायक फोड़े भी थे. प्रशांत किशोर की पार्टी राजद के लिए एक नयी चुनौती बनकर उभरी है. राजद को एक तरफ तो चिट्ठी पर चिट्ठी जारी करके अपने कार्यकर्ताओं को प्रशांत किशोर से दूर रहने कहना पड़ रहा है, दूसरी तरफ प्रशांत किशोर ने बेलागंज से अपना मुस्लिम उम्मीदवार उतारा था. बेलागंज उपचुनावों में प्रशांत किशोर का  उम्मीदवार कुल 17000 वोट काट ले गया और राजद को 21000 वोट से हारकर संतोष करना पड़ा. इसके अलावा प्रशांत किशोर अगले चुनाव में 25 मुसलमान उम्मीदवार खड़े करने की बात करके, राजद को इतने ही मुस्लिम उम्मीदवार उतारने की चुनौती दे चुके हैं. इसी दौर में कांग्रेस ने भी मुस्लिम उप-मुख्यमंत्री बनाने की बातें की थीं जिसपर राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा था, “ऐसे बयान गठबंधन धर्म का उल्लंघन करते हैं”.

कांग्रेस का स्ट्राइक रेट बेहतर!

इन सबके साथ ही स्ट्राइक रेट पर भी जनता में चर्चा शुरू हो गयी है. कांग्रेस ने 2024 चुनावों में अपने नौ उम्मीदवार उतारे और उसने तीन सीटें जीत ली थी. इसकी तुलना में राजद ने अपने 23 उम्मीदवार उतारे थे जिनमें से केवल 4 जीते. इस लिहाज से कांग्रेस के स्ट्राइक रेट (33%) से राजद का स्ट्राइक रेट करीब आधा (17%) ही है. यादव वोट राजद के साथ कितने हैं, इसका अनुमान पुर्णिया लोकसभा सीट पर भी कांग्रेस को हो चुका है. एक कांग्रेसी नेत्री के पति, बाहुबली माने जाने वाले पप्पू यादव इस सीट से निर्दलीय उतरे थे और उन्होंने राजद की महिला यादव नेत्री, जो स्वयं एक बाहुबली की पत्नी है, उसे धूल चटा दी थी. हाल के इन चुनावी नतीजों के साथ जब कांग्रेस के कृष्णा अल्लावरु के इस बयान को जोड़ा जाए कि कांग्रेस अब बी टीम की तरह नहीं, ए टीम की तरह जनता के लिए उतरेगी तो साफ हो जाता है कि कांग्रेस अपना जनाधार ही नहीं बढ़ा रही बल्कि एक बार फिर से अपने पुराने कार्यकर्ताओं पर भरोसा करना भी शुरू कर रही है.

बीते दो तीन दशकों में कांग्रेस के लिए जमीनी कार्यकर्त्ता कम हो चले थे. इसके अलावा कार्यकर्त्ता के स्तर से कोई उठकर नेता बन सकता है, चुनाव लड़ने के लिए कार्यकर्त्ता का विशिष्ट परिवारों में जन्म लेना आवश्यक नहीं, ऐसा आम लोग मान नहीं पा रहे थे. कांग्रेस के व्यवहार में ये दिखाई नहीं देता था. कृष्णा अल्लावरु के बार बार के दौरों में बूथ स्तर कार्यकर्ताओं से बातचीत, उनसे राय मशवरे की परिपाटी भी बदली हुई दिख रही है. कांग्रेस ने 2020 के चुनावों में जो 70 उम्मीदवार उतारे थे, उनमें से वो केवल 19 पर ही जीत दर्ज करवा पायी थी. इसका एक बड़ा कारण राजद और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं से बूथ स्तर का प्रबंधन करवाना भी था. कांग्रेस अकेले उतरकर मुकाबला करने की हिम्मत दिल्ली में दिखा ही चुकी है इसलिए राजद को भी इसका खतरा महसूस हो रहा होगा, ये भाई वीरेंद्र (राजद नेता) के बयान में भी देखने को मिल गया जब वो एअरपोर्ट पर पत्रकारों के सवालों के उत्तर में लालू यादव और सोनिया गांधी के मधुर संबंधों की दुहाई देते सुनाई दिए.

बाकी चुनावी कवायद अभी बिहार में शुरू भर हुई है और नतीजों में चाहे जीत हो या हार, कांग्रेस की पीछे खड़े होकर छोटे भाई की भूमिका निभाने का मन नहीं, ये तो पता चल ही गया है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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