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गोवा में बग़ावत को न रोक पाने वाली कांग्रेस क्या राजस्थान का घर बचा लेगी?

इधर राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के जरिये कांग्रेस को मजबूत करने की जमीन तलाशने में जुटे हैं, तो उधर गोवा में पार्टी के 8 विधायकों ने बीजेपी का दामन थामकर ये संदेश दे दिया है कि 2024 में केंद्र की सत्ता में आने का सपना देखने वाली कांग्रेस की बुनियाद किस हद तक भरभरा चुकी है. गोवा में कांग्रेस के 11 में से 8 विधायकों की बग़ावत ये भी बताती है कि दिल्ली में बैठे आलाकमान और राज्यों के नेताओं के बीच संवाद के तार टूटने का आलम ये है कि दिल्लीवालों को इसकी भनक तक नहीं लगी कि वहां क्या विस्फोट होने वाला है.

अगर भनक लगी होती, तो ऐसा नहीं हो सकता था कि उन्हें मनाने-रोकने की कोई कोशिश नहीं की गई होती. दरअसल, कांग्रेस के लिए ये बड़ा झटका इसलिये है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत की अगुवाई में ये टूट हुई है. उन्हें गोवा में कांग्रेस का सबसे कद्दावर नेता माना जाता है.

जाहिर है कि इतना बड़ा फैसला उन्होंने एक-दो दिन में तो नहीं ही लिया होगा. निश्चित ही पार्टी नेतृत्व से उनकी कुछ तो अनबन रही होगी जिसे लेकर वे नाराज थे लेकिन उसे अनदेखा करने की कीमत आज कांग्रेस को इस रुप में चुकानी पड़ी कि अब वहां कांग्रेस के महज तीन विधायक रह गए हैं. विश्लेषक मानते हैं कि वे तीन भी कब पार्टी का हाथ छोड़ दें, कह नहीं सकते. अगर ऐसा हुआ, तो गोवा पूरी तरह से कांग्रेस मुक्त राज्य बन जायेगा.

लेकिन सवाल ये है कि आखिर ये नौबत आई ही क्यों और इसके लिए जिम्मेदार कौन है? पिछले करीब दो साल से पार्टी के 23 बड़े नेता चिल्ला रहे थे कि संगठन को ऊपर से नीचे तक पूरी तरह से ओव्हर ऑयलिंग की जरुरत है,जिन्हें G-23 का नाम दिया गया.वे चाहते थे कि हर समय चाटुकारों की चौकड़ी के साये में घिरे रहने वाला आलाकमान खुद को इससे मुक्त करे और जल्द से जल्द संगठन के चुनाव हों,ताकि नेतृत्व की कमान एक परिवार से बाहर के किसी और नेता के हाथ में आये.लेकिन आलाकमान तो मानो कानों में तेल डालकर कुम्भकर्णी नींद में सोया हुआ था,और जब जागा, तब तक बहुत कुछ खो चुका था.
 
बता दें कि साल 2019 के लोकसभा चुनावों में हुई करारी हार के बाद राहुल गाँधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे  दिया था.उसके बाद अस्थायी इंतजाम के रुप में सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाकर पार्टी की कमान फिर से उसी परिवार के हाथ में सौंप दी गई.

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक वही सबसे बड़ी गलती थी.उस वक़्त या तो संगठन के चुनाव कराने का ऐलान किया जाता या फिर गांधी परिवार से बाहर किसी वरिष्ठ नेता को नेतृत्व की कमान सौंपकर ये अधिकार दिया जाता कि वह पार्टी में नई जान फूंकने के लिए अपने हिसाब से संगठन में फेरबदल करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है,जिसमें गांधी परिवार का कोई सदस्य दखल नहीं देगा.

लेकिन अफसोस कि ऐसा कुछ नहीं हुआ और जब कई स्थापित नेता साथ छोड़ गये, तब नेतृत्व को अहसास हुआ कि हां, अब पार्टी अध्यक्ष का चुनाव कराना ही एकमात्र मजबूरी है. खासकर गुलाम नबी आज़ाद के चले जाने और उनकी लिखी चिट्ठी में कड़वी बातों की हक़ीक़त उज़ागर होने के बाद संगठन का चुनाव कराने के सिवा कोई और चारा ही नहीं था.

लेकिन इसे भी अधूरा चुनाव ही समझा जाएगा क्योंकि अगले महीने सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव होगा. कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों यानी CWC का चुनाव नहीं हो रहा है, जबकि दो दशक पहले सोनिया गांधी के चुनाव लड़ने से पहले तक दोनों चुनाव एक साथ कराने की परंपरा रही है.

भारत जोड़ो यात्रा से बेशक कांग्रेस कुछ स्थानों पर अपना जनाधार कुछ हद तक मजबूत करने में कामयाब हो जाये,लेकिन जब तक वह अपने घर को यानी नेतृत्व को पारदर्शी,निष्पक्ष और जमीन से जुड़े नेताओं से संवाद स्थापित करने लायक नहीं बना देती, तब तक उसे जनता से भारी समर्थन मिलने की उम्मीद छोड़ देनी चाहिये.

गोवा की बग़ावत से उसे अब ये सबक लेने की जरुरत है कि राजस्थान के किले को किस तरह से सुरक्षित बचाकर रखा जाए,जहां अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और सचिन पायलट खेमा पाला बदलने के लिए तैयार बैठा है.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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